सवाल– मैं 27 साल का हूं और पिछले कुछ समय से एक अजीब बात नोटिस कर रहा हूं। मैं जब अपने परिवार के साथ होता हूं तो एक तरह से व्यवहार करता हूं, दोस्तों के साथ दूसरी तरह से और ऑफिस में एकदम अलग ही इंसान बन जाता हूं। कई बार लगता है कि मैं हर जगह लोगों की अपेक्षाओं के हिसाब से खुद को बदल लेता हूं। प्रॉब्लम ये है कि मुझे समझ नहीं आता कि इनमें से असली मैं कौन हूं। मैं किस तरह का इंसान हूं, मेरी अपनी पसंद-नापसंद क्या है। मैं खुद को नहीं जानता। इसलिए भीतर एक अजीब-सा खालीपन महसूस होता है। क्या यह पहचान से जुड़ा संकट है? मैं खुद को कैसे जानूं? मैं क्या करूं? एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर। सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। ‘लोग क्या सोचेंगे?’ ये सवाल कुछ लोगों के जीवन और फैसलों को तय करने वाला सबसे बड़ा पैमाना है। ऐसे लोग हर माहौल में खुद को इस तरह ढाल लेते हैं कि सामने वाले को वे बिल्कुल अपने जैसे लगें। दोस्तों के बीच अलग व्यक्तित्व, ऑफिस में अलग, परिवार में अलग और पार्टनर के साथ अलग। ऊपर से वे मिलनसार, आत्मविश्वासी और हर परिस्थिति में एडजस्ट करने वाले नजर आते हैं, लेकिन अंदर–ही–अंदर वे खुद से कहते हैं— "मुझे समझ ही नहीं आता कि असल में मैं हूं कौन।" क्या है 'कैमेलियन पर्सनैलिटी'? मनोविज्ञान में इसे 'कैमेलियन पर्सनैलिटी' (Chameleon Personality) कहते हैं। यानी ऐसा व्यक्ति, जो हर परिस्थिति और हर व्यक्ति के मुताबिक खुद को बदल लेता है। हालांकि यह कोई मानसिक बीमारी या मनोवैज्ञानिक डायग्नोसिस नहीं है। हर इंसान अलग-अलग परिस्थितियों में अपना व्यवहार बदलता है। हम बॉस से जिस तरह बात करते हैं, उसी तरह अपने दोस्त या परिवार से नहीं करते। यह सामाजिक लचीलापन सामान्य है और जरूरी भी। समस्या तब शुरू होती है, जब एडजेस्टमेंट करते-करते व्यक्ति अपनी असली पहचान, पसंद, सीमाएं और मूल्य ही खोने लगता है। कैमेलियन पर्सनैलिटी कब समस्या? कैमेलियन पर्सनैलिटी वाले लोग बाहर से आत्मविश्वासी, मिलनसार और सहयोगी दिखाई देते हैं, लेकिन उनके भीतर काफी कॉन्फ्लिक्ट चलते रहते हैं। वे अक्सर— मनोवैज्ञानिक शोध बताते हैं कि इस तरह के व्यवहार के पीछे ये संभावित कारण हो सकते हैं– क्यों बनती है ‘कैमेलियन पर्सनैलिटी’? ज्यादातर मामलों में यह व्यवहार बचपन के या जीवन के पुराने अनुभवों से सीखा हुआ होता है। अगर बचपन में व्यक्ति ने यह महसूस किया हो कि— तो धीरे-धीरे उसके मन में यह विश्वास बैठ सकता है कि— "अगर मैं दूसरों जैसा नहीं बनूंगा, तो लोग मुझे स्वीकार नहीं करेंगे।" यह मानसिक चक्र कैसे चलता है? लंबे समय में इसका असर अगर कोई व्यक्ति हमेशा ही दूसरों से सहमति जता रहा है और अपनी असली भावनाएं नहीं बता रहा है तो लंबे समय में इसका नेगेटिव प्रभाव दिख सकता है। जैसेकि– 1950 के दशक का मशहूर प्रयोग पोलिश-अमेरिकी सामाजिक मनोवैज्ञानिक सोलोमन ऐश ने 1950 के दशक में एक प्रसिद्ध प्रयोग किया। इस प्रयोग में हिस्सा ले रहे प्रतिभागियों को तीन रेखाएं दिखाई गईं। एक सीधी रेखा और तीन अन्य रेखाएं। उन्हें बताना था कि कौन-सी रेखा पहली वाली के बराबर लंबी है। इस सवाल का जवाब बेहद आसान था। लेकिन प्रयोग में शामिल अधिकांश लोग असल में रिसर्च टीम का ही हिस्सा थे। उन लोगों ने जानबूझकर गलत उत्तर देना शुरू किया। अब असली प्रतिभागी के सामने दो विकल्प थे— इस प्रयोग का नतीजा चौंकाने वाला था। लगभग 75% लोगों ने कम-से-कम एक बार भीड़ का गलत जवाब स्वीकार कर लिया। कई लोग