मेंटल हेल्थ– अपनी हर खुशी सोशल मीडिया पर दिखाता हूं:लाइक–कमेंट न मिले तो तनाव होता है, खुशी बेमानी लगती है, क्या ये नॉर्मल है

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सवाल– मैं 31 साल का हूं। हाल ही में मुझे प्रमोशन मिला है। बाहर से देखने पर मेरी जिंदगी ठीक लगती है, लेकिन मैं एक अजीब समस्या से जूझ रहा हूं। जब भी मेरे साथ कोई अच्छी बात होती है, तो मुझे उसे तुरंत सोशल मीडिया पर शेयर करने की इच्छा होती है। अगर लोग बधाई दें, तारीफ करें तो मुझे अच्छा लगता है। लेकिन अगर अपेक्षा के अनुसार रिएक्शन न मिले तो खुशी अधूरी लगती है। कई बार ऐसा हुआ है कि किसी अचीवमेंट को लेकर मैं सिर्फ तब तक उत्साहित रहा, जब तक लोगों के मैसेज, कमेंट्स आते रहे। बाद में वही अचीवमेंट मुझे खास नहीं लगा। क्या मैं अपनी खुशी बाहर ढूंढ रहा हूं? अगर हां, तो इससे कैसे बाहर निकलूं? एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर। यह सिर्फ आपकी कहानी नहीं है। सोशल मीडिया के दौर में बड़ी संख्या में लोग इस अनुभव से गुजर रहे हैं। यहां बात ये नहीं है कि अपनी खुशी साझा करना गलत है। सवाल यह है कि हमारी खुशी का स्रोत हमारा अचीवमेंट है या फिर दूसरों का वैलिडेशन? यहीं से शुरू होती है बाहरी मान्यता यानी एक्सटर्नल वैलिडेशन की कहानी। कल्पना कीजिए कि आपने महीनों मेहनत करके कोई लक्ष्य हासिल किया। पहले आपकी खुशी इस बात से तय होती थी कि– लेकिन अब आपकी खुशी का एक हिस्सा इस पर निर्भर हो गया है कि आपकी पोस्ट पर कितने लाइक्स आए, किसने बधाई दी और किसने नहीं दी। यहीं पर उपलब्धि का केंद्र बदल जाता है। पहले सवाल होता था: धीरे-धीरे अचीवमेंट की असली खुशी पीछे छूट जाती है और उसकी जगह सोशल वैलिडेशन ले लेता है। खुशी के दो चेहरे: आंतरिक और बाहरी मनोविज्ञान में उपलब्धियों से मिलने वाली खुशी को मोटे तौर पर दो हिस्सों में बांटा जाता है। 1. आंतरिक खुशी यह वह खुशी है, जो भीतर से आती है। जब आप सोचते हैं: "मैंने मेहनत की, मैंने कुछ नया सीखा, मैं अपने लक्ष्य तक पहुंचा।" ये खुशी अपेक्षाकृत स्थिर होती है। यह लंबे समय तक बनी रहती है क्योंकि इसका स्रोत आपके भीतर है। 2. बाहरी खुशी यह खुशी दूसरों के रिएक्शन से पैदा होती है। यह खुशी बुरी नहीं है। समस्या तब होती है, जब यही खुशी का मुख्य स्रोत बन जाए क्योंकि बाहरी प्रतिक्रिया हमेशा आपके नियंत्रण में नहीं होती। सोशल मीडिया और डोपामिन का खेल जब हम सोशल मीडिया पर कोई उपलब्धि पोस्ट करते हैं और लोगों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलती है तो मस्तिष्क में डोपामिन नामक न्यूरोट्रांसमीटर सक्रिय होता है। डोपामिन को अक्सर ‘फील-गुड केमिकल’ कहा जाता है, लेकिन वास्तव में यह केवल खुशी से नहीं, बल्कि इनाम मिलने की उम्मीद से भी जुड़ा होता है। यही कारण है कि लोग बार-बार नोटिफिकेशन चेक करते हैं- धीरे-धीरे दिमाग सीखने लगता है कि उपलब्धि से ज्यादा रोमांच प्रतिक्रिया में है। तब व्यक्ति अनजाने में