मार्च की शुरुआत होते ही बिहार में गंगा के मैदानी इलाकों में 'पछुआ' के नाम से जानी जाने वाली झुलसा देने वाली पश्चिमी हवाएं चलने लगती हैं. सर्दियों की धुंध की जगह अब तपिश से भरी धुंध ने ले ली है और नदी किनारों से उठने वाली धूल हर वक्त हवा में तैरती रहती हैबिहार के भोजपुर जिले के एक ग्रामीण इलाके, लौहर फरना की संकरी और धूप से तपती गलियों में यह गर्मी सिर्फ मौसम का बदलाव भर नहीं है. यह उन लोगों के जहन में बढ़ती बेचैनी का आईना भी है, जो सदियों पुराने सामाजिक रीति-रिवाजों और आज के जमाने के कर्ज के जाल के बीच फंसे हुए हैं.ऐसी ही एक तपती दोपहर में, 60 साल के कृष्णा बिंद अपनी मिट्टी की झोपड़ी के बाहर बैठे हैं. पुरानी, जर्जर दीवार से पीठ टिकाए वे बड़े ही ध्यान से बांस की खपच्चियों को छील रहे हैं.कृष्णा बिंद (दाएं) अपने परिवार के साथ.बांस के छिलाने की वह सूखी और एक जैसी आवाज ही उस घर की इकलौती धड़कन है, जहां की हंसी-खुशी को बहुत पहले ही स्थानीय साहूकार (महाजन) के पास गिरवी रख दिया गया था. कृष्णा की बर्बादी की शुरुआत किसी अचानक आई प्राकृतिक आपदा से नहीं हुई थी, बल्कि इसकी वजह समाज द्वारा तय किए गए रीति-रिवाजों और सामाजिक दबावों की वे बेड़ियां थीं, जो परंपरा के नाम पर थोप दी जाती हैं.'मृत्यु भोज' का दबाव: कृष्णा बिंद की आपबीतीनवंबर 2025 में, बिंद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. कृष्णा का 26 साल का छोटा बेटा रुदल बिंद राजमिस्त्री का काम करता था. एक कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करते हुए वो बहुमंजिला इमारत से नीचे गिर गया. अस्पताल में उसने काफी हाथ-पांव मारे, लेकिन अगले ही दिन, 9 नवंबर को इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई.अभी परिवार अपने घर के कमाने वाले सदस्य को अचानक खोने के सदमे से संभल भी नहीं पाया था कि आस-पड़ोस के लोगों की हमदर्दी अचानक एक कड़े और बेरहम सवाल में बदल गई: 'मृत्यु भोज' (श्राद्ध का भोज) कितना बड़ा और कैसा होगा?बिहार के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले बिंद समुदाय, जो ओबीसी का एक वंचित वर्ग है, के पास आर्थिक संपत्ति लगभग न के बराबर है, गांव की जातिगत सामाजिक व्यवस्था में हासिल प्रतिष्ठा ही परिवार की सबसे बड़ी पूंजी होती है.अगर किसी ने तेरहवीं पर भारी-भरकम भोज नहीं दिया, तो समाज उसे तुरंत हुक्का-पानी बंद करने की धमकी देने लगता है. यह एक ऐसी अदृश्य दीवार बन जाती है, जिसके बाद न तो पड़ोसी आपसे बात करते हैं और न ही आपका परिवार गांव के किसी सुख-दुख का हिस्सा रह जाता है.इसी भारी सामाजिक दबाव और बिरादरी से बाहर कर दिए जाने के डर से, कृष्णा को बेटे की मौत के महज 10 दिनों के भीतर गांव के ही एक सूदखोर (साहूकार) से 1 लाख रुपये का भारी कर्ज लेने पर मजबूर होना पड़ा, ताकि वो मृत्यु भोज का खर्च उठा सकें.कड़कड़ाती धूप में बांस छीलते हुए कृष्णा ने शून्य में ताकते हुए द क्विंट को बताया,पूर्वजों का सम्मान हो गया, पूरे गांव को भोज भी मिल गया, लेकिन उस दिन मेरी शांति मर गई."आज उनकी पुरखों की महज 5 कट्ठा (करीब 0.15 एकड़) जमीन साहूकार के पास गिरवी पड़ी है. 60 साल की उम्र में कृष्णा बांस की टोकरियां इसलिए नहीं बुन रहे कि बुढ़ापा आराम से कटे, बल्कि इसलिए बुन रहे हैं ताकि साहूकार के 60 फीसदी सालाना ब्याज (सालाना 60% इंटरेस्ट रेट) की आग को शांत कर सकें.