तुर्किये की संसद ने गुरुवार को सऊदी अरब और पाकिस्तान के साथ हुए रक्षा समझौते को मंजूरी दे दी। समझौते को लेकर तुर्किये की विपक्षी सांसद गुलिस्तान किलिक कोचिगित ने संसद में सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि अगर भारत और पाकिस्तान के बीच जंग हुई, तो क्या तुर्किये को पाकिस्तान की मदद के लिए सेना भेजनी पड़ेगी? तुर्किये सरकार ने साफ किया है कि समझौते के बावजूद सेना भेजने के लिए संसद की अलग से मंजूरी लेनी होगी। तीन महीने पहले तुर्किये, पाकिस्तान और सऊदी अरब ने मक्का पैक्ट पर साइन किया था। समझौते के तहत तीनों में से किसी एक देश पर हमला बाकी दोनों देशों पर हमला माना जाएगा। विपक्ष ने कहा- एर्दोगन ने देश का भविष्य दांव पर लगाया कोचिगित तुर्किये की कुर्द समर्थक डेम पार्टी की डिप्टी संसदीय नेता हैं। उन्होंने चिंता जताई कि इस समझौते के चलते तुर्किये को ऐसे युद्ध में उतरना पड़ सकता है, जिसमें शामिल होने का फैसला उसने खुद नहीं किया होगा। उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव और दोनों देशों के पास परमाणु हथियार होने का भी जिक्र किया। कोचिगित ने यह सवाल भी उठाया कि अगर मक्का समझौता ईरान को घेरने की रणनीति का हिस्सा है, तो सरकार को यह साफ करना चाहिए। उन्होंने कहा कि तुर्किये के ईरान के साथ ऐतिहासिक संबंध हैं। कोचिगित ने राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन से इस समझौते पर सफाई देने की मांग की। उन्होंने कहा कि बिना शर्तें साफ किए ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर करके एर्दोगन ने देश का भविष्य दांव पर लगा दिया है। समझौते के तहत खुफिया जानकारी साझा करेगा तुर्किये मक्का समझौते पर अगस्त में हस्ताक्षर हुए थे। इसमें 16 बातें शामिल हैं। इसके तहत तीनों देश एक-दूसरे की रक्षा में मदद करेंगे। वे खुफिया जानकारी साझा करेंगे और हथियार बनाने के मामले में भी एक-दूसरे का साथ देंगे। तुर्किये की संसद की विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष फुआत ओकताय ने कहा कि तुर्किये अपनी मर्जी के बिना किसी युद्ध में शामिल नहीं होगा। सरकार ने यह भी कहा कि तुर्किये यमन में लड़ने या हूती विद्रोहियों पर हमला करने के लिए अपने सैनिक नहीं भेजेगा। यानी सेना भेजने का फैसला संसद करेगी। हालांकि, तुर्किये जरूरत पड़ने पर हथियार, खुफिया जानकारी और तकनीकी मदद दे सकता है। क्या मुस्लिम देशों का नया NATO बन रहा है? पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हुए इस समझौते को कुछ जानकार 'मुस्लिम NATO' बनाने की दिशा में एक कदम मान रहे हैं। इसकी वजह यह है कि NATO की तरह इसमें भी तीनों देश एक-दूसरे की सुरक्षा में मदद करने की बात कर रहे हैं। हालांकि, अभी इसे NATO जैसा मजबूत गठबंधन नहीं कहा जा सकता। इसमें सिर्फ तीन देश शामिल हैं। कुछ देशों ने इस समझौते में शामिल होने की इच्छा जताई है मिस्र: विदेश मंत्री बद्र अब्देलअत्ती ने 13 अक्टूबर को कहा था कि उनका देश इस समझौते में शामिल होने पर गंभीरता से विचार कर रहा है। बांग्लादेश: कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, बांग्लादेश ने भी इसमें शामिल होने में दिलचस्पी दिखाई है। कतर, कुवैत और बहरीन: इन देशों के नाम भी संभावित सदस्यों के तौर पर सामने आए हैं, लेकिन शामिल होने की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। भारत ने कहा था- राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता नहीं करेंगे भारत ने भी पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये के बीच हुए रक्षा समझौते पर चिंता जताई थी। 7 अगस्त 2026 को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा था कि भारत इस घटनाक्रम पर नजर रख रहा है। बाद में उन्होंने कहा कि सरकार इस समझौते के भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय शांति पर पड़ने वाले असर का आकलन कर रही है। उन्होंने साफ किया कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाएगा। ------------------------ यह खबर भी पढ़ें… पाकिस्तान, तुर्किये, कतर और इंडोनेशिया मिलकर हथियार बनाएंगे:चारों देशों के बीच करार; अब PAK मुस्लिम देशों के साथ साझेदारी बढ़ा रहा पाकिस्तान, तुर्किये, कतर और इंडोनेशिया अब मिलकर हथियार बनाएंगे। चारों देशों ने बुधवार को कतर की राजधानी दोहा में बद्र समझौता किया। इसके तहत हथियारों का साझा उत्पादन, सैन्य तकनीक का लेनदेन और रक्षा क्षेत्र में ट्रेनिंग और रिसर्च की जाएगी। पूरी खबर पढ़ें…