बुक रिव्यू- ‘मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था’:एक खुफिया एजेंट के पकड़े जाने, जेल जाने और फिर जिंदा लौट आने की कहानी

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किताब- मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था लेखक- मोहनलाल भास्कर प्रकाशक- राजकमल मूल्य- ₹299/- भारत-पाकिस्तान के रिश्तों पर बहुत कुछ लिखा गया है। युद्धों पर, सीमाओं पर, राजनीति पर और खुफिया एजेंसियों पर भी। लेकिन इन सबके बीच कुछ कहानियां ऐसी होती हैं, जो उन लोगों की कहानियां होती हैं, जो देशों के बीच चल रही अदृश्य लड़ाइयों का हिस्सा बनते हैं और जिनकी कीमत अक्सर अपनी पहचान, आजादी और कभी-कभी पूरी जिंदगी से चुकानी पड़ती है। मोहनलाल भास्कर की किताब ‘मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था’ ऐसी ही एक कहानी है। यह उस भारतीय की सच्ची कहानी है, जो पाकिस्तान में सीक्रेट मिशन के दौरान पकड़ा गया। सालों जेल में रहा, यातनाएं सहीं और फिर लौटकर अपनी दास्तान लिखी। कैद और संघर्ष की कहानी किताब हाथ में लेते ही लगता है कि यह एक थ्रिलर होगी, जिसमें सीक्रेट मिशन और खुफिया ऑपरेशन के घटनाक्रम होंगे। लेकिन पढ़ते-पढ़ते समझ आता है कि यह किताब जासूसी से ज्यादा उस इंसान की कहानी है, जो एक मिशन के बाद अचानक कैदी बन जाता है। यहां सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि उसने कौन-सी जानकारी जुटाई, बल्कि यह है कि इतने वर्षों की कैद और यातना के बाद भी वह मानसिक रूप से कैसे बचा रहा। यही बात किताब को एक सामान्य स्पाई स्टोरी से अलग बनाती है। किताब में क्या है मोहनलाल भास्कर भारत की ओर से पाकिस्तान में प्रवेश करते हैं। उनका काम संवेदनशील जानकारियां जुटाना है। वे अलग पहचान के साथ वहां रहते हैं, लोगों से मिलते हैं और अपने मिशन को आगे बढ़ाते हैं। लेकिन यह सफर ज्यादा लंबा नहीं चलता। एक समय ऐसा आता है, जब वे पकड़े जाते हैं और उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल जाती है। यहीं से किताब का दूसरा और कहीं ज्यादा बड़ा हिस्सा शुरू होता है। पाकिस्तान की जेलों के भीतर की दुनिया गिरफ्तारी के बाद उनसे पूछताछ होती है। उन पर दबाव बनाया जाता है। मानसिक और शारीरिक यातनाएं दी जाती हैं। उन्हें अलग-अलग जेलों में रखा जाता है। लाहौर, कोट लखपत, मियांवाली और मुल्तान जैसी जेलों का जिक्र किताब में बार-बार आता है। किताब का बड़ा हिस्सा उनके जेल में बिताए गए सालों पर केंद्रित है। इसमें जेल अधिकारियों का व्यवहार, साथी कैदियों के साथ रिश्ते, रोजमर्रा की चुनौतियां, हर पल बना रहने वाला डर, भविष्य की अनिश्चितता और जीवित रहने के संघर्ष का विस्तार से जिक्र है। सादगी से कही गई असरदार कहानी इन अनुभवों के जरिए पाठक उस दुनिया को करीब से देख पाता है, जिसके बारे में आमतौर पर बहुत कम लोग जानते हैं। अच्छी बात यह है कि लेखक हर घटना को सनसनीखेज बनाने की कोशिश नहीं करते। वे चीजों को सीधे ढंग से बताते हैं। शायद इसी कारण कई