पाकिस्तान बोला- इजराइल को देश नहीं मानेंगे:विचारधारा से समझौता मंजूर नहीं, ट्रम्प ने मुस्लिम देशों से कहा था- इजराइल से दोस्ती करें

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पाकिस्तान ने इजराइल से दोस्ती करने और उसे देश की मान्यता देने से इनकार कर दिया है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि पाकिस्तान अपनी मौलिक विचारधाराओं से समझौता नहीं कर सकता। आसिफ ने कहा हम उन लोगों के साथ कैसे बैठ सकते हैं जिनकी बात पर एक दिन के लिए भी भरोसा नहीं किया जा सकता। पाकिस्तान दुनिया का शायद इकलौता देश है, जिसके पासपोर्ट पर लिखा होता है कि यह इजराइल के लिए मान्य नहीं है। इससे पाकिस्तान का रुख पूरी तरह साफ है और इसमें कोई बदलाव नहीं होगा। दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने मुस्लिम देशों से इजराइल से रिश्ते सुधारने और अब्राहम समझौते में शामिल होने की अपील की थी। पाकिस्तान से भी कहा गया था कि अगर वह अमेरिका-ईरान शांति प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहता है, तो उसे इजराइल को मान्यता देनी होगी। पाकिस्तान के लिए अब्राहम समझौते में शामिल होना मुश्किल पाकिस्तान के लिए अब्राहम समझौते में शामिल होने का मामला संवेदनशील है और राजनीतिक रूप से मुश्किल है। पाकिस्तान लंबे समय से खुद को फिलिस्तीन के समर्थक देश के तौर पर पेश करता रहा है। वहां आम जनता के बीच फिलिस्तीन का मुद्दा भावनात्मक और धार्मिक दोनों स्तर पर बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि पाकिस्तान अमेरिका के साथ अपने रिश्ते खराब नहीं करना चाहेगा लेकिन वह अपनी घरेलू राजनीति को भी नजरअंदाज नहीं कर सकता है। पाकिस्तान ने पिछले 78 साल में कभी इजराइल को मान्यता नहीं दी है। उसका आधिकारिक रुख यह रहा है कि जब तक 1967 से पहले की सीमाओं के आधार पर स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य नहीं बनता, तब तक वह इजराइल को मान्यता नहीं देगा। इसी वजह से पाकिस्तान में इजराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने का मुद्दा हमेशा घरेलू राजनीति से भी जुड़ा रहा है। किसी भी सरकार के लिए इस पर नरम रुख अपनाना राजनीतिक जोखिम माना जाता है। अमेरिकी समर्थक गठबंधन बनाना चाहते हैं ट्रम्प एक्सिओस के मुताबिक ट्रम्प की सबसे बड़ी रणनीतिक कोशिश यह है कि ईरान युद्ध खत्म होने के बाद पश्चिम एशिया में एक नया अमेरिकी समर्थक गठबंधन तैयार किया जाए, जिसमें इजराइल और प्रमुख अरब देश एक साथ हों। दशकों तक अरब देशों की नीति थी कि फिलिस्तीन मुद्दा सुलझे बिना इजराइल को मान्यता नहीं दी जाएगी। ट्रम्प की कोशिशों के बाद 2020 में अब्राहम समझौते ने उस पुरानी नीति को तोड़ दिया। इसके तहत UAE, बहरीन और मोरक्को जैसे देशों ने इजराइल के साथ आधिकारिक संबंध बनाए। ट्रम्प बोले- इजराइल से रिश्ते सुधारने पर फायदा होगा ट्रम्प ने कहा कि अगर ये देश इजराइल के साथ रिश्ते बनाते हैं तो यह समझौता इतिहास की सबसे बड़ी घटनाओं में बदल सकता है। उन्होंने दावा किया कि अब्राहम अकॉर्ड्स से जुड़े देशों को आर्थिक, व्यापारिक और सामाजिक स्तर पर बड़ा फायदा हुआ है। उन्होंने कहा कि UAE, बहरीन, मोरक्को, सूडान और कजाकिस्तान को इससे खूब फायदा मिला है। उन्होंने इसे दुनिया का सबसे सम्मानित और सबसे महत्वपूर्ण समझौता बताया। ट्रम्प ने दावा किया कि अब्राहम अकॉर्ड्स पश्चिम एशिया को 5000 साल में पहली बार असली ताकत, शांति और आर्थिक मजबूती दे सकता है। सऊदी अरब और कतर को अब्राहम अकॉर्ड्स साइन करके इसकी शुरुआत करनी