सवाल- मैं इंदौर से हूं। मेरा 13 साल का बेटा हर छोटी-बड़ी गलती के लिए किसी-न-किसी को जिम्मेदार ठहरा देता है। अगर उसके नंबर कम आएं तो स्कूल सिस्टम की गलती है। अगर दोस्त नाराज हो जाएं तो ‘वे मुझे समझते नहीं।’ हाल ही में उसने अपना प्रोजेक्ट समय पर जमा नहीं किया, लेकिन पूरी गलती ग्रुप मेंबर पर डाल दी। मुझे डर है कि आगे चलकर यह आदत उसके रिश्तों और करियर पर असर न डाले। हम उसे अपनी गलतियां स्वीकारना और अकाउंटबिलिटी लेना कैसे सिखाएं? एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर जवाब- अगर बच्चा हर गलती के लिए किसी और को जिम्मेदार ठहराने लगे, अपनी भूमिका स्वीकार न करे और हर असफलता का कारण बाहरी परिस्थितियों को माने, तो यह माता-पिता के लिए चिंता की बात हो सकती है। आपकी ये फिक्र भी वाजिब है कि लंबे समय में यह आदत रिश्तों, पढ़ाई और प्रोफेशनल जीवन पर असर डाल सकती है। हालांकि मनोविज्ञान कहता है कि ऐसा व्यवहार हमेशा सिर्फ जिद या गैरजिम्मेदारी के कारण नहीं होता। कई बार इसके पीछे कुछ जटिल मनोवैज्ञानिक कारण भी होते हैं। जैसेकि- ऐसे में असली सवाल यह है कि बच्चे की इस आदत के कारणों को समझा जाए। फिर बिना शर्मिंदा किए उसे अपनी गलतियों की जिम्मेदारी लेना सिखाया जाए। आइए इस बारे में विस्तार से समझते हैं। बच्चा गलती क्यों नहीं स्वीकार कर रहा? पेरेंट्स अक्सर सोचते हैं कि बच्चा जानबूझकर बहाने बना रहा है। लेकिन कई बार इसके पीछे डर, असुरक्षा और परफेक्ट दिखने का दबाव होता है। और भी कई संभावित कारण हो सकते हैं। डिटेल ग्राफिक में देखिए- गलती शर्मिंदगी है या सीखने का मौका पेरेंट्स का व्यवहार ही है पहली शिक्षा बच्चे सिर्फ हमारी बातें नहीं सुनते, बल्कि हमारे व्यवहार से सीखते हैं। अगर घर में बड़े लोग- तो बच्चे भी वही सीखते हैं। इसलिए कभी-कभी बच्चे के सामने अपनी गलतियां स्वीकार करना भी बहुत असरदार होता है। इससे बच्चा सीखता है कि गलती मानना कमजोरी नहीं है। सिर्फ ‘सॉरी’ कहना काफी नहीं कई बार पेरेंट्स चाहते हैं कि बच्चा तुरंत ‘सॉरी’ बोले। लेकिन वो इस पर गौर नहीं करते कि क्या बच्चे को अपनी गलती का एहसास भी है। डांट खाने के डर से बच्चे ‘सॉरी’ तो फटाफट बोल देते हैं, लेकिन फिर वही गलती दोहराते हैं क्योंकि इसके पीछे ‘रिअलाइजेशन’ का प्रोसेस नहीं होता। सॉरी उनके लिए सिर्फ एक शब्द होता है, जो उस वक्त पड़ने वाली डांट से बचा लेगा। बच्चे को अकाउंटबिलिटी कैसे सिखाएं? जब बच्चा कोई गलती करे, तो तुरंत गुस्से में प्रतिक्रिया देने के बजाय उससे शांत होकर बात करने की कोशिश करें। उदाहरण के लिए, अगर उसने प्रोजेक्ट समय पर जमा नहीं किया, तो सिर्फ यह कहने की बजाय कि “तुम हमेशा बहाने बनाते हो,” उससे पूछें– ऐसे सवाल बच्चे को सोचने पर मजबूर करते हैं। उसे छोटी-छोटी जिम्मेदारियां देना