मेरठ के दंगों में दंगाइयों ने बशीर बद्र का घर जला दिया था. इस घटना का उनकी शायर पर गहरा असर पड़ा. इसी त्रासदी ने उनके मशहूर शेर 'तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में' को जन्म दिया.