घटनाएं और ज्यादा प्रभाव छोड़ती हैं। किताब की सबसे बड़ी ताकत इस किताब की सबसे बड़ी ताकत जेल के भीतर की दुनिया का बारीक चित्रण है। लेखक विस्तार से बताते हैं कि पूछताछ के दौरान कैदियों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता था, जेल में उनकी दिनचर्या कैसी होती थी और वहां का माहौल किस तरह धीरे-धीरे व्यक्ति के मनोबल और मानसिक स्थिति पर असर डालता है। इन विवरणों में एक तरह की सादगी है, जो उन्हें विश्वसनीय बनाती है। सादगी में छिपी भयावहता कई जगह पढ़ते हुए दृश्य आंखों के सामने बनते चलते हैं। इसका कारण लेखक की भाषा है। वे घटनाएं बताते हैं और पाठक खुद उनकी भयावहता महसूस करने लगता है। एक उदाहरण उन हिस्सों में दिखाई देता है, जहां वे पूछताछ और यातनाओं का जिक्र करते हैं। लेखक बताते हैं कि जेल में उनके कई साथी मानसिक संतुलन खो बैठे और कुछ की मौत हो गई। इन घटनाओं का सादा वर्णन ही उनकी भयावहता को सामने लाने के लिए काफी है। एक कैदी की नजर से देखी गई दुनिया दूसरा दिलचस्प पक्ष जेल में मिलने वाले लोगों का है। किताब केवल जेल अधिकारियों की क्रूरता तक सीमित नहीं रहती। वहां ऐसे लोग भी दिखाई देते हैं, जो मानवीय व्यवहार करते हैं। इससे कहानी काली-सफेद नहीं रह जाती। उसमें कई परतें जुड़ जाती हैं। यही संतुलन किताब को विश्वसनीय बनाता है क्योंकि वास्तविक जीवन में भी लोग पूरी तरह खलनायक या नायक नहीं होते। जासूसी पर लिखी गई कई किताबें ऑपरेशन और रणनीति पर केंद्रित होती हैं। यहां फोकस उस व्यक्ति पर है ,जो मिशन के बाद जेल में पहुंच गया। फिल्म जैसा अनुभव जहां किताब थोड़ी कमजोर पड़ती है भाषा और लेखन शैली यह किताब किसे पढ़नी चाहिए? अगर आपकी रुचि जासूसी कहानियों में है, तो यह किताब आपके लिए दिलचस्प हो सकती है। लेकिन इसे पारंपरिक स्पाई थ्रिलर समझकर न पढ़ें। ग्राफिक में देखिए ये किताब किसे पढ़नी चाहिए- किताब के बारे में मेरी राय ‘मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था’ एक दिलचस्प संस्मरण है। जासूसी अभियानों के बजाय जेल जीवन और व्यक्तिगत अनुभवों पर इसका ज्यादा फोकस कुछ पाठकों को अधूरापन दे सकता है। लेकिन वास्तविक अनुभवों की प्रामाणिकता, सहज भाषा और कैद की दुनिया का प्रभावशाली चित्रण इसे पढ़ने लायक बनाता है। किताब खत्म होने के बाद मिशन से ज्यादा वह आदमी याद रहता है, जो सालों तक जेल में रहा और फिर लौटकर अपनी कहानी लिख सका। यही इसकी सबसे बड़ी सफलता है। ………………………. ग्राफिक- महेंद्र वर्मा …………………….ये खबर भी पढ़ें… बुक रिव्यू- घरेलू महिला से बिजनेस वुमन तक का सफर:25 महिलाओं की ये सच्ची कहानियां, जिंदगी को देखने का नजरिया बदल देंगी समाज अक्सर महिलाओं को घर–परिवार की जिम्मेदारियों तक सीमित करके देखता है। आज भी महिलाओं के लिए कारोबार शुरू करना, बड़े फैसले लेना और रिस्क उठाना आसान नहीं है। लेकिन रश्मि बंसल की किताब 'सात रंग के सपने' इसी सोच को चुनौती देती है। इसमें 25 भारतीय महिला उद्यमियों की सच्ची कहानियां हैं। पूरी खबर पढ़ें…