यह मानने लगता है कि: "जब तक लोग मेरी सफलता को अप्रूव नहीं करेंगे, तब तक वह पूरी तरह रिअल नहीं लगेगी। यहीं से निर्भरता शुरू होती है।" सोशल मीडिया कैसे बन जाता है एक अदृश्य जज सोशल मीडिया एक मंच है, लेकिन कई लोगों के लिए यह धीरे-धीरे एक मनोवैज्ञानिक जज की तरह काम करने लगता है। हम खुद से पूछने लगते हैं: समस्या यह है कि सोशल मीडिया वास्तविक जीवन का आईना नहीं है। वहां हम सिर्फ अपना अच्छा और खुशहाल चेहरा दिखाते हैं, सिर्फ अपनी उपलब्धियां दिखाते हैं। वहां हम अपना दुख, तकलीफ, निराशा और अकेलापन नहीं दिखाते। जब उपलब्धियां छोटी लगने लगें बाहरी मान्यता पर निर्भरता का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि व्यक्ति अपनी उपलब्धियों का आनंद लेना भूल जाता है। उसे एक प्रमोशन मिलता है, लेकिन कुछ समय बाद वह सोचता है: "लेकिन मेरे दोस्त का प्रमोशन बड़ा था।" एक उपलब्धि मिलती है। फिर लगता है: "मुझे उतनी बधाई नहीं मिली।" इस तरह ध्यान उपलब्धि से हटकर तुलना पर चला जाता है। इसका नतीजा ये होता है कि : मनोविज्ञान में इसे हेडॉनिक ट्रेडमिल (Hedonic Treadmill) कहा जाता है। यानी आप लगातार दौड़ रहे हैं, लेकिन संतोष वहीं-का-वहीं खड़ा है। क्या आपकी खुशी बाहरी वैलिडेशन पर निर्भर है? हर व्यक्ति को जीवन में कुछ हद तक बाहरी वैलिडेशन की जरूरत होती है। आखिर हम सब सामाजिक प्राणी हैं। लेकिन कुछ संकेत बताते हैं कि ये निर्भरता हद से ज्यादा बढ़ रही है। इसे समझने के लिए यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। नीचे ग्राफिक्स में तीन सेक्शंस में कुल 15 सवाल हैं। आपको इन सवालों को 0 से 4 के स्केल पर रेट करना है। जैसेकि पहले सवाल के लिए अगर आपका जवाब 'कभी नहीं' है तो 0 नंबर दें और अगर आपका जवाब 'लगभग हमेशा' है तो 4 नंबर दें। अंत में अपने टोटल स्कोर की एनालिसिस करें। स्कोर का इंटरप्रिटेशन भी ग्राफिक में दिया है। वैलिडेशन के ट्रैप से बाहर कैसे निकलें CBT आधारित सेल्फ हेल्प प्लान स्टेप 1 अचीवमेंट की परिभाषा बदलें जब भी कोई सफलता मिले तो खुद से ये पांच सवाल पूछें: ध्यान देने वाली बात: यहां पर आखिरी सवाल सबसे महत्वपूर्ण है। यदि आपका जवाब ‘हां’ है तो आपकी उपलब्धि वास्तविक है। उसे किसी लाइक की जरूरत नहीं। स्टेप 2 लाइक्स को नहीं, अपनी कोशिश को स्कोर दें हम अपनी उपलब्धियों को हमेशा नतीजों से मापते हैं। लेकिन मनोविज्ञान ये कहता है कि अचीवमेंट से ज्यादा जरूरी और महत्वपूर्ण है– प्रयास। यानी हम कितनी कोशिश करते हैं। ये कोशिश बाहरी दुनिया के वैलिडेशन से बिलकुल अलग हमारी पर्सनल जर्नी होती है। इसलिए एक काम करिए। अपनी एक अचीवमेंट डायरी बनाइए। उस डायरी में किसी भी उपलब्धि से जुड़ी अपनी हर कोशिश के लिए कॉलम बनाइए और उन सबको नंबर दीजिए। डायरी में सोशल मीडिया पर मिली तारीफों और कमेंट का कोई कॉलम नहीं रखिए। यह अभ्यास धीरे-धीरे दिमाग को नए तरीके से सोचने की ट्रेनिंग देगा। स्टेप 3 अपने विचारों को चुनौती देना कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT) का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत ये है कि हमारे मन में आने वाली हर बात और हर विचार सच नहीं होता। इस बात को एक उदाहरण से समझिए। आपका प्रमोशन हुआ, आपने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। लोगों ने इस पर ज्यादा रिएक्ट नहीं किया। अब आपके मन में ऐसे विचार आ सकते हैं– विचार: "लोगों ने ज्यादा रिएक्शन नहीं दिया, इसलिए मेरा ये अचीवमेंट खास नहीं है।" सच्चाई: स्टेप 4 असली लोगों को महत्व दीजिए, ऑडियंस को नहीं कई बार सोशल मीडिया पर 500 लोगों की प्रतिक्रिया का असर उन 5 लोगों से ज्यादा हो जाता है, जो वास्तव में हमारे जीवन का हिस्सा हैं। इसलिए उन लोगों की लिस्ट बनाइए, जो आपके जीवन में सचमुच में मायने रखते हैं। जैसेकि: फिर सोचिए: "इन लोगों की राय ज्यादा महत्वपूर्ण है या उन लोगों की, जिनसे मैंने वर्षों से बात नहीं की?" जवाब बिल्कुल साफ होता है। सच्चे रिश्ते लाइक्स से ज्यादा मूल्यवान होते हैं। स्टेप 5 निजी सेलिब्रेशन करना सीखिए हर खुशी को पब्लिक करना, सबके सामने उसका ढोल पीटना जरूरी नहीं है। कुछ खुशियां बहुत पर्सनल भी होती हैं। हर चीज को तुरंत पब्लिक करने और लोगों से बांटने की बजाय कुछ वक्त तक उसके साथ अकेले रहना चाहिए। मनोवैज्ञानिक सलाह देते हैं कि कोई अचीवमेंट हासिल होने पर कम–से–कम 48 घंटे तक उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट न करें। इन 48 घंटों में: कई लोग पाते हैं कि दो दिन के बाद उस उपलब्धि को पोस्ट करने की इच्छा बहुत कम हो जाती है क्योंकि तब तक वे उसे भीतर से महसूस कर चुके होते हैं। खुशी का सबसे भरोसेमंद सोर्स दूसरों की प्रशंसा अच्छी लगना पूरी तरह सामान्य है। समस्या प्रशंसा नहीं, बल्कि उस पर निर्भरता है। सोशल मीडिया की तालियां सुखद हो सकती हैं, लेकिन वे आत्मसम्मान की नींव नहीं बन सकतीं। स्थायी संतोष तब पैदा होता है, जब व्यक्ति खुद से कह सके: "मैंने मेहनत की। मैंने सीखा। मैं अपने मूल्यों के अनुसार आगे बढ़ा। इसलिए यह उपलब्धि महत्वपूर्ण है।" अंतिम बात जिस दिन आपकी उपलब्धि का मूल्य लाइक्स से नहीं, बल्कि आपके प्रयासों से तय होने लगेगा, उसी दिन खुशी ज्यादा स्थिर और गहरी महसूस होगी क्योंकि तब आपकी सफलता दूसरों की स्क्रीन पर नहीं, आपके भीतर दर्ज होगी। ………………ये खबर भी पढ़िएमेंटल हेल्थ- लोगों के सामने बोलने में डर लगता है: डरती हूं, लोग मुझे मूर्ख समझेंगे, जज करेंगे, इस शर्मिंदगी से बाहर कैसे निकलूं हर इंसान चाहता है कि लोग उसे पसंद करें, लेकिन अगर यह चिंता हर वक्त मन में बनी रहे कि “लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे,” तो यह आत्मविश्वास और रिश्तों, दोनों को प्रभावित करने लगती है। बचपन की आलोचना मन में असुरक्षा पैदा कर सकती है। लेकिन अच्छी बात यह है कि यह कोई कमजोरी नहीं, बल्कि एक सीखा हुआ डर है, जिसे सही समझ, छोटे-छोटे अभ्यास और सपोर्ट से बदला जा सकता है। आगे पढ़िए…