भी जरूरी है। जैसे अपना बैग व्यवस्थित करना, किसी काम की डेडलाइन याद रखना या घर के छोटे काम संभालना। जब बच्चा जिम्मेदारी निभाता है, तो धीरे-धीरे अकाउंटबिलिटी डेवलप होती है। बच्चे को अकाउंटबिलिटी सिखाने के तरीके ग्राफिक में देखिए- गलती मानना कमजोरी नहीं बच्चे को यह भी समझाना जरूरी है कि जीवन में हर व्यक्ति गलती करता है। गलती होना समस्या नहीं है, बल्कि उससे सीखने से इनकार करना समस्या है। जब बच्चा अपनी गलती स्वीकार करे, तो उसकी तारीफ जरूर करें। जैसे- ऐसी प्रतिक्रियाएं बच्चे को सच बोलने और जिम्मेदारी लेने के लिए इमोशनली सेफ महसूस कराती हैं। बच्चे को भाषण नहीं, उदाहरण चाहिए अक्सर पेरेंट्स बच्चे की गलती के बाद लंबा भाषण देने लगते हैं। लेकिन लगातार एक जैसी बातें सुनने से बच्चों को उनकी आदत हो जाती है। इससे बच्चे पर इन बातों का प्रभाव कम हो जाता है। कई बार बच्चा सिर्फ यह महसूस करता है कि उसे जज किया जा रहा है। इसलिए छोटी, स्पष्ट और शांत बातचीत ज्यादा असरदार होती है। बच्चे को शर्मिंदा करने के खतरे अगर बच्चे को अक्सर ‘झूठा,‘ ‘गैरजिम्मेदार,‘ ‘बहानेबाज‘ कहा जाए, तो धीरे-धीरे वह खुद को उसी नजर से देखने लगता है। याद रखिए, बच्चे की गलती को ‘गलत’ कहना जरूरी है। लेकिन बच्चे को ‘गलत इंसान‘ महसूस कराना ठीक नहीं है। पेरेंट्स को कौन-सी गलतियां नहीं करनी चाहिए? कई बार माता-पिता ऐसे तरीके अपनाते हैं, जो बच्चे को डिफेंसिव बना सकते हैं। अगर हर गलती पर बहुत ज्यादा गुस्सा किया जाए, बार-बार पुरानी बातें याद दिलाई जाएं या दूसरों से तुलना की जाए, तो बच्चा अपनी सुरक्षा के लिए और ज्यादा बहाने बनाने लगता है। इसलिए पेरेंट्स को इन गलतियों से बचना चाहिए- यह समझना जरूरी है कि अकाउंटबिलिटी डर से नहीं, इमोशनल सेफ्टी से आती है। जब बच्चा यह महसूस करता है कि गलती के बाद भी उसे सुना जाएगा, तभी वह सच्चाई स्वीकारना सीखता है। कब एक्सपर्ट की मदद लें? वैसे तो थोड़ी समझदारी और विवेक के साथ इस समस्या को अपने स्तर पर सुलझाया जा सकता है। लेकिन समस्या ज्यादा बढ़े तो किसी चाइल्ड काउंसलर या साइकोलॉजिस्ट से सलाह लेना मददगार हो सकता है। जैसेकि– अंत में यही कहूंगी कि जब बच्चा यह समझता है कि गलती मानना शर्म की नहीं, बल्कि मैच्योरिटी की निशानी है, तो धीरे-धीरे वह जिम्मेदारी लेना सीख जाता है। इसके लिए पेरेंट्स का रोल मॉडल होना बहुत मायने रखता है। ………………ये खबर भी पढ़िएपेरेंटिंग- 4 साल के बेटे को कभी डांटा-मारा नहीं:अब वो बहुत जिद्दी हो गया है, बच्चे को बिना डांटे प्यार से डिसिप्लिन कैसे सिखाएं आपने अब तक बहुत धैर्य और समझदारी से पेरेंटिंग की है। लेकिन ‘कभी न डांटना’ और ‘कोई लिमिट न तय करना’ इन दोनों में फर्क होता है। बच्चे के मनोविज्ञान से जुड़ी कुछ बुनियादी बातें समझना जरूरी है। आगे पढ़िए...