संक्रामक बीमारियों से जंग की नई तैयारी:AI से महामारी की निगरानी, टीबी के छोटे इलाज और नई वैक्सीन पर फोकस

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रुकैया कुमारी | उडुपी, कर्नाटक क्या किसी नई महामारी के फैलने से पहले उसके संकेत पहचाने जा सकते हैं? क्या अलग-अलग अस्पतालों, लैब और स्वास्थ्य एजेंसियों से मिलने वाले आंकड़ों को जोड़कर संक्रमण के खतरे का समय रहते पता लगाया जा सकता है? क्या क्लाइमेट चेंज से इंफेक्शिस डिजीज का खतरा बढ़ रहा है? इन सवालों पर कर्नाटक के मणिपाल में 14 से 16 अक्टूबर तक आयोजित नेचर कॉन्फ्रेंस इंडिया 2026 में दुनिया के शीर्ष वैज्ञानिकों ने चर्चा की। मणिपाल एकेडमी ऑफ हायर एजुकेशन (MAHE) में हुई इस कॉन्फ्रेंस में संक्रामक बीमारियों की निगरानी, नई जांच तकनीक, वैक्सीन और अगली महामारी की तैयारी पर विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे। कोरोना महामारी के दौरान दुनिया का चर्चित कोविड-19 ट्रैकिंग डैशबोर्ड तैयार करने वालीं जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर डॉ. लॉरेन गार्डनर के मुताबिक, भारत को स्वास्थ्य से जुड़े आंकड़ों को जोड़ने वाली एकीकृत व्यवस्था विकसित करनी चाहिए। किसी नई महामारी की सटीक भविष्यवाणी करना आसान नहीं है, लेकिन मजबूत निगरानी प्रणाली और भरोसेमंद डेटा से संक्रमण के शुरुआती संकेत पहचाने जा सकते हैं। सीवेज की जांच, जीनोम निगरानी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसे टूल इस काम में मदद कर सकते हैं। इससे छोटे प्रकोप को बड़ी महामारी बनने से पहले नियंत्रित करने का मौका मिल सकता है। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, सैन फ्रांसिस्को की प्रोफेसर डॉ. राडा साविक ने टीबी का इलाज तीन से चार महीने तक सीमित करने, लंबे समय तक असर करने वाले इंजेक्शन और एक खुराक में बचाव देने वाली दवाओं पर चल रहे शोध की जानकारी दी। वहीं, यूनिवर्सिटी ऑफ विटवाटर्सरैंड के प्रोफेसर शबीर ए. मदही ने बताया कि वैक्सीन से बच्चों में निमोनिया के गंभीर मामलों और मौतों को कम करने में मदद मिली है। नीदरलैंड्स के इरास्मस मेडिकल सेंटर की प्रोफेसर मैरियन कूपमैन्स ने चेताया कि जलवायु परिवर्तन के कारण डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियां नए इलाकों में फैल सकती हैं। AI और डेटा से संक्रमण के शुरुआती संकेतों की पहचान कोरोना महामारी के दौरान जॉन्स हॉपकिंस कोविड डैशबोर्ड तैयार करने में अहम भूमिका निभाने वालीं डॉ. लॉरेन गार्डनर ने बताया कि महामारी की तैयारी के लिए सिर्फ आंकड़े जुटाना पर्याप्त नहीं है। अलग-अलग स्रोतों से मिले डेटा को जोड़ना और उसका समय पर विश्लेषण करना भी जरूरी है। उनके मुताबिक, भारत को स्वास्थ्य से जुड़े आंकड़ों को जोड़ने वाली एकीकृत व्यवस्था की जरूरत है। सीवेज की नियमित जांच से किसी इलाके में संक्रमण के शुरुआती संकेत मिल सकते हैं। जीनोम निगरानी से वायरस में हो रहे बदलावों का पता लगाया जा सकता है। AI इन आंकड़ों का विश्लेषण कर संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान करने में मददगार हो सकता है। हालांकि, इन तकनीकों की सफलता के लिए स्थानीय स्तर पर सटीक और भरोसेमंद डेटा जरूरी है। मजबूत निगरानी व्यवस्था से संक्रमण के छोटे प्रकोप को समय रहते पहचानकर उस पर कार्रवाई की जा सकती है। टीबी का इलाज छोटा करने के लिए मरीजों के हिसाब से बनेगी रणनीति कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, सैन फ्रांसिस्को की प्रोफेसर डॉ. राडा साविक के मुताबिक, ड्रग-सेंसिटिव टीबी का इलाज आमतौर पर छह महीने चलता है, जबकि ड्रग-रेजिस्टेंट टीबी में इससे अधिक समय लग सकता है। इलाज की अवधि कम करने की एक चुनौती यह है कि मरीजों की स्थिति अलग-अलग होने के बावजूद कई बार एक जैसी उपचार रणनीति अपनाई जाती है। उन्होंने कहा कि बीमारी की गंभीरता, फेफड़ों को हुए नुकसान, पोषण की स्थिति और दूसरी बीमारियों के आधार पर मरीजों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटने की जरूरत है। कम गंभीर मरीजों के लिए कम समय का इलाज संभव हो सकता है। इससे दवाओं के साइड इफेक्ट और लंबे इलाज से जुड़ी परेशानियां भी कम हो सकती हैं। डॉ. साविक के मुताबिक, AI और गणितीय मॉडल की मदद से दवाओं के अलग-अलग कॉम्बिनेशन और उनकी खुराक का आकलन किया जा सकता