उत्तराखंड: 8.40 लाख वोटर्स के नाम कटेंगे, विस्थापन बड़ी वजह- देहरादून सबसे आगे

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उत्तराखंड में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR)-2026 का पहला चरण पूरा हो गया है. राज्य में SIR से पहले कुल 79,60,762 मतदाता थे. सभी को एन्यूमरेशन फॉर्म दिए गए, लेकिन 7 जुलाई तक 71,16,650 फॉर्म ही वापस मिले. अनकलेक्टेबल एन्यूमरेशन फॉर्म (UEF) की संख्या 8,41,020 (10.56%) रही. यानी उत्तराखंड के करीब 10.56% मतदाताओं को वोटर लिस्ट से बाहर किया जाएगा.निर्वाचन आयोग के मुताबिक, 8 जून से 7 जुलाई 2026 तक घर-घर सत्यापन (House to House Visit) अभियान चला और 14 जुलाई 2026 को ड्राफ्ट मतदाता सूची का प्रकाशन की जाएगी. इसके बाद 14 जुलाई से 13 अगस्त 2026 तक दावे और आपत्तियां दर्ज की जा सकेंगी, जिनका निस्तारण कर 15 सितंबर 2026 को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जाएगी.देहरादून में सबसे ज्यादा अनकलेक्टेबल फॉर्मउत्तराखंड के कुल 13 जिलों का विश्लेषण करने पर पता चला कि पहाड़ी जिलों की तुलना में मैदानी जिलों में ज्यादा नाम कटे हैं. मैदानी जिलों में आर्थिक गतिविधियां, शहरीकरण और जनसंख्या का आवागमन अधिक है. जबकि पहाड़ी और कम गतिशील आबादी वाले जिलों में UEF अपेक्षाकृत कम है.देहरादून में सबसे ज्यादा नाम कटेंगे. यहां कुल 13,76,813 मतदाताओं में से सर्वाधिक 13.86% (1,90,815) अनकलेक्टेबल एन्यूमरेशन फॉर्म (UEF) (Uncollectable Enumeration Form) की कैटेगरी में हैं.इसके बाद उधम सिंह नगर है, जहां कुल 13,33,345 मतदाताओं में से 13.66% (182,162) फॉर्म अनकलेक्टेबल हैं.इसके विपरीत पहाड़ी जिलों में अनकलेक्टेबल एन्यूमरेशन फॉर्म का प्रतिशत कम है. रुद्रप्रयाग जिले के कुल 191,595 मतदाताओं में से केवल 5.69% (10,902) फॉर्म ही UEF श्रेणी में आए हैं, जो राज्य में सबसे कम है. इसी तरह बागेश्वर में 213,929 मतदाताओं में से 6.12% (13,090) फॉर्म अनकलेक्टेबल निकले.विस्थापन सबसे बड़ी वजह उत्तराखंड में SIR के आंकड़े बताते हैं कि मतदाताओं के नाम कटने की सबसे बड़ी वजह विस्थापन है.पूरे राज्य में कुल 8,41,020 UEF मामलों में से 4,79,762 फॉर्म केवल स्थायी रूप से शिफ्ट होने के कारण हैं.विस्थापन के बाद दूसरी बड़ी वजह 'अनुपस्थिति' (Absent) है, जिसके 1,66,741 मामले हैं और तीसरी वजह मृत्यु (Death) है, जिसके 1,24,278 मामले दर्ज किए गए हैं. देहरादून, उधम सिंह नगर और हरिद्वार सबसे ज्यादा विस्थापन प्रभावितस्थायी रूप से विस्थापन का सबसे व्यापक प्रभाव राज्य के बड़े मैदानी और औद्योगिक जिलों में देखा गया है. इसमें देहरादून पहले नंबर पर है. यह जिला राज्य में पलायन से सबसे ज्यादा प्रभावित है. यहां दर्ज कुल 1,90,815 UEF मामलों में से अकेले 1,01,111 मतदाता स्थायी रूप से शिफ्ट हो चुके हैं. उधम सिंह नगर दूसरा सबसे अधिक प्रभावित जिला है. यहां के 1,82,162 'अनकलेक्टेबल फॉर्म' में से 85,682 की मुख्य वजह स्थायी पलायन है. तीसरा जिला हरिद्वार है. यहां कुल 1,31,047 मतदाता UEF की श्रेणी में आए हैं, जिनमें से 77,084 मतदाता अपने मूल स्थान से स्थायी तौर पर पलायन कर चुके हैं.यह आंकड़ा इस बात की ओर इशारा करता है कि देहरादून, उधम सिंह नगर और हरिद्वार जैसे जिलों में आबादी की गतिशीलता सबसे अधिक है. इन जगहों पर रोजगार, शहरीकरण या अन्य कारणों से लोग बड़ी संख्या में अपना स्थान बदलते हैं, जिसका सीधा असर चुनाव आयोग की मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया पर दिख रहा है. इसके विपरीत, रुद्रप्रयाग जैसे पहाड़ी जिलों में 'स्थायी पलायन' के कारण UEF होने का आंकड़ा 7,334 है, जो मैदानी जिलों की तुलना में काफी कम है.उत्तराखंड में हो रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन 2026 में विस्थापन की वजह से सबसे ज्यादा नाम कटेंगे.उत्तराखंड में बीजेपी के सबसे ज्यादा बीएलएचुनाव आयोग के 3 जुलाई 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, राज्य के कुल 11,733 मतदान केंद्र (Polling Stations) पर कुल 23102 बीएलए हैं. सबसे ज्यादा बीएलए (BLA): राज्य में बूथ स्तर की सक्रियता के मामले में भारतीय जनता पार्टी (BJP) सबसे आगे है. पार्टी ने कुल 11,733 में से सर्वाधिक 11,504 (98%) मतदान केंद्रों पर अपने बीएलए नियुक्त किए हैं. दूसरे नंबर पर कांग्रेस है, जिसने 11,105 (95%) बूथों पर अपने एजेंट बनाए हैं. इन दोनों प्रमुख राष्ट्रीय दलों ने राज्य भर में अपनी मजबूत उपस्थिति और चुनावी तैयारी दर्ज कराई है.विश्लेषण से स्पष्ट है कि राज्य में बूथ स्तर की तैयारियों के मामले में बीजेपी और कांग्रेस के बीच ही मुख्य मुकाबला है. पूरे राज्य के आंकड़ों में बीएलए की बात करें तो बीजेपी का पलड़ा भारी है, लेकिन हरिद्वार और उधम सिंह नगर जैसे बड़े मैदानी जिलों में कांग्रेस ने भाजपा को पीछे छोड़ दिया है. अन्य दलों की बात करें तो आम आदमी पार्टी (AAP) ने एक भी बीएलए नियुक् नहीं किया है. वहीं बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने पूरे राज्य में केवल 11 बीएलए और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M) ने मात्र 24 मतदान केंद्रों पर ही अपने एजेंट नियुक्त किए हैं.