दुखों का यह पहाड़ सिर्फ पैसों की बर्बादी पर ही नहीं थमा, बल्कि इसने परिवार के एक और सदस्य को मानसिक रूप से तोड़ कर रख दिया. कृष्णा का बड़ा बेटा, 36 साल का चंद्रमा बिंद, एक तरफ छोटे भाई की मौत का सदमा और दूसरी तरफ अचानक सिर पर आए कर्ज के इस दोहरे बोझ को बर्दाश्त नहीं कर पाया.चंद्रमा की मानसिक स्थिति अब बेहद खराब हो चुकी है. जब गर्मी की रातें एकदम शांत होती हैं, तो अचानक उसकी चीखें गांव का सन्नाटा चीर देती हैं. "मैं मर जाऊंगा! वो कर्ज मुझे खा जाएगा!" बड़े बेटे की इन चीखों ने इस टूटे हुए परिवार को हमेशा के लिए एक खौफ के साए में जीने को मजबूर कर दिया है.संकटों के जाल में घिरा परिवार: फंका बिंद की दास्तानयहां से कुछ ही मील दूर बरहरा ब्लॉक के मतुकपुर गांव में, एक और बिंद परिवार की कहानी सामने आती है. यह कहानी मानसिक रोग विशेषज्ञों (psychiatrists) के उस दावे का जीता-जागता और डरावना उदाहरण है, जिसे वे 'पॉलीक्राइसिस' कहते हैं. पॉलीक्राइसिस का मतलब है जब एक के बाद एक कई बड़ी मुसीबतें एक साथ टूट पड़ती हैं, और इंसान को संभलने का मौका ही नहीं मिलता. अभी कुछ समय पहले तक, 48 साल के फनका बिंद इस कमजोर पड़ चुके परिवार का इकलौता सहारा थे. फनका पेशे से एक कुशल राजमिस्त्री थे और रोजाना दिहाड़ी पर काम करते थे. हालात इतने बुरे थे कि ब्याज चुकाने के बाद उनके पास रोज की जरूरतों के लिए भी पैसे नहीं बचते थे.लेकिन अभी कुछ ही दिन पहले, किस्मत ने ऐसा क्रूर मजाक किया कि इस परिवार की बची-कुची उम्मीद भी पूरी तरह टूट गई.एक अचानक और भयानक बाइक हादसे में फनका की जान चली गई. उनकी इस बेवक्त मौत ने न सिर्फ उनके बच्चों के सिर से पिता का साया छीन लिया, बल्कि इस पूरे परिवार के जीने और टिके रहने का एकमात्र ज़रिया भी हमेशा के लिए खत्म कर दिया.भोजपुर में स्वर्गीय पंखा बिंद का परिवार.फनका की यह बदहाली साल 2017 में शुरू हुई थी, जब उनके पिता रामेश्वर बिंद को आखिरी स्टेज का कैंसर होने का पता चला. अपने पिता की जान बचाने की जिद में फनका ने अपनी पुश्तैनी जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा (5 कट्ठा यानी करीब 0.15 एकड़) 40,000 रुपये में गिरवी रख दिया. लेकिन मौत को टाला नहीं जा सका और रामेश्वर जी का निधन हो गया. इसके तुरंत बाद, समाज के दबाव में होने वाला श्राद्ध का खर्च सामने आ खड़ा हुआ.जब फनका दिहाड़ी मजदूरी के लिए दूर खेतों में पसीना बहा रहे थे, तब उनकी पत्नी पांची देवी को गांव के बड़े-बुजुर्गों के लिए अनाज और मिठाई का इंतजाम करने के लिए मजबूरन 30,000 रुपये का और कर्ज लेना पड़ा. यह कर्ज 5 फीसदी महीने (यानी 60 फीसदी सालाना) की भयानक ब्याज दर पर लिया गया था.परिवार अभी इस झटके से संभल ही रहा था कि किस्मत ने दूसरा वार कर दिया. 24 जुलाई 2022 को, पिता की मौत के कुछ ही समय बाद, फनका के आठ साल के बेटे सचिन कुमार की सांप के काटने से मौत हो गई.अपने हादसे से कुछ ही हफ्ते पहले फनका ने भारी आवाज में इस रिपोर्टर को बताया था, हम अभी पिता की मौत के मातम के कपड़े भी नहीं उतार पाए थे कि हमें अपने बेटे का अंतिम संस्कार करना पड़ गया.सामाजिक रीति-रिवाजों ने बच्चे की आत्मा की शांति के लिए फिर से मृत्यु भोज की मांग की. इसने फनका को कर्ज के एक और गहरे दलदल में धकेल दिया.आज इस परिवार पर स्थानीय साहूकारों का 3 लाख रुपये का मूलधन (principal amount) बकाया है. पिछले आठ सालों में करीब 1.5 लाख रुपये सिर्फ ब्याज के रूप में चुकाने के बाद भी, यह मूल कर्ज जस का तस खड़ा है.