सवाल- मैं और मेरे हसबैंड, दोनों जॉब करते हैं। मेरा ससुराल गोरखपुर में है और हम लखनऊ में रहते हैं। प्रॉब्लम ये है कि मेरे ससुराल वाले अक्सर बिना बताए हमारे घर आ जाते हैं और हफ्तों रुकते हैं। उन्हें लगता है कि बेटा-बहू का घर उनका अपना घर है। इसलिए पूछने की जरूरत नहीं। कई बार मैं ऑफिस से थकी लौटती हूं और घर में मेहमान होते हैं। हसबैंड अपने घरवालों को कुछ बोल नहीं पाते। मैं सास-ससुर का अपमान नहीं करना चाहती, लेकिन लग रहा है कि मेरी प्राइवेसी और सुविधा की कोई अहमियत नहीं रह गई है। मैं हसबैंड को ये बात कैसे समझाऊं कि उन्हें ये न लगे कि मैं उनकी फैमिली के खिलाफ हूं? एक्सपर्ट- डॉ. जया सुकुल, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, नोएडा सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि आपकी परेशानी का मतलब यह नहीं है कि आप सास-ससुर का सम्मान नहीं करतीं। आप सिर्फ इतना चाहती हैं कि आपके समय, सुविधा और निजी जिंदगी का भी ख्याल रखा जाए। आप और आपके पति दोनों नौकरी करते हैं। ऐसे में घर सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि दिनभर की भागदौड़ के बाद आराम करने की जगह भी होता है। जब कोई बिना बताए आ जाता है और कई दिनों तक रुकता है, तो दिनचर्या बदल जाती है। जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं और अपने लिए समय निकालना मुश्किल हो जाता है। मुझे लगता है कि आपकी तकलीफ सिर्फ अचानक मेहमान आने की नहीं, बल्कि बार-बार अपनी जरूरतों को पीछे रखने की है। इसलिए आपकी भावनाएं पूरी तरह जायज हैं। बात कहने में हिचक क्यों होती है? इस स्थिति में कई महिलाएं एक और दुविधा से गुजरती हैं। वे अपनी बात कहें तो डर लगता है कि कहीं लोग उन्हें स्वार्थी या परिवार के खिलाफ न समझ लें। वहीं चुप रहें तो मन में नाराजगी और थकान जमा होने लगती है। पति से कैसे करें बात आपके पति के लिए भी यह स्थिति उतनी आसान नहीं है। कई लोगों के लिए माता-पिता से सीमाएं तय करने वाली बातें करना भावनात्मक रूप से मुश्किल होता है। उन्हें डर रहता है कि कहीं माता-पिता को यह न लगे कि शादी के बाद बेटा बदल गया है या अब उनकी अहमियत कम हो गई है। मनोविज्ञान में इसे ‘लॉयल्टी कॉन्फ्लिक्ट’ कहते हैं। यानी व्यक्ति एक साथ दो अहम रिश्ते निभा रहा होता है- वह दोनों को खुश रखना चाहता है। लेकिन कई बार उसे लगता है कि एक की बात मानने पर दूसरा नाराज हो सकता है। यही दुविधा उसे खुलकर बात करने से रोकती है। इसलिए बातचीत की शुरुआत आरोप से नहीं, अपने अनुभव से करें। यह कहने से बचें- ‘तुम्हारे घरवाले हमेशा मेरे सिर पर आ जाते हैं।’ ऐसी बात सुनते ही ज्यादातर लोग समस्या की बजाय अपने परिवार का बचाव करने लगते हैं। इसके बजाय कहें- "मुझे आपके माता-पिता के आने से परेशानी नहीं है। लेकिन जब वे बिना बताए आते हैं, तो ऑफिस और घर की जिम्मेदारियां संभालना मेरे लिए मुश्किल हो जाता है। मैं चाहती हूं कि हम दोनों मिलकर इसका कोई तरीका निकालें।" याद रखें, लड़ाई लोगों से नहीं, स्थिति से है। ‘हम बनाम समस्या’ की लड़ाई रिश्तों पर लिखी चर्चित किताब ‘द सेवन प्रिंसिपल्स फॉर मेकिंग मैरिज वर्क’ में मनोवैज्ञानिक जॉन गॉटमैन लिखते हैं कि सफल दंपती समस्याओं को "तुम बनाम मैं" की तरह नहीं, बल्कि "हम बनाम समस्या" की तरह देखते हैं। यही सोच यहां भी मदद कर सकती है। आपसी समझ से निकलेगा रास्ता अक्सर ऐसी स्थितियों में समस्या लोगों से ज्यादा अनकही अपेक्षाओं की होती है। जब अपेक्षाएं स्पष्ट हो जाती हैं, तो तनाव भी कम होने लगता है। पति-पत्नी मिलकर कुछ बातों पर पहले से सहमति बना सकते हैं- याद रखें, सीमाएं तय करना दूरी बनाना नहीं है। जब परिवार में अपेक्षाएं स्पष्ट होती हैं और जिम्मेदारियां साझा होती हैं, तो रिश्तों में सहजता बनी रहती है और मन में शिकायतें भी कम जमा होती हैं। पति की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण ऐसी स्थितियों में यह उतना ही महत्वपूर्ण होता है कि बात कौन कह रहा है, जितना कि क्या कहा जा रहा है। अक्सर माता-पिता अपने बेटे की बात को ज्यादा सहजता से स्वीकार करते हैं, इसलिए यह बातचीत पति के जरिए होना बेहतर रहता है। वे कह सकते हैं- "मम्मी-पापा, आपके आने से हमें हमेशा खुशी होती है। बस अगर पहले बता दिया करें, तो हम अपने काम और समय को बेहतर तरीके से मैनेज कर पाएंगे।" ध्यान दीजिए, यहां किसी की गलती नहीं निकाली जा रही। बात सिर्फ इतनी है कि अपनापन बना रहे और सभी की दिनचर्या का भी सम्मान हो। अगर पति फिर भी कुछ न कहें तो? अगर बातचीत के बाद भी कोई बदलाव न दिखे, तो एक बार फिर शांत तरीके से अपनी बात रखें। ध्यान रखें, आप उनसे किसी एक रिश्ते को चुनने के लिए नहीं कह रही हैं। आप सिर्फ इतना चाहती हैं कि आपके घर से जुड़े फैसलों में आपकी राय और सुविधा को भी महत्व मिले। कई बार तकलीफ समस्या से नहीं, बल्कि अपनी बात अनसुनी रह जाने से होती है। इसलिए अपनी असुविधा को दबाने के बजाय उस पर खुलकर बात करना जरूरी है। अंतिम बात कई बार परिवारों में टकराव बुरी नीयत से नहीं, बल्कि अलग-अलग अपेक्षाओं की वजह से पैदा होता है। ऐसे में सवाल यह नहीं कि कौन सही है और कौन गलत। सवाल यह है कि क्या सभी लोग एक-दूसरे की जरूरतों को समझने और उन्हें जगह देने के लिए तैयार हैं। रिश्ते वहीं सबसे सहज रहते हैं, जहां अपनापन और सम्मान दोनों साथ बने रहें। ……………………….. ग्राफिक्स- विपुल शर्मा ……………………… ये खबर भी पढ़ें… रिलेशनशिप एडवाइज- मैं बेवकूफ था, गुस्से में ब्रेकअप कर लिया:अब गलती का एहसास है, एक्स से फिर दोस्ती करना चाहता हूं, क्या करूं सात साल गुजरने के बाद किसी पुराने रिश्ते को याद करने में कुछ भी असामान्य नहीं है। समय बीतने के साथ इंसान अपने पुराने व्यवहार को नए नजरिए से देख पाता है। उसे अपनी गलतियां भी समझ आती हैं। इसे ही हम ग्रोथ कहते हैं। जीवन में ग्रोथ होना बहुत अच्छी बात है। लेकिन यहां एक बात समझना जरूरी है। आपको अपनी गलतियों का एहसास हो गया है और अब आप चाहते हैं कि गुजररा वक्त फिर से लौट आए। पूरी खबर पढ़ें…