किंवदंती है कि महाकवि कालिदास को मां गढ़कालिका के आशीर्वाद से ही ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। मंदिर के गर्भगृह में मां गढ़कालिका का मुख भव्य स्वरूप में है, जिसमें दो विशाल नेत्र और जिव्हा बाहर निकली हुई है। मूर्ति सिंदूर से आच्छादित रहती है। मूर्ति के दोनों ओर महासरस्वती तथा महालक्ष्मी की मूर्तियां हैं।