अरुणाचल प्रदेश के ईगलनेस्ट वाइल्डलाइफ सेंचुरी (अरुणाचल के कामेंग जिले में हिमालय की तलहटी में स्थित एक प्रमुख संरक्षित क्षेत्र) में हाथियों को समुद्र तल से 3,266 मीटर (± 10 मीटर) की ऊंचाई पर रिकॉर्ड किया गया है. ये दुनिया में कहीं भी दर्ज की गई हाथियों की सबसे ऊंची उपस्थिति है. अरुणाचल प्रदेश वन विभाग और WWF-India ने हाल ही में 'मानव-हाथी संघर्ष प्रबंधन: रणनीति और कार्य योजना (2026)' नामक विस्तृत रिपोर्ट जारी की गई है. रिपोर्ट में हाथियों के व्यवहार और उनके भौगोलिक वितरण में आए नए और बड़े बदलावों के बारे में बताया गया है. हाथियों की ऊंचाई पर जाना बना रिकॉर्ड, लेकिन चिंता का विषय? रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया में हाथियों के झुंड को पहली बार इतनी ऊंचाई पर दर्ज किया गया. ये नया विश्व रिकॉर्ड है, लेकिन साथ ही बहुत सारे सवाल भी उठ रहे हैं. दरअसल, पश्चिम कामेंग जिले के ईगलनेस्ट वाइल्डलाइफ सेंचुरी (Eaglenest Wildlife Sanctuary) में हाथियों के निशान समुद्र तल से 3,266 मीटर (± 10 मीटर) की ऊंचाई पर दर्ज किए गए हैं. इसके अलावा, 3,226 मीटर की ऊंचाई पर एक युवा हाथी (juvenile elephant) कैमरा-ट्रैप में देखा गया है.यह दुनिया में हाथियों की इतनी अधिक ऊंचाई पर मौजूदगी का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है. ईगलनेस्ट के उत्तर में टेंगा घाटी में भी 5-6 हाथियों का झुंड देखा गया है.ऊंचाई के अलावा 3 और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं.1- हाथियों के भौगोलिक क्षेत्र में 78% की वृद्धि: 2017 के अध्ययन में अरुणाचल प्रदेश में हाथियों का फैलाव क्षेत्र 7,001 वर्ग किलोमीटर था. ताजा रिपोर्ट के अनुसार, यह क्षेत्र 78% बढ़कर 12,446 वर्ग किलोमीटर हो गया है. अब अरुणाचल प्रदेश के 17 जिलों में हाथियों की उपस्थिति है. जो 150 मीटर से लेकर 3,266 मीटर की ऊंचाई तक दर्ज किया गया है.2. बस्तियों का विस्तार: हाथियों-इंसानों के बीच संघर्ष वाले इलाकों में इंसानी बस्तियां और इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से फैल रहे हैं. इससे हाथियों के पारंपरिक कॉरिडोर और आवास सिकुड़ रहे हैं.सैटेलाइट डेटा (2018-2023) के विश्लेषण से पता चला है कि मानव बस्तियों और निर्मित क्षेत्रों में भारी वृद्धि हुई है. पिछले पांच सालों में तिरप जिले की बस्तियों में 81.37%, पक्के केसांग में 69.40% और पापुम पारे में 64.14% की वृद्धि हुई है. 