अब जब फनका भी इस दुनिया में नहीं रहे, तो स्थानीय साहूकारों ने इस घर के चक्कर लगाने शुरू कर दिए हैं. वहीं, दूसरी तरफ समाज में दबी जुबान से वह क्रूर सवाल भी तैरने लगा है कि अब फनका के खुद के मृत्यु भोज का खर्च कौन उठाएगा?महिलाओं पर दोहरी मार: घर बचाने के लिए परदेस का रुखकर्ज के इस भयानक बोझ की सबसे बड़ी और दर्दनाक कीमत घर की महिलाओं को चुकानी पड़ रही है. भोजपुर में साहूकारों को अपने दरवाजे से दूर रखने के लिए, फनका की पत्नी पांची देवी और उनकी बड़ी बेटी को मजबूरी में अपना घर-गांव छोड़ना पड़ा. वे साल 2024 में 'मजबूरन पलायन' (distress migration) कर गुजरात के राजकोट शहर चली गईं, जहां वे एक कपड़ा फैक्टरी में काम करने लगीं.वह पलंग जिस पर दिवंगत फांका बिंद सोया किया करते थे.पांची देवी एक के बाद एक हुए हादसों से पूरी तरह टूट चुकी हैं. मां और बेटी मिलकर कपड़ा फैक्टरी में दिन-रात की हाड़-तोड़ शिफ्ट में काम करती हैं और दोनों का कुल वेतन मिलाकर 24,000 रुपये महीना होता है. लेकिन इस कमाई में से 15,000 रुपये हर महीने सीधे गांव के साहूकार के पास चले जाते हैं, वो भी सिर्फ ब्याज चुकाने के लिए.राजकोट से फोन पर बात करते हुए पांची देवी ने रोते हुए कहा,मैं अब सिर्फ अपनी एक परछाई बनकर रह गई हूं. मैं इतनी दुबली और कमजोर सिर्फ इसलिए हो गई हूं क्योंकि यह टेंशन (चिंता) एक पल के लिए भी मेरा पीछा नहीं छोड़ती.इस थोपी हुई रूढ़िवादी परंपरा की सबसे क्रूर बलि पांची देवी की बेटी का भविष्य बना. वह एक होनहार और पढ़ने वाली छात्रा थी, जिसे 9वीं क्लास के बाद मजबूरन अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी. ऐसा इसलिए करना पड़ा क्योंकि दादा और छोटे भाई के अंतिम संस्कार और श्राद्ध के लिए लिए गए भारी-भरकम कर्ज को चुकाने के लिए अचानक उसकी मजदूरी की जरूरत आन पड़ी थी और अब, किस्मत का खेल देखिए कि उसे अपने पिता की मौत का कर्ज भी चुकाना होगा.इधर मतुकपुर गांव में उनका वह घर अब पूरी तरह टूटा हुआ और खामोश पड़ा है. फनका के बच्चे अब बिना पिता के एक धुंधले और अनिश्चित भविष्य को ताक रहे हैं, जबकि उनकी मां हजारों मील दूर एक अनजान औद्योगिक शहर में खून-पसीना बहा रही है.बिहार के ग्रामीण इलाकों में ब्याज के इस धंधे और कर्ज के जाल का जो जानलेवा और क्रूर चेहरा है, वह इससे पहले कभी इतना भयावह नहीं दिखा.'सरवाइवल ट्रॉमा' का विज्ञानबिंद परिवार जैसे लोग सामाजिक बदनामी के डर से बार-बार इस तरह की 'वित्तीय खुदकुशी' (कर्ज के जानलेवा जाल में फंसना) का रास्ता क्यों चुन लेते हैं? इसे समझने के लिए हमने उन मनोचिकित्सकों और समाजशास्त्रियों से बात की, जो ग्रामीण इलाकों की बदहाली और संकट पर लगातार नजर रखते हैं.कोइलवर स्थित बिहार इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड एलाइड साइंसेज (BIMHAS) के डॉक्टरों का मानना है कि यह स्थिति एक गंभीर और अनदेखी 'पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी' (जन स्वास्थ्य आपातकाल) जैसी है. BIMHAS के मनोचिकित्सक डॉ. अमित सिंह इस स्थिति को "पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाला सदमा" (trans-generational trauma) कहते हैं.बिम्हास परिसर के बाहर इंतजार करते लोग.