सान्या मल्होत्रा अभिनीत फिल्म "मिसेज' पर आ रही प्रतिक्रियाएं भले चौंकाने वाली न हों, वो हमारे समाज के बारे में बहुत कुछ बताती जरूर हैं। पुरुष और कुछ महिलाएं- खास तौर पर पुरुष अधिकार कार्यकर्ताओं (एमआरए) से जुड़ी महिलाएं- फिल्म को "पुरुष विरोधी' और "पक्षपाती' बता रही हैं। उनकी नाराजगी बताती है कि यह फिल्म क्यों जरूरी थी। उन्हें डर किस बात का है? अगर उन्हें लगता है कि "मिसेज' पुरुषों पर हमला करती है, तो शायद उन्होंने अपने जीवन में कभी महिलाओं की बात नहीं सुनी है। अगर उन्हें लगता है कि महिलाओं के लिए न्याय का मतलब पुरुषों से बदला लेना है, तो वे बुनियादी तौर पर न्याय को गलत तरीके से समझते हैं।चलिए इस बारे में बात करते हैं। अपने मूल में, "मिसेज' पॉवर के बारे में एक कहानी है- जिस तरह की पॉवर से महिलाओं को वंचित किया जाता है, जिस तरह की पॉवर को पुरुष अपनी मानकर चलते हैं, और जिस तरह की पॉवर को जब महिलाएं हासिल करती हैं, तो उसे खतरा माना जाने लगता है। फिल्म पुरुषों को बुरा नहीं बताती; लेकिन वह समाज का आईना जरूर दिखाती है। और कई पुरुषों के लिए- खासकर जो एमआरए के समर्थक हैं- इस आईने में झलकने वाला अक्स असहज करने वाला है। क्यों? क्योंकि यह उन्हें एक असुविधाजनक सच्चाई का सामना करने के लिए मजबूर करती है : दुनिया उतनी निष्पक्ष नहीं है, जितना कि वे दिखावा करते हैं।महिलाएं पुरुषों पर अत्याचार नहीं करना चाहती हैं; लेकिन वे यह जरूर चाहती हैं कि उन्हें सुना जाए और उनके साथ बराबरी का व्यवहार किया जाए। उनके सपनों और महत्वाकांक्षाओं को पुरुषों के बराबर माना जाए। अगर यह पुरुषों को अपने पर हमले जैसा लगता है, तो यह सोचने वाली बात है। पुरुष अधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा फैलाई जाने वाली सबसे बड़ी भ्रांतियों में से एक यह है कि नारीवाद का मतलब है पुरुषों को वैसे ही प्रताड़ित करना, जैसे ऐतिहासिक रूप से महिलाओं को किया जाता रहा है। जबकि नारीवाद बदला लेने के बारे में नहीं है- संतुलन कायम करने के बारे में है। सदियों से महिलाओं को प्रतिनिधित्व, स्वायत्तता और न्याय से वंचित किया गया है। "मिसेज' ने पूछने की हिम्मत की है कि क्या होता है जब एक महिला यथास्थिति को स्वीकारने से इनकार करती है? क्या होता है जब वह हक की मांग करती है? और वह मांग पुरुषों को इतनी डरावनी क्यों लगती है? फिल्म पर आ रही प्रतिक्रियाओं के मूल में यह डर है कि जब महिलाएं मुखर होना शुरू करेंगी, तो पुरुषों को बदलना पड़ेगा। उन्हें सुनना पड़ सकता है। उन्हें खुद को जवाबदेह ठहराना पड़ सकता है। उन्हें यह स्वीकार करना पड़ सकता है कि दुनिया उनके पक्ष में झुकी हुई थी। इस फिल्म से गुस्साए पुरुष वही हैं, जो कार्यस्थल पर उत्पीड़न को मामूली छेड़छाड़ के रूप में खारिज करते हैं, जो दुष्कर्म पीड़िताओं से पूछते हैं कि उन्होंने क्या पहना था, जो एक मुखर महिला को भावनाओं में बह जाने वाली बताते हैं। वे बारीकियों को नहीं चाहते। वे चुप्पी चाहते हैं। वे चाहते हैं कि महिलाएं चुपचाप अन्याय सहती रहें ताकि उन्हें एक टूटी हुई व्यवस्था में अपनी मिलीभगत की हकीकत का सामना न करना पड़े। लेकिन महिलाएं अब चुप रहना छोड़ चुकी हैं। और अगर यह फिल्म आपको असहज करती है, तो शायद ऐसा इसलिए है क्योंकि यह आपको उन तरीकों से जवाबदेह ठहरा रही है जिनका सामना करने के लिए आप तैयार नहीं हैं। समस्या फिल्म नहीं, महिलाओं की तकलीफों को देखने में आपकी अक्षमता है। "मिसेज' पर जताया जा रहा आक्रोश आलोचना नहीं है। वह इस बात का सबूत है कि इसने उस बारे में चर्चा शुरू की, जिस पर बहुत पहले ही बात हो जानी चाहिए थी। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)