3- विकास परियोजनाओं के कारण हाथियों का कैद होना: नेशनल हाईवे-13 (NH-13) के चौड़ीकरण (नेचिपू से होज तक) और रंगा नदी व पारे नदी जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण के कारण हाथियों की आवाजाही बाधित हुई है. स्थानीय वन अधिकारियों के अनुसार, सगाली वन प्रभाग (Sagalee Forest Division) की सगाली रेंज में NH-13 के उत्तरी हिस्से में पारे नदी के बाएं किनारे पर जंगल के एक छोटे से हिस्से में 25 से 30 हाथियों का एक झुंड पूरी तरह से अलग-थलग हो गया है. रास्ते कट जाने और इस तरह एक ही जगह कैद हो जाने के कारण, ये हाथी अब ओम्पुलि (Ompuli), ख्युंगलो (Khyunglo), दापो (Dapo) और 47 व 52 किलोमीटर कैंप जैसे आसपास के गांवों में घुसकर संघर्ष का कारण बन रहे हैं.मानव-हाथी संघर्ष के हॉटस्पॉटअरुणाचल प्रदेश में मानव-हाथी संघर्ष (Human-Elephant Conflict) के सबसे ज्यादा मामले 6 प्रमुख जगहों पक्के केसांग, पापुम पारे, ईस्ट सियांग, लोहित, चांगलांग और तिरप में दर्ज किए गए हैं. इनमें पापुम पारे, पाक्के केसांग और ईस्ट सियांग में फसल नुकसान की सबसे अधिक घटनाएं दर्ज की गईं, जहां 2014-15 से 2023-24 के बीच 93 से 373 तक मामले रिपोर्ट हुए.पाक्के केसांग संपत्ति नुकसान का सबसे बड़ा हॉटस्पॉट बनकर उभरा. पापुम पारे और तिराप मानव हताहतों के प्रमुख हॉटस्पॉट रहे, जहा. हाथियों के कारण मानव मौत की तीन-तीन घटनाएं दर्ज की गईं. संघर्ष के प्राथमिक कारणों में भूमि उपयोग (Land Use) में बदलाव, मानव बस्तियों का विस्तार, कृषि क्षेत्र और बुनियादी ढांचे के विकास से महत्वपूर्ण कॉरिडोर्स का विखंडन शामिल है. इन्हें कुछ आंकड़ों के जरिए समझते हैं.1. मानव बस्तियों का तेजी से विस्तार हुआ है. सैटेलाइट डेटा (LULC) के विश्लेषण से पता चलता है कि पिछले 5 वर्षों (2018 से 2023) के दौरान इन 6 हॉटस्पॉट जिलों के निर्मित क्षेत्रों (Human Settlements/Built-up areas) में बहुत बड़ी वृद्धि हुई है, जिससे हाथियों का प्राकृतिक आवास छिन गया है. 2. कृषि भूमि और फसलों का स्वरूप इन जिलों में खेती का एक बड़ा रकबा है जो सीधे तौर पर हाथियों के प्राकृतिक आवास क्षेत्र (Foothills) से टकराता है.रिपोर्ट के अनुसार, चांगलांग में सबसे अधिक 43,907 हेक्टेयर कृषि भूमि है. इन इलाकों में मुख्य रूप से धान, मक्का, बाजरा जैसी फसलों के साथ-साथ बागवानी और कुछ जगहों पर नकदी फसलों (जैसे पाम ऑयल प्लांटेशन) की खेती की जा रही है. बस्तियों और खेती के इस विस्तार ने हाथियों को भोजन की तलाश में खेतों की ओर आने पर मजबूर किया है. 3. कॉरिडोर्स का विखंडन: दुलुंग-सुबनसिरी कॉरिडोर हाथियों के लिए एक बेहद अहम रास्ता है, जो अरुणाचल प्रदेश के पनीर रिजर्व फॉरेस्ट और दुलुंग रिजर्व फॉरेस्ट को सुबनसिरी नदी के पार असम के सुबनसिरी रिजर्व फॉरेस्ट से जोड़ता है. इस कॉरिडोर को निम्नलिखित कारणों से नुकसान पहुंचा है.