Childhood Cancer: अब जानलेवा नहीं रहा चाइल्डहुड कैंसर! 85% बच्चों की बच रही जान

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Childhood Cancer Is No Longer A Death Sentence: कुछ दशक पहले तक बच्चों में कैंसर का पता चलना परिवारों के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं माना जाता था. इलाज के सीमित विकल्प और कम सर्वाइवल रेट के कारण कई माता-पिता उम्मीद छोड़ देते थे. लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है. मेडिकल साइंस में हुई प्रगति की बदौलत आज बड़ी संख्या में बच्चे कैंसर को मात देकर सामान्य और हेल्दी लाइफ जी रहे हैं.पूरी तरह ठीक हो रहे काफी मामले एक्सपर्ट के मुताबिक चाइल्डहुड कैंसर अब पहले की तुलना में कहीं ज्यादा इलाज योग्य और कई मामलों में पूरी तरह ठीक होने वाली बीमारी बन चुका है. बेहतर दवाएं, शुरुआती पहचान, आधुनिक इलाज और स्पेशलाइज्ड अस्पतालों की उपलब्धता ने बच्चों के इलाज के नतीजों को पूरी तरह बदल दिया है.डॉ. प्रमोद कुमार, फोर्टिस नई दिल्ली बताते हैं कि पिछले दो दशकों में चाइल्डहुड कैंसर के इलाज में जबरदस्त सुधार आया है. उनके अनुसार मौजूदा उपचार पद्धतियों के साथ कैंसर से पीड़ित करीब 80 से 85 फीसदी बच्चे लंबे समय तक जीवित रह सकते हैं. वहीं एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया  जैसे कुछ कैंसर में सही समय पर इलाज मिलने पर ठीक होने की संभावना 90 फीसदी से भी ज्यादा हो सकती है. बच्चों में कैंसर ठीक होने के मामले किन चीजों पर निर्भर करते हैं?डॉक्टरों का कहना है कि इलाज की सफलता कई बातों पर निर्भर करती है. कैंसर का प्रकार, बीमारी किस स्टेज में पकड़ में आई, बच्चे की जेनेटिक प्रोफाइल और शरीर इलाज पर कैसी प्रतिक्रिया देता है, ये सभी बातें अहम भूमिका निभाती हैं. बच्चों का शरीर कीमोथेरेपी को एडल्ट की तुलना में बेहतर तरीके से सहन कर लेता है, जिससे इलाज के सफल होने की संभावना भी बढ़ जाती है. इसे भी पढ़ेंः Bad Cholesterol: दवाइयों का झंझट होगा खत्म, सिर्फ जीन थैरेपी से होगा बैड कोलेस्ट्रॉल का वन टाइम इलाजबदला इलाज का तरीकाचाइल्डहुड कैंसर के इलाज में सबसे बड़ा बदलाव पर्सनलाइज्ड और रिस्क-आधारित ट्रीटमेंट के रूप में देखा जा रहा है. पहले सभी मरीजों को लगभग एक जैसी थेरेपी दी जाती थी, लेकिन अब डॉक्टर हर बच्चे की स्थिति के हिसाब से इलाज तय करते हैं. इससे इलाज ज्यादा प्रभावी होने के साथ-साथ साइड इफेक्ट्स भी कम होते हैं., आज बच्चों में कैंसर के इलाज के लिए कीमोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी, सर्जरी, रेडिएशन और बोन मैरो ट्रांसप्लांट जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है वहीं कठिन और दोबारा लौटने वाले कैंसर के मामलों में CAR-T सेल थेरेपी और स्टेम सेल ट्रांसप्लांट नई उम्मीद बनकर उभरे हैं. खासतौर पर ल्यूकेमिया और लिम्फोमा जैसे ब्लड कैंसर में इन तकनीकों के अच्छे परिणाम सामने आए हैं.भारत में बेहतर हो रहे हैं मामलेभारत में भी चाइल्डहुड कैंसर के मामलों में सर्वाइवल रेट लगातार बेहतर हो रहा है. जागरूकता बढ़ने, बेहतर डायग्नोसिस और स्पेशलाइज्ड कैंसर सेंटरों की उपलब्धता ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई है. एक्सपर्ट का कहना है कि अगर लगातार बुखार, बार-बार इंफेक्शन, असामान्य ब्लीडिंग, अत्यधिक थकान, सूजन या अचानक वजन कम होने जैसे संकेत दिखें तो उन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.इसे भी पढ़ेंः Heatwave Health Risks: हीटवेव से ब्रेन और किडनी पर हो रहा असर, गर्मी के इन खतरनाक लक्षणों को कतई न करें इग्नोरDisclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.