जानते थे कि जवाब गलत है, लेकिन वे अलग नहीं दिखना चाहते थे। कुछ लोगों को तो अपनी ही समझ पर शक होने लगा। एक व्यक्ति भी ला सकता है फर्क सोलोमन ऐश के प्रयोग में एक और दिलचस्प बात सामने आई। वो ये कि सिर्फ एक व्यक्ति भी फर्क ला सकता है। उन्होंने इस प्रयोग के दौरान देखा कि अगर भीड़ में सिर्फ एक व्यक्ति भी अलग राय रखता था तो बाकी लोगों के लिए भी स्वतंत्र होकर जवाब देना आसान हो जाता था। यानी अगर सिर्फ एक भरोसेमंद दोस्त, परिवार का सदस्य, काउंसलर या थेरेपिस्ट यह कहे कि— "तुम्हें अलग सोचने का भी अधिकार है।" —तो व्यक्ति धीरे-धीरे अपनी सोच पर दोबारा भरोसा करना सीख सकता है। भारतीय परिवारों के संदर्भ में इसे कैसे समझें? भारतीय समाज में ये सब महत्वपूर्ण सामाजिक मूल्य माने जाते हैं– इसलिए हर जगह और हरेक स्थिति में दूसरे की बात मान लेना, उसके अनुसार चलना मानसिक समस्या नहीं है। असली सवाल ये है कि– यदि इसका जवाब "नहीं" है, तो इस पैटर्न पर ध्यान देने की जरूरत है। क्या आप 'कैमेलियन पर्सनैलिटी' हैं? करें सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। नीचे ग्राफिक्स में कुल 12 सवाल हैं। आपको इन सवालों को 0 से 3 के स्केल पर रेट करना है। जैसेकि पहले सवाल के लिए अगर आपका जवाब 'कभी नहीं' है तो 0 नंबर दें और अगर आपका जवाब 'लगभग हमेशा' है तो 3 नंबर दें। अंत में अपने टोटल स्कोर की एनालिसिस करें। स्कोर का इंटरप्रिटेशन भी ग्राफिक में दिया है। 'कैमेलियन पर्सनैलिटी' को कैसे बदलें? चार हफ्तों का सेल्फ हेल्प प्लान यहां मैं आपको चार हफ्तों का एक सेल्फ हेल्प प्लान दे रहा हूं। स्टेप–बाय–स्टेप इस प्लान को फॉलो करें और प्रोग्रेस को रोज अपनी डायरी में नोट करें। सप्ताह 1 : अपनी आदत पहचानें हर दिन किसी एक घटना के बारे में लिखें— साथ ही डायरी में अपने जीवन के पांच सबसे महत्वपूर्ण मूल्य लिखें, जैसे— आप अपने हिसाब से कुछ भी लिख सकते हैं। फिर अपने लिए जरूरी हरेक मूल्य के लिए एक छोटा कदम तय करें। जैसेकि आप खुद से कह सकते हैं– अगर ‘ईमानदारी’ महत्वपूर्ण है, तो मैं रोज कम-से-कम एक बार ईमानदारी से अपने मन की बात जरूर कहूंगा। दूसरा सप्ताह: अपने डर को चुनौती दें जब भी लगे कि सामने वाला नाराज हो जाएगा तो खुद से पूछें— फिर छोटी-छोटी शुरुआत करें— तीसरा सप्ताह: सम्मानपूर्वक 'ना' कहना सीखें ऐसे वाक्य बोलने का अभ्यास करें— चौथा सप्ताह: अपनी पहचान मजबूत करें अपनी डायरी में इन वाक्यों को पूरा करें— किसी भी बड़े फैसले से पहले खुद से ये 4 सवाल पूछें— प्रोफेशनल हेल्प कब जरूरी? शुरुआती स्तर पर इस पैटर्न को समझकर और कुछ सेल्फ-हेल्प उपाय अपनाकर काफी सुधार किया जा सकता है। लेकिन अगर इसकी वजह से मानसिक स्वास्थ्य, रिश्ते या रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगे, तो प्रोफेशनल मदद लेने में देर नहीं करनी चाहिए। अंतिम बात याद रखें, इस पूरी एक्सरसाइज का मकसद आपको जिद्दी, बहस करने वाला या असंवेदनशील बनाना नहीं है। इसका उद्देश्य सिर्फ इतना है कि आप बिना डर के अपनी बात कह सकें। अपनी राय और अपनी असहमति व्यक्त कर सकें। ………………ये खबर भी पढ़िएमेंटल हेल्थ- भीड़ में भी अकेली हूं: कोई मुझे समझता नहीं, किसी को मेरी परवाह नहीं, सब हैं, लेकिन दिल का साथी कोई नहीं, क्या करूं? इमोशनल लोनलीनेस (भावनात्मक अकेलापन) आज मेंटल हेल्थ डिसकशन का एक महत्वपूर्ण विषय बन चुका है। पहली नजर में यह साधारण 'अकेलेपन' जैसा लगता है, लेकिन मनोविज्ञान इसे कहीं अधिक गहराई से समझता है। आगे पढ़िए…