NASA Regenerative Fuel Cell: इंसानों को चांद पर बसाने का सपना अब पहले से ज्यादा वास्तविक नजर आने लगा है. अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA एक ऐसी नई ऊर्जा तकनीक पर काम कर रही है जो भविष्य में चांद और मंगल ग्रह पर लंबे समय तक इंसानों की मौजूदगी को संभव बना सकती है. यह तकनीक है रीजेनेरेटिव फ्यूल सेल जिसे NASA अपने मिशनों के लिए एक गेम-चेंजर मान रहा है.आखिर क्या है NASA की नई रीजेनेरेटिव फ्यूल सेल?रीजेनेरेटिव फ्यूल सेल को एक विशेष प्रकार की रिचार्जेबल एनर्जी सिस्टम कहा जा सकता है. यह हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को मिलाकर बिजली, गर्मी और पानी पैदा करती है. जब इसे दोबारा चार्ज करना होता है तो यही पानी फिर से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित कर दिया जाता है जिससे ऊर्जा चक्र लगातार चलता रहता है.NASA का मानना है कि यह तकनीक चंद्रमा पर ऊर्जा आपूर्ति की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक का समाधान कर सकती है. खासकर उन क्षेत्रों में जहां लंबे समय तक सूर्य की रोशनी नहीं पहुंचती और सोलर पैनल प्रभावी नहीं रह जाते.चांद पर ऊर्जा की समस्या क्यों है इतनी बड़ी?चंद्रमा पर दिन और रात का चक्र पृथ्वी की तुलना में काफी अलग है. वहां एक दिन और एक रात लगभग 14-14 पृथ्वी दिनों के बराबर होते हैं. इसका मतलब है कि कई क्षेत्रों में लगातार दो सप्ताह तक अंधेरा छाया रह सकता है.इतने लंबे अंधेरे में सौर ऊर्जा पर निर्भर रहना मुश्किल हो जाता है. इसके अलावा तापमान भी बेहद खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता है जो डिवाइसेज और इंसान दोनों के लिए चुनौती बनता है. यही वजह है कि NASA ऐसे ऊर्जा स्रोतों की तलाश में है जो लगातार बिजली उपलब्ध करा सकें.Artemis मिशन के लिए होगी अहमNASA का Artemis कार्यक्रम इंसानों को दोबारा चंद्रमा पर भेजने की तैयारी कर रहा है. हाल ही में Artemis II मिशन के जरिए अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा के आसपास भेजने का महत्वपूर्ण चरण पूरा किया गया. आने वाले वर्षों में NASA चंद्रमा पर नियमित मिशन, वैज्ञानिक अनुसंधान और परमानेंट घर बनाने की योजना बना रहा है. ऐसे में नई फ्यूल सेल तकनीक रोवर्स, वैज्ञानिक डिवाइस और रहने योग्य मॉड्यूल्स को ऊर्जा प्रदान करने में बड़ी भूमिका निभा सकती है.आकार में बड़ी लेकिन क्षमता में और भी विशालNASA द्वारा विकसित किया जा रहा यह सिस्टम आकार में एक छोटी कार जितना बड़ा है. इसमें करीब 1,000 से अधिक पुर्जे और सैकड़ों सेंसर लगे हुए हैं. इसके बावजूद वैज्ञानिकों का कहना है कि समान क्षमता वाली पुरानी बैटरी सिस्टम की तुलना में इसका वजन अपेक्षाकृत कम है. फिलहाल वैज्ञानिक इसकी कार्यक्षमता बढ़ाने पर काम कर रहे हैं.चंद्रमा पर बसावट के लिए क्यों जरूरी है यह तकनीक?पारंपरिक लिथियम-आयन बैटरियां लंबे समय तक चलने वाले अंतरिक्ष मिशनों के लिए पर्याप्त नहीं मानी जातीं. उनकी ऊर्जा स्टोर करने की क्षमता सीमित होती है और उन्हें बार-बार चार्ज करने की आवश्यकता पड़ती है. इसके मुकाबले रीजेनेरेटिव फ्यूल सेल समान वजन वाली बैटरियों की तुलना में कई गुना अधिक ऊर्जा स्टोर कर सकती है. यही कारण है कि NASA इसे भविष्य की चंद्र बस्तियों और लंबी अवधि के मिशनों के लिए एक मजबूत विकल्प मान रहा है.2030 तक बन सकती है पहली स्थायी मून कॉलोनीNASA की दीर्घकालिक योजना चंद्रमा पर स्थायी मानव उपस्थिति स्थापित करने की है. एजेंसी को उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में कई मिशनों, दर्जनों लॉन्च और अरबों डॉलर के निवेश के बाद चंद्रमा पर पहली स्थायी कॉलोनी स्थापित की जा सकेगी.यह भी पढ़ें:CBSE पर साइबर हमला! आखिर क्या होता है Denial-of-Service Attack और क्यों मच जाती है डिजिटल दुनिया में अफरा-तफरी?