पैरालिसिस या न्यूरोलॉजिकल बीमारी के कारण कई लोगों के लिए बोलना बेहद मुश्किल हो जाता है. जबकि उनके दिमाग में अपनी बात कहने की क्षमता बनी रहती है. ऐसे लोगों के लिए वैज्ञानिक Brain computer interface यानी BCI पर काम कर रहे हैं. इसमें दिमाग से मिलने वाले न्यूरल सिग्नल को रिकॉर्ड करके आर्टिफीशिअल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग की मदद से समझा जाता है और फिर उसे शब्दों या आवाज में बदला जाता है. 2026 में अमेरिका में वायरलेस और पूरी तरह इम्प्लांटेबल BCI को पहली बार इंसान में लगाया गया जिसे बोलने में परेशानी वाले मरीजों को टेस्ट किया जा रहा है.सबसे पहले दिमाग में लगाया जाता है खास इम्प्लांटइस तकनीक का पहला हिस्सा ब्रेन इम्प्लांट है. इसमें बहुत छोटे एलेक्ट्रोड़ लगाए जाते हैं. उदहारण के लिए Paradromics के connexus BCI में 421 माइक्रोएलेक्ट्रोड़ हैं, जो दिमाग की अलग-अलग न्यूरल एक्टिविटी को रिकॉर्ड करते हैं. इन्हें खास तौर पर उन हिस्सों के पास लगाया जाता है जो बोलने और शरीर की गतिविधियों से जुड़े सिग्नल पैदा करते हैं. जब मरीज बोलने की कोशिश करता है या कुछ मामलों में बोलने की सोचता है तो दिमाग में पैदा होने वाले सिग्नल इन इलेक्ट्रोड तक पहुंचते हैं.कंप्यूटर से समझे जाते हैं दिमाग के सिग्नल सिर्फ दिमाग से सिग्नल मिल जाना काफी नहीं है, क्योंकि ये सिग्नल सीधे शब्दों की तरह कंप्यूटर को समझ नहीं आते. इसके लिए मशीन लर्निंग मॉडल को मरीज के ब्रेन सिग्नल और उसके चाह रहे शब्दों के बीच संबंध समझने के लिए ट्रेन किया जाता है. पुराने और नए BCI प्रयोगों में मरीजों को चुपचाप बोलने की कोशिश करने के लिए कहा गया और उस दौरान उनके ब्रेन सिग्नल रिकॉर्ड किए गए. इसके बाद AI ने अलग-अलग न्यूरल पैटर्न को शब्दों और आवाज से जोड़ना सीखा.यह भी पढ़ें : क्या आपका पार्टनर भी लेता है खर्राटे? बिगाड़ देगा आपकी भी सेहतसिग्नल बदल जाते हैं टेक्स्ट या आवाज मेंजब सिस्टम को पर्याप्त ट्रेनिंग मिल जाती है, तब मरीज बोलने की कोशिश करता है और इम्प्लांट उसके ब्रेन सिग्नल को रिकॉर्ड करता है. इसके बाद कंप्यूटर उस सिग्नल को डिकोड करके शब्दों में बदलता है और जरूरत के हिसाब से टेक्स्ट या सिंथेटिक आवाज तैयार करता है. 2025 में लॉन्च एक अध्ययन में एक महिला के ब्रेन सिग्नल को 80 मिलीसेकंड के अंतराल पर डिकोड करके स्ट्रीमिंग स्पीच तैयार की गई थी. दूसरे एक्सपेरिमेंट में ALS से पीड़ित एक व्यक्ति के लिए ऐसी आवाज बनाई गई जो उसकी बोलने की पुरानी आवाज से मिलती-जुलती थी. वायरलेस होने से क्या बदलेगावायरलेस BCI का फायदा यह है कि दिमाग में लगाए गए इलेक्ट्रोड से बाहर लगे कंप्यूटर तक सिग्नल भेजने के लिए शरीर से निकलने वाली तारों पर निर्भरता कम की जा सकती है. 2026 में University of Michigan Health ने Paradromics के Connexus BCI का पहला इंसानी इम्प्लांट किया. इस डिवाइस में ब्रेन सिग्नल पहले छाती में मौजूद छोटे ट्रांससीवर तक जाते हैं और वहां से बहार के रिसीवर तक भेजे जाते हैं. फिलहाल यह तकनीक क्लिनिकल ट्रायल के दौर में है और इसका उद्देश्य यह जांच करना है की, क्या यह लंबे समय तक सुरक्षित तरीके से बोलने में परेशानी वाले लोगों की कम्युनिकेशन में मदद कर सकती है. यानी यह अभी सामान्य इलाज नहीं है, बल्कि तेजी से विकसित हो रही मेडिकल टेक्नोलॉजी है.यह भी पढ़ें : तमिलनाडु के सरकारी अस्पतालों में मिलेगा इनफर्टिलिटी ट्रीटमेंट, जानें तरीका