याचिकाकर्ताओं की ओर से केंद्र सरकार के आल इंडिया सर्वे आन हायर एजुकेशन का भी हवाला दिया गया। दलील दी गई कि उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षित वर्गों का प्रतिनिधित्व लगभग 77 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। ऐसे में वस्तुनिष्ठ अध्ययन के बिना आरक्षण बढ़ाने का निर्णय न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।