पेरेंटिंग- 10 साल का बेटा गाली देने लगा है:स्कूल के दोस्तों से एडल्ट गालियां सीख रहा है, बच्चे को बाहर के प्रभाव से कैसे बचाएं?

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सवाल- मैं यूपी के आगरा से हूं। मेरा बेटा 10 साल का है। वह पढ़ने-लिखने में काफी अच्छा है। लेकिन हाल ही में एक घटना ने हमें सोचने पर मजबूर कर दिया। किसी छोटी बात पर उसने एडल्ट गाली (फाउल वर्ड) इस्तेमाल की। जब हमने प्यार से पूछा कि उसने यह कहां सीखा, तो बताया कि स्कूल में उसके दोस्त भी ऐसा बोलते हैं। हम घर में हमेशा सही भाषा का इस्तेमाल करते हैं और उसे अच्छे व्यवहार की सीख देते हैं। ऐसे में मुझे समझ नहीं आ रहा कि सही माहौल के बावजूद वह बाहर से ऐसी चीजें कैसे सीख रहा है। उसे बाहरी इन्फ्लुएंस से कैसे बचाएं और गाली देना गलत है, यह कैसे समझाएं? प्लीज गाइड मी। एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर जवाब- सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि 8-12 साल की उम्र में बच्चे अपने आसपास की भाषा, व्यवहार और रिएक्शन बहुत तेजी से कॉपी करते हैं। इसलिए अगर बच्चा गाली दे तो इसका मतलब यह नहीं कि उसकी परवरिश गलत हो रही है। बच्चे गाली का मतलब अक्सर बिना समझे ‘मजेदार’, ‘कूल’ या ‘अटेंशन पाने वाला शब्द’ मानकर दोहराते हैं। यहां सबसे जरूरी बात यह है कि इस पर माता-पिता कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। पहले ये समझें कि बच्चे आखिर गाली कैसे सीखते हैं। बच्चे गाली कैसे सीखते हैं? बच्चे अपने आसपास के माहौल को देखकर, सुनकर और उसकी नकल करके भाषा सीखते हैं। कई बार उन्हें किसी शब्द का मतलब भी नहीं पता होता, लेकिन वह दूसरों की प्रतिक्रिया देखकर उसे दोहराने लगते हैं। इसलिए यह समझना जरूरी है कि बच्चा गाली कहां से और किन परिस्थितियों में सीख रहा है, तभी उसे रोका जा सकता है। आमतौर पर बच्चे इन वजहों से गाली सीखते हैं- बच्चे गाली क्यों देते हैं? हर बार गाली देना बदतमीजी या खराब परवरिश की निशानी नहीं है। छोटे बच्चे अक्सर किसी का ध्यान आकर्षित करने, अपनी भावनाएं व्यक्त करने या दोस्तों के बीच खुद को बड़ा और स्मार्ट दिखाने के लिए ऐसे शब्द बोल देते हैं। कई बार वे गुस्सा, निराशा या हताशा को शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते, इसलिए भी गाली का सहारा लेते हैं। ग्राफिक में देखिए बच्चे गाली क्यों देते हैं- पेरेंट्स क्या करें? सबसे पहले शांत माहौल में बच्चे से बात करें। उससे पूछें- इस तरह की बातचीत बच्चे की सोचने-समझने की क्षमता बढ़ाती है। बच्चे को बताना जरूरी है कि ये शब्द दूसरों को चोट पहुंचा सकते हैं। बच्चे को क्या समझाना चाहिए? उसे यह बताना जरूरी है कि हर शब्द का अपना एक मतलब और असर होता है। इसके लिए बच्चे से कहें- आप उसे कुछ ‘रिप्लेसमेंट वर्ड्स‘ भी सिखा सकते हैं। जैसे गुस्सा आए तो गाली की जगह “ओह नो”, “ये सही नहीं है”, “मुझे बहुत गुस्सा आ रहा है” जैसे शब्द इस्तेमाल करे। साथ ही नीचे ग्राफिक में दी गई बातों का भी खास ख्याल रखें। स्थिति को संभालने के 5 प्रभावी तरीके ऐसी स्थिति में पेरेंट्स को रोल नहीं, रिस्पॉन्स बदलने की जरूरत है। 