सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को शिवसेना के चुनाव चिह्न विवाद पर सुनवाई हुई। इस दौरान CJI जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने एक बड़ा सवाल उठाया। कोर्ट ने पूछा कि क्या उन लोगों को पार्टी का निशान दिया जा सकता है जिन्होंने 'दल-बदल' जैसा संवैधानिक पाप किया है? कोर्ट यह जानना चाहता है कि क्या सिर्फ विधायकों की संख्या को ही एकमात्र पैमाना मानना सही है, जबकि उन विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्रवाई कोर्ट में चल रही हो। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी पूछा था कि चुनाव आयोग दोनों गुटों को धनुष-बाण निशान देने से इनकार क्यों नहीं किया था। सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को इस मामले पर सुनवाई पूरी नहीं हो सकी। बुधवार को भी सुनवाई जारी रहेगी। शिंदे गुट बोला- विधायी बहुमत के आधार पर फैसला कानूनन सही सुनवाई के दौरान शिंदे गुट ने दलीलें दी कि चुनाव आयोग का विधायी बहुमत के आधार पर फैसला लेना कानूनी रूप से सही था। उन्होंने कहा कि उनके पास पार्टी के अधिकतर चुने हुए विधायक और सांसद हैं (55 में से 40 विधायक और 18 में से 13 सांसद), जो यह साबित करता है कि वे ही असली शिवसेना हैं। उन्होंने कहा कि संविधान की दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 2(1)(a) के तहत अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला करते समय स्पीकर को पहले यह तय करना पड़ सकता है कि विरोधी गुटों में कौन राजनीतिक दल है। वकील ने यह भी कहा कि चुनाव चिह्न उस गुट को मिलना चाहिए, जो यह साबित करे कि वही असली राजनीतिक दल है। अगर कोई भी गुट यह दावा साबित नहीं कर पाए, तो स्थिति अलग होगी। याचिकाओं में क्या चुनौती मुख्य याचिका उद्धव ठाकरे गुट के सुनील प्रभु ने दायर की है। इसमें महाराष्ट्र विधानसभा के स्पीकर के 10 जनवरी 2024 के फैसले को चुनौती दी गई है। स्पीकर ने दसवीं अनुसूची के तहत शिंदे गुट के विधायकों को अयोग्य ठहराने से इनकार किया था। उद्धव ठाकरे की ओर से दायर एक याचिका में चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें शिंदे गुट को आधिकारिक शिवसेना माना गया था। इसी फैसले के तहत शिंदे गुट को पार्टी का धनुष-बाण चुनाव चिह्न भी दिया गया था।