किताब का नाम- नागासाकी की विध्वंस-कथा (जापानी किताब ‘मात्सुरिनो बा’ का हिंदी अनुवाद) लेखिका- हायाशि क्योको अनुवाद- हरजेन्द्र चौधरी, मिकि यूइचिरो प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन मूल्य- 250 रुपए कुछ किताबें ऐसी होती हैं, जिन्हें पढ़ते हुए लगता है कि हम उनकी कहानियों के भीतर खड़े होकर सबकुछ देख रहे हैं। हायाशि क्योको की 'नागासाकी की विध्वंस-कथा' ऐसी ही किताब है। इसे पढ़ते हुए लगता है, जैेसे हम 9 अगस्त 1945 के उस भयानक दिन में चले गए हैं, जब नागासाकी पर परमाणु बम गिराया गया था। यह किताब उस घटना के बाद बची हुई जिंदगियों की कहानी कहती है। किताब में क्या है? 9 अगस्त 1945 को अमेरिका ने नागासाकी पर परमाणु बम गिराया था। उस दिन एक पल में पूरा शहर तबाह हो गया था। लेखिका हायाशि क्योको उस समय 15 साल की थीं और मुनिशन प्लांट में काम कर रही थीं। किताब मुख्य रूप से बम गिरने के तुरंत बाद से लेकर अगले दो महीनों तक की परिस्थितियों पर केंद्रित है। लेखिका खुद उस त्रासदी की साक्षी रही हैं। इसलिए यह किताब उनकी यादों का संग्रह है। पढ़ते हुए बार-बार ऐसा लगता है, जैसे कोई सर्वाइवर अपनी डायरी के पन्ने धीरे-धीरे खोल रहा है। किताब की शालीनता ही है इसकी खासियत किताब में रेडिएशन सिकनेस, जलन और मरते हुए लोगों की पीड़ा का मार्मिक चित्रण है। लेखिका इन्हें बिना किसी सनसनी के, बेहद शांत और तथ्यात्मक अंदाज में लिखती हैं। यही बात इस किताब को और प्रभावी बनाती है। किताब की सबसे असरदार बात इस किताब की सबसे बड़ी ताकत उसकी ईमानदारी और बेहद बारीक डिटेलिंग है। लेखिका एक जगह अपने बालों का जिक्र करते हुए लिखती हैं कि- अगर उस दिन मेरे बाल तीन लड़ियों में गुंथे न होते, तो विस्फोट की हवा उन्हें इस तरह खड़ा कर देती जैसे शिव की जटाएं। यह एक छोटा-सा विवरण है, लेकिन इसी में उस क्षण की भयावहता दर्ज है। यह किताब ऐसे छोटे-छोटे ब्योरों से अपनी दुनिया बनाती है। ग्राफिक में किताब की मुख्य बातें देखिए- भाषा और लिखने का ढंग किताब के अनुवाद की ये खासियत है कि इसमें भारी-भरकम शब्द इस्तमाल नहीं किए गए हैं। भाषा सरल और सीधी है, इसके बावजूद यह हमारे अंतर्मन में उतरती है। लेखिका कहीं भी शब्दों के बल से हमें भावुक करने की कोशिश नहीं करतीं, बल्कि उस स्थिति में छोड़ देती हैं, जहां भाव खुद पैदा होते हैं। हिंदी अनुवाद बेहद सहज है। कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि अनुवाद पढ़ रहे हैं। कई जगह लेखिका घटनाओं की बजाय पात्रों के मनोभावों और उनके भीतर चल रहे बदलावों पर जोर देती हैं। ये हिस्से कहानी की रफ्तार को धीमा कर सकते हैं, लेकिन यही किताब को गहराई देते हैं और पाठक पर स्थायी प्रभाव भी छोड़ते हैं। लेखिका कहीं भी खुद को केंद्र में रखकर कहानी को बड़ा नहीं बनातीं। वे सिर्फ घटनाओं को दर्ज करती हैं और यही सादगी इसे असाधारण बनाती है। किताब के याद रह जाने वाले प्रसंग किताब के कई प्रसंग गहरी छाप छोड़ जाते हैं। उदाहरण के लिए- ये प्रसंग दिखाते हैं कि आपदा के बाद लोग भय, भ्रम, उम्मीद, शोक और प्रशासनिक उदासीनता के बीच अपना जीवन कैसे आगे बढ़ाने की कोशिश करते हैं। किताब की खूबियां किताब की कमजोरियां यह किताब क्यों पढ़नी चाहिए? हयाशि क्योको की यह किताब इसलिए पढ़नी चाहिए, क्योंकि यह दिखाती है कि कैसे युद्ध केवल रणभूमि तक सीमित नहीं होता। इसका असर सालों-साल लोगों की जिंदगी पर बना रहता है। युद्ध खत्म होने के बाद भी उसकी पीड़ा लोगों के शरीर, मन और यादों में जीवित रहती है। कई बार ऐसी परिस्थितियां बनती हैं, जो मौत से भी ज्यादा क्रूर साबित होती हैं। ग्राफिक में देखिए ये किताब किसे पढ़नी चाहिए- मौजूदा समय में प्रासंगिक है ये किताब किताब में लगभग 110 पेज हैं, लेकिन इसका प्रभाव गहरा है और लंबे समय तक बना रहता है। इसे पढ़ने के बाद मन में एक सन्नाटा और उदासी रह जाती है। आज जब दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध और संघर्ष जारी हैं, यह किताब और भी प्रासंगिक हो जाती है। यह हमें याद दिलाती है कि किसी भी युद्ध की सबसे बड़ी कीमत आम लोग चुकाते हैं और इससे मिले घाव सालों और पीढ़ियों तक बने रहते हैं। ……………………………… ये खबर भी पढ़ें… बुक रिव्यू- उम्मीद की सबसे खूबसूरत कहानी:एक बुकशॉप, अधूरे रिश्ते और जिंदगी का दस्तावेज, फिर से जीना सीखने के लिए ये किताब पढ़ें ब्रिटिश फिलॉसफर फ्रांसिस बेकन ने कभी कहा था ‘कुछ किताबें केवल चखने के लिए होती हैं, कुछ निगल जाने के लिए और कुछ को चबा-चबाकर आत्मसात करना पड़ता है।’ उनका यह कथन जापानी लेखक सातोशी यागीसावा की किताब 'मोरीसाकी बुकशॉप के खुशनुमा दिन' पर सटीक बैठता है। पूरी खबर पढ़ें…