1. उस पल की प्रतिक्रिया तय करेगी आगे का व्यवहार जब बच्चा पहली बार गाली देता है तो पेरेंट्स अक्सर शॉक या गुस्से में रिएक्ट करते हैं। लेकिन यही सबसे बड़ी गलती होती है। क्या करें? क्यों? अगर आप ओवररिएक्ट करेंगे, तो बच्चा या तो डर जाएगा या वही शब्द बार-बार अटेंशन पाने के लिए इस्तेमाल करेगा। 2. ‘मत बोलो‘ की जगह ‘क्यों नहीं बोलना‘ समझाएं बच्चे को सिर्फ रोकना काफी नहीं होता, उसे समझना जरूरी है कि गाली देना गलत क्यों है। कैसे समझाएं? इससे बच्चे में दूसरों की भावना समझने की क्षमता विकसित होती है। 3. ‘विकल्प’ देना जरूरी अगर बच्चा गुस्सा या फ्रस्टेशन निकालने के लिए गाली देता है तो उसे बताएं कि गुस्सा आने पर- इसके लिए सही वाक्य हो सकते हैं- यह टेक्नीक ‘बिहेवियर रिप्लेसमेंट’ कहलाती है और बहुत इफेक्टिव होती है। 4. दोस्तों से दूर करने की बजाय समझ विकसित करें बहुत से पेरेंट्स सोचते हैं कि बच्चे को उन दोस्तों से दूर कर देना चाहिए। लेकिन यह हमेशा प्रैक्टिकली पॉसिबल नहीं होता और उल्टा बच्चा रिबेल (विद्रोही) भी बन सकता है। बेहतर तरीका क्या है? बच्चे से खुलकर बात करें। उससे पूछें- इससे बच्चे में इंडिपेंडेंट थिंकिंग विकसित होती है। 5. घर का माहौल ही सबसे बड़ा फिल्टर है बच्चा बाहर के लोगों इन्फ्लुएंस हो सकता है, लेकिन वह क्या अपनाएगा, यह घर तय करता है। क्या करें? याद रखें, बच्चे सुनने से ज्यादा देखने से सीखते हैं। क्या बिल्कुल नहीं करना चाहिए? इस स्थिति में पेरेंट्स की कुछ प्रतिक्रियाएं बच्चे को गलत दिशा में ले जा सकती हैं- इससे बच्चा या तो डर जाता है या छुपकर वही व्यवहार जारी रखता है। आउटर इंफ्लुएंस से पूरी तरह बचाना संभव नहीं बच्चे स्कूल, इंटरनेट, गेमिंग और सोशल सर्कल से कई अच्छी-बुरी चीजें सीखते हैं। इसलिए लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि वह कभी गलत शब्द सुने ही नहीं। असली लक्ष्य यह होना चाहिए कि बच्चा सही-गलत में फर्क समझना सीख जाए। यानी बच्चा अगर बाहर गाली सुनता भी है, तब भी वह खुद तय कर सके कि उसे कौन-सी भाषा इस्तेमाल करनी है। यही इमोशनल और सोशल मैच्योरिटी है। कब सावधान होने की जरूरत है? अगर बच्चा- तो यह बिहेवियरल इश्यू बन सकता है। ऐसे में चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट या काउंसलर की मदद लेना बेहतर है। अंत में यही कहूंगी कि बच्चे को बाहरी दुनिया से पूरी तरह अलग रखना संभव नहीं है। लेकिन उसे सही सोच, संवेदनशीलता और सम्मानजनक व्यवहार सिखाया जा सकता है। अगर घर में खुला माहौल हो, जहां बच्चा बिना डर अपनी बात कह सके और माता-पिता धैर्य के साथ उसे गाइड करें, तो वह धीरे-धीरे सही और गलत में फर्क समझने लगता है। …………………. पेरेंटिंग की ये खबर भी पढ़िए पेरेंटिंग- 4 साल के बेटे को कभी डांटा-मारा नहीं: अब वो बहुत जिद्दी हो गया है, बच्चे को बिना डांटे प्यार से डिसिप्लिन कैसे सिखाएं बच्चों की जिद को पेरेंट्स सिर्फ बिहेवियरल प्रॉब्लम मान लेते हैं, जबकि इसके पीछे कई साइकोलॉजिकल, पेरेंटिंग और एनवायर्नमेंटल कारण छिपे होते हैं। अगर इन कारणों को सही तरीके से समझ लिया जाए, तो बच्चे के व्यवहार को संभालना आसान हो जाता है। पूरी खबर पढ़िए…