पेरेंटिंग- बेटा बड़ा हो रहा है:डरती हूं, कहीं गलत संगत में न पड़ जाए, उसे सही-गलत में फर्क करना, अच्छे दोस्त चुनना कैसे सिखाएं

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सवाल- मैं लखनऊ से हूं। मेरा बेटा 12 साल का है। हाल ही में उसका स्कूल बदला है। उसने वहां कुछ नए दोस्त बनाए हैं और अब उन्हीं के साथ ज्यादा समय बिताता है। एक मां होने के नाते मुझे खुशी है कि वह घुल-मिल रहा है, लेकिन यह चिंता भी रहती है कि कहीं वह गलत संगत में न पड़ जाए। मैं हर दोस्त की जांच-पड़ताल भी नहीं करना चाहती। मेरा सवाल ये है कि बच्चों को कैसे समझाएं कि कौन-सी दोस्ती उनके लिए अच्छी है? किस तरह के लोगों से दूरी बनाना बेहतर है? एक्सपर्ट- रिद्धि दोषी पटेल, चाइल्ड एंड पेरेंटिंग साइकोलॉजिस्ट, मुंबई जवाब- सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। आपकी चिंता स्वाभाविक है। जब बच्चा नए स्कूल में जाता है तो नए माहौल में खुद को एडजस्ट करता है और नए दोस्त बनाता है। ऐसे में लगभग हर माता-पिता के मन में यही सवाल आता है कि उसके नए दोस्त कैसे होंगे और उनका उस पर क्या असर पड़ेगा। ऐसे में पेरेंट्स का लक्ष्य बच्चे के लिए अच्छा दोस्त चुनने की बजाय अपने बच्चे को इतना समझदार बनाना होना चाहिए कि वह खुद अच्छे और बुरे में फर्क कर सके। बच्चों के जीवन में दोस्ती का प्रभाव जब बच्चा छोटा होता है, तब उसके लिए माता-पिता सबसे बड़े रोल मॉडल होते हैं। लेकिन जैसे-जैसे वह टीनएज के करीब पहुंचता है, उसकी जिंदगी में दोस्तों की भूमिका बढ़ने लगती है। इस उम्र में बच्चा चाहता है कि- इसी वजह से कई बार बच्चे दोस्तों की आदतें, भाषा, व्यवहार, रुचियों और शौक को अपनाने लगते हैं। यह विकास का सामान्य हिस्सा है। लेकिन समस्या तब होती है, जब बच्चा दोस्ती में बने रहने के लिए अपनी समझ और मूल्यों को नजरअंदाज करने लगता है। अच्छा दोस्त कैसा होता है? अक्सर माता-पिता बच्चों को यह बताते हैं कि किससे दोस्ती नहीं करनी चाहिए। लेकिन उससे ज्यादा जरूरी यह बताना है कि अच्छी दोस्ती कैसी होती है। आप बेटे से बातचीत के दौरान पूछ सकती हैं- जब बच्चा इन सवालों पर सोचता है, तो वह धीरे-धीरे दोस्ती की क्वालिटी को समझना शुरू करता है। हमें बच्चों को ये बताना चाहिए कि एक अच्छे दोस्त की पहचान क्या होती है। दोस्ती में सम्मान और भरोसा जरूरी कई बच्चे सोचते हैं कि जो उनके साथ सबसे ज्यादा समय बिताता है, वही उनका सबसे अच्छा दोस्त है। लेकिन असल में अच्छी दोस्ती का आधार सम्मान और भरोसा होता है। उसे बताएं कि एक अच्छा दोस्त- साथ ही बच्चे को समझाएं कि दोस्ती में डर, दबाव या अपमान की कोई जगह नहीं होती है। बच्चे के दोस्तों में दिखाएं रुचि बहुत से माता-पिता बच्चे के दोस्तों में रुचि नहीं दिखाते, जबकि इससे बच्चे को इमोशनल सपाेर्ट मिलता है। आप बच्चे से पूछ सकते हैं- जब बच्चा महसूस करता है कि आप उसकी दोस्ती को समझना चाहते हैं, तब वह खुलकर बातें करता है। बच्चे की जासूसी न करें कई बार पेरेंट्स बच्चे के दोस्तों को जानने-समझने के लिए जासूसी करते हैं या हमेशा पूछताछ करते रहते हैं। ये हेल्दी तरीका नहीं है। बच्चे के दोस्त कैसे हैं, उसकी संगत कैसी है, इसे परखने के लिए कुछ आसान तरीके अपना सकते हैं, जैसेकि- कैसे समझें, बच्चा बुरी संगत में है? टीनएज में बच्चे दोस्तों से बहुत कुछ सीखते हैं। लेकिन अगर नए दोस्त बनाने के बाद बच्चे के व्यवहार, आदतों या सोच में नकारात्मक बदलाव दिखे तो यह इस बात का संकेत हो सकता है कि बच्चे की संगत ठीक नहीं है। ग्राफिक में सभी वॉर्निंग साइन देखिए- अगर बच्चे में ये संकेत दिखें तो सतर्क हो जाएं। डांटने की बजाय बच्चे से खुलकर बात करें। संगत खराब हो तो क्या करें? पहले स्थिति को समझने की कोशिश करें। आपका उद्देश्य दोस्ती खत्म कराना नहीं, बल्कि बच्चे को सही-गलत समझने में मदद करना होना चाहिए। इसके लिए कुछ कदम उठा सकते हैं- पेरेंट्स की कॉमन गलतियां कई बार माता-पिता बच्चे के दोस्तों को बिना जाने-समझे जज कर लेते हैं। इससे बच्चा अपनी साेशल लाइफ छिपाने लगता है और पेरेंट्स से दूर होने लगता है। इसलिए इन गलतियों से बचें- अंत में यही कहूंगी कि दोस्ती बच्चे की पर्सनैलिटी को शेप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए माता-पिता का काम हर दोस्त को कंट्रोल करना नहीं, बल्कि बच्चे को अच्छे और बुरे प्रभाव में फर्क करना सिखाना है। जब घर में भरोसे और बातचीत का माहौल होता है, तो बच्चा किसी भी परेशानी या गलत प्रभाव के बारे में खुलकर बात करने में सहज महसूस करता है। यही भरोसा उसे सही दोस्त चुनने और जीवन में बेहतर फैसले लेने में मदद करता है। ………………….. पेरेंटिंग की ये खबर भी पढ़िए पेरेंटिंग- 10 साल का बेटा पैसे की कीमत नहीं समझता: दोस्तों को देखकर महंगे कपड़े-खिलौने मांगता है, उसे पैसे की वैल्यू कैसे सिखाएं दरअसल 8-10 साल की उम्र में बच्चे पैसे की वैल्यू नहीं समझते। उन्हें सिर्फ इतना पता होता है कि जो चीज उन्हें पसंद है, वह उनके पास होनी चाहिए। उन्हें यह समझ नहीं होती कि पैसे कहां से आते हैं, कैसे कमाए जाते हैं या बजट कैसे बनाया जाता है। पूरी खबर पढ़िए…