डॉ. सिंह का कहना है, "इन ग्रामीण परिवारों के बच्चों को विरासत में सिर्फ कर्ज का बही-खाता ही नहीं मिलता... बल्कि उन्हें हमेशा एक 'अति-सतर्कता' (hyper-vigilance) यानी हर वक्त डरे और सहमे रहने का स्थायी भाव भी विरासत में मिलती है."वे आगे कहते हैं,ये बच्चे बड़े ही इस माहौल में होते हैं जहां वे अपने माता-पिता को साहूकार द्वारा दरवाजे पर मारी गई हर एक जोरदार थाप पर खौफ से कांपते हुए देखते हैं. यह परछाई की तरह रहने वाला मानसिक तनाव यह तय कर देता है कि किसी एक मृत्यु भोज का सदमा दशकों तक बना रहे. यह तनाव अगली पीढ़ी के मानसिक और भावनात्मक विकास को बुरी तरह से बदल देता है.ग्रामीण इलाकों के मानसिक सदमों (trauma) पर काम करने वाले एक और जाने-माने क्लीनिकल साइकियाट्रिस्ट, डॉ. नवनीत चौधरी अपनी बात जोड़ते हुए कहते हैं कि हाशिये पर जी रहे लोगों के लिए 'सामाजिक स्वीकार्यता' (social belonging) बुनियादी रूप से जिंदा रहने का एक जरिया है.डॉ. चौधरी कहते हैं, "समाज से बाहर कर दिए जाने का मनोवैज्ञानिक डर सीधे इंसान के भीतर तक असर करता है. यह डर आर्थिक कर्ज के डर से कहीं ज्यादा बड़ा और ताकतवर होता है."वे आगे कहते हैं,गहरे दुख और मातम के वक्त, इंसानी दिमाग की सोचने-समझने की क्षमता बहुत कमजोर हो जाती है. लोग उस समय समझदारी भरे वित्तीय फैसले लेने की स्थिति में नहीं होते. वे सिर्फ दबाव में आकर पैसे ही उधार नहीं ले रहे होते; बल्कि वे उस रूढ़िवादी और जजमेंटल (फैसला सुनाने वाले) जातिगत ताने-बाने से अपनी खोई हुई इज्जत को किसी भी तरह वापस खरीदने की बेबस कोशिश कर रहे होते हैं.समाज का क्रूर नियम: मजबूरी को परंपरा का नामबिहार के आरा में स्थित वीर कुंवर सिंह यूनिवर्सिटी के समाजशास्त्र (Sociology) विभाग के प्रमुख, प्रोफेसर अवध बिहारी सिंह इन सामाजिक ढांचों के व्यवस्थागत दबाव की तरफ इशारा करते हैं.प्रोफेसर सिंह कहते हैं, "समाज कभी भी आधिकारिक तौर पर किसी कागज पर दस्तखत करके यह मांग नहीं करता कि एक गरीब आदमी अपनी हैसियत से बाहर जाकर मृत्यु भोज का आयोजन करे, लेकिन सामाजिक बहिष्कार (हुक्का-पानी बंद करने) का यह अलिखित नियम एक मनोवैज्ञानिक हथियार की तरह काम करता है."वे आगे समझाते हैं,बिंद जैसी भूमिहीन जातियों के लिए, अपने ही गांव से कट जाने का सीधा सा मतलब है कि उनके पास से जिंदा रहने का वह आखिरी सहारा भी छिन जाना, कल को बीमारी के वक्त कोई उनका हाथ थामने नहीं आएगा, और जरूरत पड़ने पर कोई उनके साथ खड़ा नहीं होगा. मृत्यु भोज अब सिर्फ शोक मनाने का एक रिवाज नहीं रह गया है, बल्कि यह समाज की बात मनवाने का एक ऐसा दमनकारी औजार बन चुका है जो योजनाबद्ध तरीके से गरीबों के पास बची-कुची छोटी सी जमीन को भी छीन लेता है और उनके घर की महिलाओं को मजबूरन पलायन और शोषण के दलदल में धकेल देता है.भोजपुर में शाम ढलने के साथ ही धूल तो बैठ जाती है, लेकिन हवा में घुली बेचैनी वैसी ही बनी रहती है. कृष्णा और फनका जैसे परिवारों के लिए, उनके अपनों को मरे हुए तो लंबा वक्त गुजर चुका है, लेकिन समाज के सामने अपनी इज्जत बचाने की जो कीमत उन्होंने चुकाई है, उसने उनकी जिन्दगी को एक जीता-जागता नरक बना दिया है. एक ऐसा नरक, जिसके खत्म होने के दूर-दूर तक कोई आसार नजर नहीं आते.(हिमांशु प्रवीण पटना, बिहार में रहने वाले एक स्वतंत्र पत्रकार हैं, जो राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं. वे इस ग्राउंड रिपोर्ट के लेखक हैं और इसका हिंदी अनुवाद नौशाद मलूक ने किया है.)