सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को हैदराबाद की नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च (NALSAR) यूनिवर्सिटी में छात्रों के एनरोलमेंट विवाद को लेकर काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। CJI सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि NALSAR के छात्रों और फैकल्टी के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाए। सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने BCI के सर्कुलर पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा- यह बिल्कुल बेवजह था। मैं खुद ऐसा छात्र रहा हूं जो विरोध प्रदर्शनों में सक्रिय रूप से शामिल होता था। यह छात्रों और मेरे बीच की बातचीत है, BCI कौन होता है इसमें दखल देने वाला? सूर्यकांत ने कहा कि अगर छात्र कानून के दायरे में रहकर अपनी बात रख रहे हैं, तो उन्हें अपनी आवाज उठाने की अनुमति होनी चाहिए। क्या है पूरा मामला? NALSAR के करीब 450 छात्रों ने CJI सूर्यकांत को यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि बनाए जाने का विरोध किया था। छात्रों ने यूनिवर्सिटी प्रशासन को पत्र लिखकर न्योता वापस लेने की मांग की थी। यह विरोध CJI की उन हालिया टिप्पणियों को लेकर था, जिन्हें छात्रों ने प्रदर्शनकारियों से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान किया गया बताया था। इसके बाद BCI ने 13 अगस्त को सभी स्टेट बार काउंसिलों को निर्देश दिया था कि NALSAR के 2026 बैच के लॉ ग्रेजुएट्स का वकील के तौर पर एनरोलमेंट अगले आदेश तक न किया जाए। साथ ही यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर से तीन दिन में रिपोर्ट मांगकर विरोध अभियान शुरू करने, उसे आयोजित करने या छात्रों को जुटाने वालों की जानकारी मांगी गई थी। कुछ घंटों में BCI ने फैसला बदला विरोध के बाद BCI ने उसी दिन अपना फैसला बदल दिया। परिषद ने कहा कि 2026 बैच के ज्यादातर छात्र निर्दोष हैं और उन्हें किसी दूसरे की गलती के लिए नुकसान नहीं उठाना चाहिए। अब सभी NALSAR छात्र अपनी पसंद की स्टेट बार काउंसिल में एनरोल हो सकते हैं। BCI ने हालांकि कहा कि वह यूनिवर्सिटी से मांगी गई रिपोर्ट का इंतजार करेगी और उसके आधार पर आगे की कार्रवाई पर फैसला लिया जा सकता है। बाद में BCI ने 2026 बैच के खिलाफ अपनी कार्यवाही भी बंद कर दी और कहा कि बैच के छात्रों की किसी गड़बड़ी या आंदोलन में भूमिका नहीं मिली। SCBA ने भी BCI के कदम पर सवाल उठाए थे BCI के शुरुआती आदेश पर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के अध्यक्ष और वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने भी आपत्ति जताई थी। उन्होंने इसे मनमाना, गैरकानूनी और जरूरत से ज्यादा कार्रवाई बताते हुए कहा था कि छात्रों को अपनी बात रखने के कारण वकालत में प्रवेश से वंचित करने की धमकी नहीं दी जानी चाहिए।