Internet Problem in Train: ट्रेन में सफर करना भले ही कितना भी मजेदार हो, लेकिन एक चीज है जो हर यात्री को परेशान करती है, वह है मोबाइल नेटवर्क का गायब हो जाना. चाहे आप किसी से जरूरी बात कर रहे हों या वीडियो देख रहे हों. ट्रेन में सिग्नल अचानक चला जाता है या इंटरनेट की स्पीड बहुत धीमी हो जाती है. बहुत से लोग सोचते हैं कि यह सिर्फ उनके फोन या सिम कार्ड की कमी है, लेकिन असल में इसके पीछे कुछ वैज्ञानिक और तकनीकी वजह हैं. आइए जानते हैं कि ट्रेन में नेटवर्क की यह दिक्कत आखिर क्यों आती है? ट्रेन का मेटल बॉडी बनता है दिक्कत की पहली वजहट्रेन में नेटवर्क की समस्या का सबसे बड़ा कारण है ट्रेन के डिब्बे की बनावट. जी हां, आजकल ट्रेन के डिब्बे मेटल यानी धातु से बने होते हैं, और यह पूरा डिब्बा एक तरह का धातु का डिब्बा बन जाता है, जिसे विज्ञान की भाषा में फैराडे केज कहा जाता है. यह असल में एक मेटल बॉक्स की तरह काम करता है, जो मोबाइल सिग्नल जैसी माइक्रोवेव वेवस को बाहर ही रोक देता है. मजेदार बात यह है कि सिर्फ डिब्बे की दीवारें ही नहीं, बल्कि खिड़कियों के शीशों पर भी एक बहुत पतली धातु की परत लगाई जाती है, जो गर्मी और ठंड से बचाने में मदद करती है, लेकिन इसी वजह से मोबाइल सिग्नल भी अंदर आने से रुक जाता है. यही कारण है कि जब आप ट्रेन के अंदर बैठे होते हैं तो सिग्नल कमजोर दिखता है, लेकिन जैसे ही आप खिड़की के पास जाते हैं या डिब्बे से बाहर निकलते हैं, सिग्नल थोड़ा बेहतर हो जाता है. यह भी पढ़ेंः Fan Blades: भारत के पंखों में तीन और अमेरिका के पंखों में चार ब्लेड क्यों होते हैं, जानें क्या है वजह?तेज रफ्तार की वजह से बार-बार बदलता है टावरदूसरी बड़ी वजह है ट्रेन की तेज रफ्तार. जब आप एक जगह बैठे होते हैं, तो आपका फोन एक ही मोबाइल टावर से लगातार जुड़ा रहता है, लेकिन ट्रेन में सफर करते समय आप हर कुछ सेकंड में एक टावर के दायरे से निकल कर दूसरे टावर के दायरे में पहुंच जाते हैं. जैसे ही आपका फोन किसी टावर के सिग्नल के दायरे में आता है, उतनी ही तेजी से वह उस टावर के दायरे से बाहर भी निकल जाता है और उसे दोबारा किसी नए टावर से जुड़ने की कोशिश करनी पड़ती है. ट्रेन जितनी तेज चलती है, सिग्नल की ताकत उतनी ही तेजी से बदलती रहती है, जिससे कॉल कटने और नेटवर्क टूटने की संभावना और बढ़ जाती है.इसके अलावा एक और वजह है, जो रास्ते की भौगोलिक स्थिति से जुड़ा हुआ है. जब ट्रेन की पटरियां अक्सर ऐसे इलाकों से गुजरती हैं जहां आबादी कम होती है, जैसे जंगल, पहाड़ी इलाके, या फिर खेत-खलिहान. इन इलाकों में मोबाइल कंपनियां ज्यादा टावर नहीं लगाती हैं, क्योंकि वहां उपयोगकर्ताओं की संख्या कम होती है और टावर लगाना कंपनी के लिए फायदेमंद नहीं माना जाता. इसके अलावा, सुरंगों, पहाड़ी घाटियों और घुमावदार पटरियों पर भी सिग्नल कमजोर हो जाता है, क्योंकि वहां टावर का सीधा रास्ता ही फोन तक नहीं पहुंच पाता. यह भी पढ़ेंः अयोध्या के राम मंदिर में कितने कमरे, इसमें कहां गिना जाता है दान में मिलने वाला कैश?