जैसे रोड पर खड़े आइसक्रीम विक्रेता, देर रात तक ग्राहकों को आकर्षित करते रहते हैं, उसी तरह बेंगलुरु की बेकरियों पर भी रातभर ग्राहक पहुंचते रहते हैं। उन्हीं के साथ चाय की गुमटियों का व्यापार भी पूरी रात चलता है। यहां लोग ताज़ी ब्रेड को चाय में डुबोकर खाते हुए, राजनीति से लेकर क्रिकेट तक, हर विषय पर चर्चा में डूबे रहते हैं। कल्पना कीजिए, आधी रात के बाद 10 लोग बेकरी के बाहर खड़े होकर जोर-जोर से हंस रहे हैं और एक-दूसरे को गालियां दे रहे हैं। मैं हमेशा सोचता हूं कि ऐसी जगहों के आस-पास रहने वाले लोगों को कैसा लगता होगा? पास के घरों में बच्चे और बड़े कैसे सो पाते होंगे? बीते शनिवार आयोजित, पुलिस जनसंवाद कार्यक्रम में, बेंगलुरु पुलिस कमिश्नर बी दयानंद को मिली शिकायतों की मानें तो यह ‘बेहद शोर-शराबे’ की स्थिति है। सिर्फ बेकरी ही नहीं, आईटी ऑफिस के बाहर बनी हर चाय दुकान का यही हाल है। लोगों में ऐसी जगहों के प्रति गुस्सा बढ़ रहा है क्योंकि ये चाय-नाश्ते की दुकानें, युवाओं के जमावड़े और शोरगुल का ठिकाना बन गई हैं। इतना ही नहीं, इन दुकानों के बाहर बेतरतीब ढंग से पार्क की गई गाड़ियां भी परेशानी बढ़ा रही हैं क्योंकि रात में इन्हें रोकने के लिए कोई पुलिसवाला नहीं होता। ऐसी दुकानों के पास रहने वालों की तकलीफ देखते हुए, पुलिस कमिश्नर ने विभाग को आदेश दिया है कि हर बेकरी पर सीसीटीवी कैमरे लगाना अनिवार्य कर दिया जाए। दयानंद ने कहा, ‘अगर कोई बेकरीवाला सीसीटीवी लगाने से इनकार करता है, तो उसकी बेकरी बंद करवा दो।’ ठेले, गुमटी या रहवासी इलाके की दुकानों में चल रहे छोटे-छोटे व्यापार, अब पड़ोस के दोस्ताना ठिकाने नहीं रह गए। रात में इनके बाहर, किसी बार जैसा माहौल होता है। लोग छोटी-मोटी बातों पर झगड़ने लगते हैं। आपने भी गौर किया होगा, कई ग्राहक अब खरीदारी करके या कुछ खाकर तुरंत नहीं जाते, बल्कि समूह बनाकर बातचीत और धूम्रपान में जुट जाते हैं। दुकानदार यही कहते हैं कि हम ग्राहकों को आवाज नीची रखने या जाने के लिए नहीं कह सकते। उन्हें व्यापार में नुकसान होने का डर रहता है। मुझे याद है, बचपन में मैं घर के पिछले हिस्से में बने वॉशरूम में माता-पिता के साथ ही जाना चाहता था क्योंकि गांव में अक्सर रात में चूहे घूमते थे। मेरे पिता जैसे ही लाइट जलाते, कुछ चूहे दौड़ते हुए दिखते और मैं चीख पड़ता। पिताजी तुरंत कहते, ‘चीखो मत, लोग सो रहे हैं।’ तब दूसरों की इतनी फिक्र की जाती थी। आधुनिक समाज में यह फिक्र धीरे-धीरे गायब हो रही है और कुछ युवा तो किसी के चेहरे पर सिगरेट का धुंआ छोड़ते हुए भी नहीं हिचकते। छोटे शहरों की तस्वीर बदल रही है। पैसा आ रहा है और नए व्यापार खुल रहे हैं। यह सब रोजगार के लिहाज से, हमारे युवाओं के लिए अच्छा है। वे अमेरिकी क्लाइंट लिए काम कर रहे आई़टी ऑफिस में नाइट शिफ्ट कर रहे हैं। लेकिन इन पढ़े-लिखे युवाओं को यह समझना होगा कि दूसरों के लिए रात, सोने का समय है। हमारी मेहनत का मतलब, दूसरे की शांति भंग करना नहीं है। फंडा यह है कि समय आ गया है जब हम बतौर समाज, ध्वनि प्रदूषण और आम अव्यवस्था व अशांति जैसी समस्याओं पर भी ध्यान दें, खासतौर पर रात के समय में। ऐसा न हुआ तो तेज़ी से बड़े हो रहे हमारे छोटे शहरों में, रात की नींद खतरे में पड़ जाएगी।