है। नई दवाओं के विकास में लगने वाले 12-15 साल के समय को घटाकर 6-7 साल करने की दिशा में भी प्रयास हो रहे हैं। भविष्य में टीबी के इलाज को तीन से चार महीने तक सीमित करने, लंबे समय तक असर करने वाले इंजेक्शन और एक बार दी जाने वाली बचाव की दवाएं विकसित करने पर काम जारी है। वैक्सीन से बच्चों में निमोनिया का खतरा घटा, अब RSV पर जोर यूनिवर्सिटी ऑफ विटवाटर्सरैंड, जोहान्सबर्ग के प्रोफेसर शबीर ए. मदही ने बताया कि पिछले दो दशकों में हेमोफिलस इन्फ्लुएंजा टाइप बी (Hib) और न्यूमोकोकल वैक्सीन से बच्चों में निमोनिया के गंभीर मामलों और उससे होने वाली मौतों को कम करने में मदद मिली है। हालांकि, निमोनिया कई तरह के वायरस और बैक्टीरिया से हो सकता है। इसलिए वैक्सीन लगने के बाद भी किसी बच्चे को निमोनिया हो सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि वैक्सीन ने काम नहीं किया। वैक्सीन का मुख्य उद्देश्य बीमारी के गंभीर रूप और उससे होने वाली मौतों से बचाव करना है। प्रोफेसर मदही ने गर्भवती महिलाओं को दी जाने वाली RSV वैक्सीन की भूमिका पर भी बात की। इससे जन्म के बाद शुरुआती छह महीनों में शिशुओं को RSV संक्रमण से बचाने में मदद मिल सकती है। उन्होंने कहा कि भारत में बच्चों के टीकाकरण का दायरा बढ़ाने के साथ नए टीकों को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना भी जरूरी है। माता-पिता को सोशल मीडिया पर मिलने वाली भ्रामक जानकारियों के बजाय टीकाकरण से जुड़े सवालों के लिए डॉक्टरों और नर्सों से सलाह लेनी चाहिए। जानवरों से इंसानों में फैलने वाले संक्रमण पर भी निगरानी जरूरी नीदरलैंड्स के इरास्मस मेडिकल सेंटर की प्रोफेसर मैरियन कूपमैन्स ने कहा कि किसी नए संक्रमण के सामने आने पर सबसे पहले उसकी जांच और निगरानी की क्षमता तैयार करनी चाहिए। इससे बीमारी के फैलने के तरीके और सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले लोगों की पहचान की जा सकती है। इसके लिए महामारी विशेषज्ञों, लैब कर्मियों, पशु चिकित्सकों और मच्छरों पर काम करने वाले विशेषज्ञों को मिलकर काम करना होगा। जंगली पक्षियों में बर्ड फ्लू जैसे वायरस की निगरानी, टेस्टिंग के लिए पंख जुटाना और बर्ड-ट्रैकिंग ऐप जैसे तरीके शुरुआती संकेत पहचानने में मदद कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान और बारिश के पैटर्न में बदलाव हो रहा है। इससे मच्छरों के पनपने के अनुकूल परिस्थितियां बन सकती हैं और डेंगू-मलेरिया जैसी बीमारियां नए इलाकों में फैल सकती हैं। इसलिए जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान करने के साथ मच्छरों के प्रजनन स्थलों को खत्म करने के लिए समुदाय की भागीदारी भी जरूरी है। एंटीबायोटिक दवाओं का असर कम होना बड़ी चुनौती कॉन्फ्रेंस में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) पर भी चर्चा हुई। इसमें बैक्टीरिया और दूसरे सूक्ष्मजीवों पर एंटीबायोटिक जैसी दवाओं का असर कम होना शामिल है। विशेषज्ञों ने क्लेबसिएला न्यूमोनिया जैसे बैक्टीरिया और टीबी के इलाज के नए तरीकों पर हो रही रिसर्च साझा की। इस समस्या के कारण ऐसे संक्रमणों का इलाज भी मुश्किल हो सकता है, जिन पर पहले सामान्य एंटीबायोटिक दवाएं असर करती थीं। विशेषज्ञों ने नई दवाओं के विकास के साथ एंटीबायोटिक के सही इस्तेमाल और संक्रमण की निगरानी को जरूरी बताया। इसके अलावा HPV की जांच और वैक्सीनेशन तथा नई संक्रामक बीमारियों के लिए वैक्सीन विकसित करने पर भी चर्चा हुई। वन हेल्थ के नजरिए से देखनी होगी महामारी की चुनौती विशेषज्ञों ने वन हेल्थ यानी इंसान, जानवर और पर्यावरण की सेहत को एक-दूसरे से जुड़ा मानकर काम करने की जरूरत बताई। जानवरों से इंसानों में फैलने वाले संक्रमण, जलवायु परिवर्तन, मच्छरों का बदलता दायरा और एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस जैसी चुनौतियों को अलग-अलग देखने के बजाय एक साथ समझना होगा। MAHE के वाइस चांसलर डॉ. शरथ के. राव ने कहा कि संक्रामक बीमारियों से निपटने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों के वैज्ञानिकों के बीच सहयोग और लगातार रिसर्च जरूरी है। वहीं, नेचर हेल्थ के सीनियर एडिटर लोरेंजो रिघेटो ने कहा कि संक्रमण को बेहतर ढंग से समझने के लिए नए रोगाणुओं, दवाओं के बेअसर होने और पर्यावरण से जुड़े कारकों पर एक साथ काम करना होगा।