किताब का नाम- सेबस्टियन एंड संस- मृदंगम कारीगरों का संक्षिप्त इतिहास (‘सेबस्टियन एंड संस- ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ मृदंगम मेकर्स’ का हिंदी अनुवाद) लेखक- टी. एम. कृष्णा अनुवाद- निधीश त्यागी प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन मूल्य- 450 रुपए प्रशांत महासागर में स्थित ‘टोंगा’ देश की भाषा में एक चर्चित शब्द है 'टैबू'। हिंदी में इसका मतलब निषेध होता है, यानी ऐसे विषय या मुद्दे जिन पर सामान्य तौर पर बात करने की मनाही होती है। इस शब्द का जिक्र इसलिए किया गया, क्योंकि टी. एम. कृष्णा की किताब ‘सेबस्टियन एंड संस’ कई टैबू विषयों पर मुखर होकर बात करती है। इनमें गाय का चमड़ा, जातिप्रथा, धर्म परिवर्तन और करीगरों की अनदेखी जैसे मुद्दे शामिल हैं। पर्दे के पीछे की कहानी कहती है किताब यह किताब सिर्फ एक वाद्ययंत्र की कहानी नहीं है, बल्कि जाति व्यवस्था, मेहनत, धर्म, कला, सम्मान और भुला दिए गए लोगों की कहानी है। ये भारतीय समाज के उस पाखंड पर गहरी चोट करती है, जहां एक दलित करीगर को छूने की भी मनाही है, लेकिन उसी के हाथों गाय के चमड़े से बने मृदंगम पर मंदिरों में थाप दी जाती है। किताब की सबसे असरदार बात यह किताब मृदंगम की आवाज के पीछे छिपे लोगों को सामने लाती है। आमतौर पर लोग पालघाट मणि अय्यर, पलानी सुब्रमण्या पिल्लै या उमयालपुरम शिवरामन जैसे कलाकारों के बारे में जानते हैं, लेकिन उनके लिए मृदंगम बनाने वाले कारीगरों को नहीं जानते। लेखक बार-बार यह दिखाते हैं कि कलाकार मंच पर सम्मान पाते हैं, लेकिन कारीगरों की पहचान हमेशा पीछे छूट जाती है। एक जगह किताब में कहा गया है कि मृदंगम की अच्छी ध्वनि तीन चीजों से बनती है, 'हाथ की ध्वनि, चमड़े की ध्वनि और लकड़ी की ध्वनि'। लेकिन वहां कारीगर का नाम गायब है। ‘परलांदू’- याद रह जाने वाला किरदार किताब खत्म होने के बाद भी अगर कोई किरदार दिमाग में बना रहता है, तो वह परलांदू है। वे कोई बड़े कलाकार नहीं थे। वे मृदंगम बनाने वाले कारीगर थे। लेकिन किताब खत्म होते ही समझ आता है कि आधुनिक मृदंगम की ध्वनि को बदलने में उनका योगदान किसी बड़े कलाकार से कम नहीं था। कलाकार भी उनके हुनर को पहचानते थे। पालघाट मणि अय्यर जैसे लोग उनके काम को लेकर बेहद गंभीर थे। इतनी अहम भूमिका होने के बावजूद परलांदू इतिहास में सही जगह नहीं मिली। जाति व्यवस्था और छिपा हुआ भेदभाव मृदंगम बनाने वाले ज्यादातर कारीगर दलित समुदायों से आते थे। उसी मृदंगम पर थाप देने वाला कलाकार हर जगह सम्मान पाता है, लेकिन करीगर को पहचान तक नहीं मिलती। एक तरफ कलाकार कारीगर के बिना कुछ नहीं कर सकता। वहीं कारीगर सामाजिक ढांचे में नीचे रखा जाता है। कई बार लगता है कि संगीत की दुनिया खुद को जितना आधुनिक और आध्यात्मिक बताती है, उसके भीतर जाति उतनी ही गहराई से बैठी हुई है। धर्म परिवर्तन और पहचान का संघर्ष किताब का एक जरूरी हिस्सा धर्म परिवर्तन से जुड़ा है। मृदंगम बनाने वाले कई परिवारों ने ईसाई धर्म अपना लिया था। लेकिन धर्म बदलने से उनकी सामाजिक स्थिति पूरी तरह नहीं बदली। वे चर्च जाने लगे, उनके नाम बदल गए, लेकिन समाज उन्हें फिर भी चमड़े का काम करने वाले की तरह ही देखता रहा। यहां समझ आता है कि भारत में जाति सिर्फ धर्म का मामला नहीं है, बल्कि सामाजिक ढांचे में इतनी गहराई से मौजूद है कि धर्म परिवर्तन भी उसे पूरी तरह मिटा नहीं पाता। समाज की विडंबना किताब का सबसे जरूरी हिस्सा गाय के