पेरेंटिंग- 5 साल की बेटी स्कूल जाने से डरती है:वहां देर तक रोती है, बात नहीं करती, बच्चे में स्कूल जाने की आदत कैसे डालें?

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सवाल- मैं लखनऊ से हूं। मेरी 5 साल की बेटी ने इस साल स्कूल जाना शुरू किया है। घर पर वह सामान्य रहती है, लेकिन जैसे ही हम उसे स्कूल छोड़ने जाते हैं, वह जोर-जोर से रोने लगती है और हाथ नहीं छोड़ती। टीचर बताती हैं कि वह काफी देर तक रोती रहती है। किसी एक्टिविटी में उसका मन नहीं लगता। घर लौटने के बाद भी अगले दिन स्कूल जाने का नाम सुनते ही घबरा जाती है। हमें समझ नहीं आ रहा कि यह सामान्य है या किसी बात का डर है। ऐसी स्थिति में हमें क्या करना चाहिए? एक्सपर्ट- रिद्धि दोषी पटेल, चाइल्ड एंड पेरेंटिंग साइकोलॉजिस्ट, मुंबई जवाब- स्कूल का पहला साल सिर्फ बच्चे के लिए नहीं, बल्कि माता-पिता के लिए भी एक बड़ा बदलाव होता है। पहली बार बच्चा घर–परिवार के सुरक्षित माहौल से निकलकर नई जगह, नए लोगों और नए नियमों वाली दुनिया में कदम रखता है। ऐसे में शुरुआती दिनों में रोना, माता-पिता से चिपके रहना या स्कूल जाने से मना करना काफी सामान्य है। लेकिन अगर बच्चा- तो इसे सिर्फ ‘नाटक’ या ‘जिद’ कहकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह ‘सेपरेशन एंग्जाइटी’ यानी माता-पिता से अलग होने का डर हो सकता है। स्कूल जाते हुए क्यों रोते हैं बच्चे 5 साल की उम्र में बच्चा अभी पेरेंट्स को अपनी सबसे सेफ जगह मानता है। जब वह उनसे अलग होता है तो उसे लगता है कि उसकी सुरक्षा छिन गई है। अगर यह डर नए माहौल, शर्मीलेपन या किसी बुरे अनुभव के साथ जुड़ जाए तो एंग्जाइटी और बढ़ सकती है। इसलिए स्कूल जाते हुए बच्चे इन तमाम कारणों से रो सकते हैं- क्या बच्चे का रोना सामान्य है? हां, शुरुआती कुछ दिनों या कुछ हफ्तों तक ऐसा होना सामान्य है। लेकिन अगर बच्चा- तो इसे गंभीरता से लेने और इस पर ध्यान देने की जरूरत है। बच्चे के दिमाग में क्या चल रहा है? चाइल्ड साइकोलॉजी के मुताबिक, बच्चे भविष्य को वयस्कों की तरह नहीं समझते। जब पेरेंट उन्हें स्कूल छोड़कर जाते हैं तो वह यह नहीं सोचते कि ‘मम्मी दोपहर में वापस आ जाएंगी।’ उसके मन में सवाल हो सकते हैं- यानी ये डर उसे वास्तविक लगता है। इसकी वजह सेपरेशन एंग्जाइटी होती है। इसके संकेत ग्राफिक में देखिए- सबसे बड़ी गलती क्या होती है? कई बार माता-पिता बच्चे के रोने से घबरा जाते हैं। वे- इससे बच्चे को मैसेज मिलता है कि ‘शायद स्कूल सचमुच डरावनी जगह है।’ बच्चे अक्सर अपने माता-पिता की भावनाएं पढ़ लेते हैं। अगर आप बहुत चिंतित दिखेंगे तो उसकी एंग्जाइटी और बढ़ सकती है। पेरेंट्स क्या करें? ऐसी स्थिति में पेरेंट्स को बहुत समझदारी से काम लेना चाहिए। इसके लिए कुछ बातों का ध्यान रखें। 1. बच्चे की भावना को स्वीकार करें उससे यह न कहें- इसकी बजाय कहें- इससे बच्चे को लगता है कि उसकी भावना को समझा जा रहा है। 2. बाय करने का तरीका छोटा रखें बच्चे को स्कूल छोड़ते समय- देर तक रुककर जाने से बच्चे की एंग्जाइटी बढ़ सकती है। 3. रोज एक जैसा रूटीन रखें बच्चों के लिए रोज लगभग एक जैसा रूटीन रखें, जैसेकि- अगर दिनचर्या नियमित हो तो उससे एंग्जाइटी को कम करने में मदद मिलती है। 4. स्कूल को डर की तरह पेश न करें ऐसे वाक्य न कहें- स्कूल को सीखने, खेलने और दोस्त बनाने की जगह के रूप में प्रस्तुत करें। 5. टीचर के साथ मिलकर काम करें बच्चे की क्लास टीचर से खुलकर बात करें। उनसे पूछें- घर और स्कूल का सहयोग बच्चे को जल्दी सहज बनाता है। 6. छोटी-छोटी सफलताओं की तारीफ करें अगर बच्चा- तो उसकी कोशिश की तारीफ करें। इससे बच्चे का मनोबल बढ़ता है। बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए ग्राफिक में दी गई कुछ बातों का खास ख्याल रखें- पेरेंट्स न करें ये गलतियां अक्सर जाने-अनजाने में पेरेंट्स कुछ ऐसी गलतियां करते हैं, जो बच्चे पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं। इसलिए ऐसी गलतियों से बचें- एक्सपर्ट की मदद कब लें? इन स्थितियों में चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट या डेवलपमेंटल पीडियाट्रिशियन से सलाह लेना उचित है। अंतिम बात याद रखें, स्कूल जाते हुए रोना हमेशा कमजोरी या जिद की निशानी नहीं है। यह अक्सर बच्चे के लिए एक बड़े बदलाव से जुड़ी स्वाभाविक भावनात्मक प्रतिक्रिया है। ऐसे में बच्चे को सबसे ज्यादा जरूरत डांट या दबाव की नहीं, बल्कि धैर्य, भरोसे और सहयोग की होती है। जब माता-पिता बच्चे की भावनाओं को स्वीकार करते हैं, स्कूल के साथ मिलकर काम करते हैं तो अधिकांश बच्चे कुछ समय में आत्मविश्वास के साथ नए माहौल में घुलने-मिलने लगते हैं। यही अनुभव आगे चलकर उन्हें नई परिस्थितियों का सामना करने की ताकत भी देता है। ****************** ग्राफिक्स- विपुल शर्मा …………………. पेरेंटिंग से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए पेरेंटिंग- बेटा किताबें नहीं छूता: हर वक्त मोबाइल, लैपटॉप या टीवी, उसे सिर्फ स्क्रीन चाहिए, उसमें रीडिंग हैबिट कैसे डेवलप करें आज के समय में बच्चों की पढ़ाई के लिए डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल होता है। इस वजह से कई बच्चों का अटेंशन स्पैन (एकाग्रता) प्रभावित होता है। दरअसल, लगातार बदलने वाला कंटेंट उनके ब्रेन को तुरंत स्टिमुलेट करता है। पूरी खबर पढ़ें…