चाहिए। बाकी देशों को भी ऐसा करना चाहिए। गाजा जंग के बाद इजराइल के खिलाफ नाराजगी बढ़ी अब्राहम समझौते का मकसद सिर्फ राजनयिक संबंध नहीं है। इसके पीछे सुरक्षा, व्यापार, तकनीक, रक्षा सहयोग और सबसे बढ़कर ईरान को लेकर साझा चिंता है। ट्रम्प ने अपने पहले कार्यकाल में इसे पश्चिम एशिया में नई रणनीतिक व्यवस्था के रूप में पेश किया था। अब ट्रम्प चाहते हैं कि इस समझौते का दायरा और बढ़े। इसमें सबसे बड़ी बाधा सऊदी अरब और पाकिस्तान हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पहले इजराइल के साथ बेहतर रिश्ते को लेकर लगभग तैयार हो चुके थे, लेकिन गाजा युद्ध के बाद हालात बदल गए। अरब देशों में इजराइल के खिलाफ गुस्सा बढ़ा है और फिलिस्तीन का मुद्दा फिर केंद्र में आ गया है। सऊदी अरब ने साफ कहा है कि वह तभी इजराइल से रिश्ते सामान्य करेगा जब फिलिस्तीनी राष्ट्र बनाने की दिशा में स्पष्ट और स्थायी कदम उठेंगे। इजराइल इस मांग को मानने के लिए तैयार नहीं दिखता। पश्चिम एशिया की जमीन पर स्थिति बेहद जटिल है। यह इलाका राजनीतिक और धार्मिक तनाव से भरा हुआ है। गाजा युद्ध ने अरब दुनिया में भारी गुस्सा पैदा किया है। ऐसे माहौल में किसी भी अरब सरकार के लिए इजराइल से खुले रिश्ते बनाना आसान नहीं है। इमरान खान ने शामिल होने से इनकार किया था ट्रम्प ने पिछले कार्यकाल में पाकिस्तान को अब्राहम समझौते से जोड़ने की कोशिश हुई थी। लेकिन तब के प्रधानमंत्री इमरान खान ने इस समझौते में शामिल होने से इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा था कि ऐसा करना पाकिस्तान की पुरानी दो-राष्ट्र समाधान नीति के खिलाफ होगा। अब्राहम समझौते पर दस्तखत के कुछ महीने बाद इमरान खान ने दावा किया था कि उनकी सरकार पर अमेरिका और दूसरे ‘मित्र’ देशों की तरफ से इजराइल से संबंध सामान्य करने का दबाव डाला गया। लेकिन वे जायनिस्टों के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे। तब यह माना गया था कि वे मित्र देश सऊदी अरब और UAE हैं। हालांकि इमरान ने कभी उन देशों का नाम नहीं लिया। इससे बाद साल 2022 में सत्ता से हटाए जाने के बाद इमरान खान ने आरोप लगाया था कि अंतरराष्ट्रीय साजिश के तहत लाई गई शहबाज शरीफ सरकार को इजराइल को मान्यता देने का काम सौंपा गया है। इजराइल को मान्यता देने के खिलाफ थे जिन्ना पाकिस्तान में यह धारणा भी मजबूत है कि इजराइल को मान्यता देना देश की स्थापना के मूल सिद्धांतों के खिलाफ होगा। पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने कभी इजराइल के गठन का विरोध करते हुए उसे अरब दुनिया के दिल में घोंपा गया खंजर कहा था। विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान फिलिस्तीन और कश्मीर के मुद्दों को अक्सर एक-दूसरे से जोड़कर देखता रहा है। पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर को लेकर भारत की आलोचना करता है और फिलिस्तीन के समर्थन को भी उसी नैरेटिव का हिस्सा बनाता है। ऐसे में अगर वह फिलिस्तीन मुद्दे पर अपना रुख बदलता है तो कश्मीर पर उसका नैतिक तर्क कमजोर पड़ सकता है। ------------------------------ ये खबर भी पढ़ें… ट्रम्प मुस्लिम देशों से बोले- इजराइल से दोस्ती करें:पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ेंगी, वह इजराइल को देश भी नहीं मानता ट्रम्प ने मुस्लिम देशों से इजराइल के साथ रिश्ते बेहतर करने को कहा है। उन्होंने शनिवार को सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्किये, मिस्र और जॉर्डन के नेताओं के साथ वर्चुअल मीटिंग की। पूरी खबर यहां पढ़ें…