सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि अगर गिरफ्तारी के कारण नहीं बताए जाने पर किसी की गिरफ्तारी गैरकानूनी घोषित होती है, तो उसे दोबारा गिरफ्तार करने से पहले पुलिस को मजिस्ट्रेट से मंजूरी लेनी होगी। कोर्ट ने कहा कि दोबारा गिरफ्तारी से पहले आरोपी को लिखित में गिरफ्तारी की वजह बतानी होगी। पहली गिरफ्तारी करने वाले पुलिस अधिकारी के वरिष्ठ अधिकारी की मंजूरी भी जरूरी होगी। दोबारा गिरफ्तारी के लिए मजिस्ट्रेट को देनी होगी वजह पुलिस को मजिस्ट्रेट के सामने अर्जी देकर बताना होगा कि पहली गिरफ्तारी के समय आरोपी को कारण क्यों नहीं बताए गए थे। अर्जी पर संबंधित पुलिस अधिकारी के तत्काल वरिष्ठ अधिकारी की सहमति भी जरूरी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहली गिरफ्तारी में गलती करने वाला अधिकारी दोबारा गिरफ्तारी का फैसला नहीं ले सकता। मामले की जांच भी किसी दूसरे अधिकारी को सौंपनी होगी। पहली गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी पर विभागीय जांच कोर्ट ने संबंधित पुलिस अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच के निर्देश दिए हैं। गलती साबित होने पर उसके खिलाफ कार्रवाई होगी और सर्विस बुक में भी इसका रिकॉर्ड दर्ज किया जाएगा। मजिस्ट्रेट की संतुष्टि के बाद ही दोबारा गिरफ्तारी मजिस्ट्रेट तभी अनुमति देगा, जब उसे लगे कि पहली बार गिरफ्तारी के समय किसी वास्तविक वजह से आरोपी को कारण नहीं बताए जा सके थे। साथ ही बाद में कारण लिखित रूप में बताए गए हों और दोबारा गिरफ्तारी जरूरी हो। अनुच्छेद 22(1) हर गिरफ्तारी पर लागू कोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 22(1) सभी गिरफ्तारियों पर लागू होता है। विशेष कानूनों के तहत हुई गिरफ्तारी में भी इसका पालन जरूरी है। आरोपी को यह साबित करने की जरूरत नहीं है कि गिरफ्तारी के कारण नहीं बताए जाने से उसे नुकसान हुआ। यह उसका मौलिक अधिकार है। गैरकानूनी गिरफ्तारी के बाद रिहाई जमानत नहीं कोर्ट ने साफ किया कि अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन के कारण गिरफ्तारी रद्द होने पर व्यक्ति की रिहाई को जमानत नहीं माना जाएगा। यह फैसला 2025 के मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र सरकार मामले में दिए गए सिद्धांतों को आगे बढ़ाता है।