वो दिन दूर नहीं जब बाजार में टमाटर, मिर्च, अंगूर, पपीता, अनार जैसी सब्जियां और फल देखकर आप तुरंत उनकी ओर खिंचे चले जाएंगे। ये एकदम चमचमाते दिखेंंगे। सुनहरे पीले टमाटर को देखकर लगेगा कि कहीं ये बिना पके टमाटर की कोई किस्म तो नहीं। लेकिन ये भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान (आईआईएचआर) बेंगलुरु द्वारा विकसित फल हो सकता है और ये एक नई किस्म है जो कि विटामिन डी से भरपूर है और आपके इम्यून सिस्टम को मजबूत करेगी। हालांकि सब्जियां अभी विकसित होना बाकी है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद एक नेशनल प्रोग्राम के तहत हो रहे प्रोजेक्ट में 16 किस्मों की सब्जियां, फलों और मसालों पर काम कर रहा है, जबकि आईआईएचआर इन सब्जियों के जीन अनुक्रमों की एडिटिंग पर काम कर रहा है। जीनोम एडिटिंग क्या है? ये कोशिका या जीव के डीएनए में विशिष्ट परिवर्तन करने की विधि है। ये जीनोम में डीएनए जोड़ने, हटाने या कुछ बदलाव करने के लिए प्रयुक्त होती है। जब वे इसमें एेसे बदलाव कर लेंगे, तो इसके पोषक तत्वों से समृद्ध व जलवायु-प्रतिरोधी किस्मों में बदलने की संभावना है। साल 2047 तक, इस परियोजना से देश में ऐसी लगभग 700 मिलियन टन सब्जियां पैदा होने की उम्मीद है। जीन एडिटिंग के प्रयोग के लिए आईआईएचआर ने बेंगलुरु कैंपस में 30 करोड़ रु. से उत्कृष्टता केंद्र बनाया है। ऐसी पहल क्यों हुई? जब सब्जियां व फल, विटामिन डी और पोषक तत्वों से भरपूर होंगे, तो ये शरीर को कुछ वायरल व बैक्टीरियल बीमारियों से बचाने में मदद करेंगे। आम लोगों के डर को कम करते हुए आईआईएचआर के वैज्ञानिकों ने हाल ही में मीडिया को स्पष्ट किया कि जीन-एडिटिंग फसलें जेनेटिकली मोडिफाइड (जीएम) फसलों से पूरी तरह से अलग हैं, क्योंकि जीएम को लेकर भारत में प्रतिरोध है। जीएम में जहां पौधे में बाहरी डीएनए को प्रवेश कराते हैं लेकिन जीनोम एडििटंग में पौधे के अंदर पहले से मौजूद जेनेटिक कोड में बदलाव करते हैं और ये बदलाव इसके अपने जीन के साथ म्यूटेशन करके या खास पिगमेंट बढ़ाकर किए जाते हैं, ताकि ये ज्यादा पोषक बने। वैज्ञानिकों का दावा है कि फूलगोभी में यह बदलाव पहले ही देखे जा रहे हैं, जहां नीचे के डंठल (फ्लोरेट्स) सामान्य रूप से सफेद के बजाय अब बैंगनी और पीले रंग के भी होने लगे हैं। विटामिन से भरपूर सब्जी की ऐसी किस्मों के लिए क्या दशकों इंतजार करना होगा? नहीं। बस दादी मां के तरीके आजमाएं! वह जानती थीं कि आपके पेट का ख्याल कैसे रखें और बचे चावल से कैलोरी कैसे कम करें! बचे हुए खाने का भारतीय थाली और स्वाद में विशेष स्थान है, जहां दादी मां रात के बचे चावल और रोटी से चटपटी डिशेज मिनटों में तैयार कर देती हैं। विशेषज्ञों ने पाया है कि बचे खाद्य पदार्थ आंत, ब्लड शुगर व बढ़ती कमर के लिए अच्छे हैं। यहां तक कि कार्ब से भरपूर रात का बचा खाना जैसे चावल, चपाती, पास्ता, उबले आलू, यहां तक कि रात भर के ओट्स को भी अगर ठंडा होने के लिए कुछ घंटे छोड़ दें, तो ये जादुई रूप से हेल्दी चीज में बदल जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इसमें मौजूद सारा स्टार्च रेजिस्टेंट स्टार्च (आरएस) में बदल जाता है! आप शायद ताज्जुब कर रहे होंगे कि सादा पका चावल, जिसे आमतौर पर कैलोरी से भरपूर मानते हैं, वो ठंडा करने पर आरएस भोजन में कैसे बदल जाता है? लंदन के किंग्स कॉलेज में गट फिजियोलॉजिस्ट डॉ. बालाज़ बाजका ने द न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया कि भोजन को पकाने और ठंडा करने से इसके स्टार्च अणु एक साथ कसकर पैक हो जाते हैं, जिससे उन्हें पचाना अधिक कठिन हो जाता है। जब ऐसा होता है, तो कुछ स्टार्च रेजिस्टेंट हो जाते हैं, इसका मतलब है कि इसके शुगर मॉलीक्यूल उतनी आसानी से नहीं टूटते और आपके रक्तप्रवाह में अवशोषित नहीं होते जितना कि सामान्यतः होते हैं। फंडा यह है कि दादी-नानी मां जानती थीं कि बचे कार्ब्स के इस्तेमाल से न सिर्फ पेट की सेहत अच्छी रहेगी बल्कि कमर भी कम होगी। इसके अलावा फूड वेस्टेज रोकना पैसे बचाने का भी एक तरीका था। जब तक जीनोम एडिटिंग सब जगह नहीं होती, आप ये तरीका आजमा सकते हैं।