सुधांश पंत का कॉलम:सरकार में किसी भी स्तर पर फाइलें क्यों अटकनी चाहिए?

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हाल ही में हुए देश के मुख्य सचिवों के सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गवर्नेंस को और बेहतर करने के लिए पी2जी2 यानी ‘प्रो-पीपुल, प्रो-एक्टिव’ का उल्लेख किया। ‘प्रो-पीपुल’ का मतलब तो जनकल्याणकारी होता है। लेकिन यहां ‘प्रो-एक्टिव’ का अर्थ सिर्फ सक्रिय होना नहीं, बल्कि सूझबूझ के साथ सक्रिय होना है। गुड गवर्नेंस चाणक्य काल में भी था और समूचा शासन इसी पर आधारित था। उनके समय में भी जनहित ही सर्वोपरि था। असल में गुड गवर्नेंस वही है, जो पारदर्शी, उत्तरदायी और दक्ष हो। जो सहभागी, नैतिक और समानता से परिपूर्ण हो। गुड गवर्नेंस के लिए जरूरी है कि सरकार की नीतियों में ही नहीं, उसके रोजमर्रा के कामकाज में भी इन मूल्यों का अनुसरण हो। प्रधानमंत्री कई बार जिक्र कर चुके हैं कि सरदार पटेल इस मॉडल के बहुत बड़े पैरोकार थे। गुड गवर्नेंस के पी2जी2 मॉडल को अमली जामा पहनाने के लिए इसके अनुरूप नीतियां बनानी होंगी और इन्हें लागू करने के लिए सरकारी सिस्टम को और चुस्त-दुरुस्त करना होगा, ताकि आमजन को इसका पूरा लाभ मिल सके। इस मॉडल की सबसे अहम कड़ी सरकार के रोजमर्रा के कामकाज हैं। इस दिशा में राजस्थान ने दूसरे राज्यों के लिए मिसाल कायम की है। प्रदेश में सभी नोटशीट सरकार के पोर्टल ‘राजकाज’ पर निस्तारित हो रही हैं। ई-फाइलिंग से मुख्य सचिव, अतिरिक्त मुख्य सचिव, प्रमुख शासन सचिव, शासन सचिव, संभागायुक्त व कलेक्टर एवं अन्य सभी स्तरों पर फाइलें निस्तारित करने के समय में अभूतपूर्व कमी आई है। जनवरी 2024 में मुख्य सचिव से शासन सचिव तक के अधिकारियों का एक नोटशीट का औसत निस्तारण समय 24 घंटे 41 मिनट था, जो दिसम्बर तक घटकर महज 3 घंटे 47 मिनट रह गया है। यानी पहले के मुकाबले 6 गुना तेज गति से काम हो रहा है। इसी दौरान संभागीय आयुक्तों का औसत निस्तारण समय 31 घंटे 22 मिनट से 1 घंटा 9 मिनट और जिला कलेक्टरों का समय 36 घंटे 56 मिनट से 2 घंटा 20 मिनट हो गया है यानी कार्य के निष्पादन में 15 से 20 गुना से अधिक गति आई है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इस प्रक्रिया से हर स्तर के कर्मचारी जुड़े हैं। फाइल किसके पास लंबित है और इसके निस्तारण में किस अधिकारी या कर्मचारी ने कितना समय लिया है, यह बाकियों को भी दिखता है। इसने स्वत: ही एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और अनुशासन का माहौल बना दिया है। यह बताने की जरूरत नहीं है कि फाइल या नोटशीट सरकारी सिस्टम में कितनी अहम होती है। इनमें जो लिखा है, उससे ही नीतियां और योजनाएं धरातल तक पहुंचने के लिए निकलती हैं। इनके क्रियान्वयन और निगरानी का पूरा तंत्र भी फाइलों पर ही चलता है। आमजन से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े कार्य भी इन्हीं फाइल और नोटशीट के माध्यम से होते हैं। इनके निस्तारण में लगने वाले समय के आधार पर ही समाज में धारणा बनती है कि सरकार कितनी चुस्त है। लोगों को हर छोटे-बड़े काम के लिए सरकार में आवेदन करना पड़ता है। बाकायदा इसकी फाइल बनती है। यदि यह फाइल एक ही जगह रहती है या धीरे–धीरे आगे बढ़ती है तो व्यक्ति यही सोचेगा कि सिस्टम बहुत सुस्त है। ऐसा तभी हो सकता है जब यह निगरानी करने का कोई तंत्र न हो कि किसी कार्य को करने में हर चरण पर कितना समय लग रहा है। यह तंत्र विकसित होगा तो कोई भी अधिकारी बिना वजह या जानबूझकर फाइल के निस्तारण में ज्यादा समय नहीं लेगा। उसके दिमाग में बार-बार यह अलार्म बजता रहेगा कि उनकी इस हरकत को सभी नोटिस कर रहे हैं। राजकाज का काम ई-फाइलिंग पर करने का राजस्थान मॉडल बाकी राज्यों में भी अपनाया जा सकता है। सरकार में किसी भी स्तर पर कोई फाइल बिना किसी कारण के अटकनी ही क्यों चाहिए? टालमटोल की प्रकृति अधिकारियों में पद और प्रभाव के दुरुपयोग को जन्म दे सकती है। जो काम मिनटों में हो सकता है, उसके लिए दिनों का समय देना और जो काम दिनों में हो सकता है, उसके लिए सप्ताहों का समय देना अच्छे वर्क कल्चर की निशानी नहीं।(ये लेखक के अपने विचार हैं)