एनएचपीसी (NHPC) हाइड्रो प्रोजेक्ट: सुबनसिरी नदी पर एनएचपीसी जलविद्युत परियोजना (hydro project) की स्थापना के कारण यह कॉरिडोर बुरी तरह बाधित हुआ है. टाउनशिप और सड़कों का निर्माण: इस जलविद्युत परियोजना से जुड़े अन्य विकास कार्यों, जैसे कि प्रोजेक्ट टाउनशिप और नई सड़कों के निर्माण ने इस कॉरिडोर क्षेत्र के भूमि उपयोग (land use) को पूरी तरह से बदल दिया है. रेत खनन (Sand Mining): नदी के किनारे चल रहे रेत खनन ने हाल के समय में इस कॉरिडोर से होकर गुजरने वाले हाथियों की आवाजाही में बहुत बड़ी रुकावट पैदा कर दी है. दुलुंग-सुबनसिरी कॉरिडोर हाथियों के लिए एक बेहद अहम रास्ता है.हाथियों का ऊंचाई की ओर जाना क्या यह जलवायु संकट का संकेत है या इंसानी दखल का नतीजा?जब यह सवाल उठता है कि क्या यह जलवायु संकट (Climate Crisis) का संकेत है, तो रिपोर्ट इसे मुख्य रूप से मानवजनित कारणों (Human-induced drivers) और भूमि उपयोग (Land Use) में हो रहे तेज बदलावों से जोड़ती है. हालांकि जलवायु परिवर्तन वैश्विक स्तर पर एक सच्चाई है, लेकिन अरुणाचल प्रदेश के संदर्भ में रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि हाथियों के इस विस्थापन का सबसे बड़ा कारण उनके प्राकृतिक आवासों (Foothills) का सिकुड़ना है. निचले इलाकों में इंसानी बस्तियों का विस्तार (कुछ जिलों में 81% तक), खेती के तरीकों में बदलाव, और सड़कों व बांधों जैसे बुनियादी ढांचे के निर्माण ने हाथियों के पारंपरिक रास्तों को काट दिया है. अपने ठिकानों और कॉरिडोर्स के छिन जाने और सिकुड़ते जंगलों के कारण हाथी अब सुरक्षित जगहों और खाने की तलाश में उन ऊंचाइयों तक जाने को मजबूर हो रहे हैं, जहां वे पहले कभी नहीं जाते थे. वर्तमान में जीवित हाथियों की तीन प्रजातियों में एशियाई हाथी (Elephas maximus), अफ्रीकी सवाना हाथी (Loxodonta Africana) और अफ्रीकी फॉरेस्ट हाथी (Loxodonta cyclotis) की तुलना में सबसे अधिक संकटग्रस्त माना जाता है. जंगलों में अब 50,000 से भी कम एशियाई हाथी बचे हैं, और भारत दुनिया के लगभग 60% जंगली एशियाई हाथियों का घर है, जिनकी अनुमानित संख्या 27,000 से 29,000 के बीच है.पूर्वोत्तर भारत में 10,139 हाथी हैं, जिनमें से अरुणाचल प्रदेश में 1,614 हाथी दर्ज हैं. पूरे भारत में हाथियों के साथ होने वाले संघर्ष में हर साल 600 से अधिक लोगों की मृत्यु होती है. मानवजनित कारणों से प्रति वर्ष लगभग 100 हाथियों की जान जाती है. 2009 से 2023 के बीच देश भर में बिजली का करंट (Electrocution) लगने से 898 हाथियों की मौत हुई है.अरुणाचल में 2007 से 2024 के बीच मानव-हाथी संघर्ष के कुल 1,503 मामले दर्ज किए गए. इनमें सबसे बड़ा हिस्सा फसल के नुकसान का है, जो कुल घटनाओं का 91.08% (1,369 मामले) है. इसके बाद घरों का नुकसान (5.26%) और संपत्ति का नुकसान (1.66%) है. मानव मृत्यु और घायलों की संख्या कुल मामलों का लगभग 2% है.हाथियों की मृत्यु का आंकड़ा: अरुणाचल में 2018 से 2024 के बीच 17 हाथियों की मौत दर्ज की गई. इनमें से 5 की मौत बिजली का करंट लगने से (पक्के टाइगर रिजर्व में) और 1 मौत ट्रेन की टक्कर से (बेंडरदेवा वन प्रभाग में) हुई.