चमड़े पर की गई चर्चा है। मृदंगम की ध्वनि के लिए गाय की खाल बेहद खास मानी जाती है। कई कलाकार खुद सबसे अच्छी खाल चुनने के लिए जाते थे। लेकिन सार्वजनिक रूप से इस पर बहुत कम बात की जाती थी। यही इस समाज का बड़ा विरोधाभास है। एक तरफ गाय को पवित्र माना जाता है, दूसरी तरफ उसी गाय की खाल से बना वाद्ययंत्र शास्त्रीय संगीत का सबसे जरूरी हिस्सा है। लेकिन इस काम को करने वाले लोग हमेशा सामाजिक शर्म और दूरी के साथ जीते रहे। मृदंगम बनाने की कठिन मेहनत यह किताब पढ़ने के बाद समझ आता है कि मृदंगम बनाना सिर्फ एक तकनीकी काम नहीं, बल्कि बेहद कठिन शारीरिक मेहनत है। सही लकड़ी चुनना, उसे सालों तक सुखाना, चमड़े को साफ करना, जावु निकालना, वारु कसना, सादम लगाना हर काम में महीनों का अनुभव और ताकत लगती है। कई कारीगरों की कमर और घुटने लगातार मेहनत से खराब हो जाते थे। पोइवारु पिडी कसने में इतनी ताकत लगती थी कि शरीर टूट जाता था। लेकिन कलाकारों की मांग खत्म नहीं होती थी। अगर आवाज में थोड़ा भी फर्क हो जाए, तो पूरा काम दोबारा करना पड़ता था। वे किस्से, जो याद रह जाते हैं इस किताब में कई ऐसे किस्से हैं जो लंबे समय तक दिमाग में बने रहते हैं। जैसे पलानी सुब्रमण्या पिल्लै का यह कहना कि अगर मृदंगम के सादम पर मक्खी भी बैठकर उड़े, तो उसकी आवाज भी सुनाई देनी चाहिए। यह सिर्फ एक मजेदार बात नहीं, बल्कि ध्वनि को लेकर कलाकार की दीवानगी दिखाती है। एक और याद रह जाने वाला हिस्सा वह है, जहां कारीगर बताते हैं कि कलाकार उन्हें बार-बार वारु कसने के लिए कहते थे और बीच-बीच में चाय पिलाकर फिर काम करवाते थे। यह दृश्य सुनने में साधारण लगता है, लेकिन उसमें पावर स्ट्रक्चर की पूरी कहानी छिपी है। भाषा और लिखने का ढंग किताब खत्म होने के बाद मृदंगम की आवाज पहले जैसी नहीं लगती। हर थाप के पीछे किसी कारीगर का झुका हुआ शरीर याद आता रहता है। कोई चमड़ा सुखा रहा है, कोई वारु कस रहा है, कोई घंटों बैठकर मिट्टु और चप्पु का बैलेंस ठीक कर रहा है। सबसे अच्छी बात यह है कि किताब कहीं भी भारी अकादमिक भाषा का बोझ नहीं डालती। इसमें रिसर्च के साथ संवेदना भी है। यह किताब क्यों पढ़नी चाहिए? अगर किसी को कर्नाटिक संगीत में रुचि है, तो यह किताब लगभग जरूरी है। लेकिन सिर्फ संगीत प्रेमियों तक इसे सीमित करना गलत होगा। यह किताब सिर्फ संगीत प्रेमियों के लिए नहीं है। इसे उन सभी लोगों को पढ़ना चाहिए जो भारतीय समाज, जाति व्यवस्था, मेहनत और कला के रिश्ते को समझना चाहते हैं। किताब के बारे में मेरी राय मेरी नजर में ‘सेबस्टियन एंड संस’ सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि भारतीय समाज का आईना है। यह किताब मृदंगम की कहानी कहते हुए दरअसल उन लोगों की कहानी कहती है, जिन्हें हमेशा हाशिये पर रखा गया। सबसे बड़ी बात ये है कि किताब किसी पर गुस्सा थोपती नहीं, बल्कि धीरे-धीरे हमें उस दुनिया के भीतर ले जाती है, जहां सम्मान, कला और जाति आपस में उलझे हुए हैं। यही इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है। ………………ये रिव्यू भी पढ़िएबुक रिव्यू- सुर साधना में डूबे कलाकार की यात्रा: समझना है कि कोई कैसे बनता है महान, तो मल्लिकार्जुन मंसूर की ये आत्मकथा पढ़िए यह उस आदमी की कहानी है जिसने संगीत को पेशे की तरह नहीं, जीवन की तरह जिया। किताब में उनका बचपन, थिएटर के दिन, गुरुओं की डांट और प्यार भी है। कभी रियाज की बातें होती हैं तो कभी महफिलों की चमक है। आगे पढ़िए...