मांडू से करीब चार किलोमीटर दूर सोडपुर के जंगल में इतिहास का एक ऐसा अध्याय दफन है, जो आज अपने अस्तित्व के लिए संरक्षण मांग रहा है। विंध्य की करीब 633 मीटर ऊंची पहाड़ियों के बीच बसी बूढ़ी मांडू कभी मांडवगढ़ और तरंगगढ़ के नाम से जानी जाती थी। परमार, राष्ट्रकूट और प्रतिहार काल की इस प्राचीन नगरी में हिंदू और जैन स्थापत्य के दुर्लभ अवशेष मौजूद हैं।