Japanese Encephalitis: डेंगू-मलेरिया से भी खतरनाक है यह बीमारी! मच्छर के काटते ही सूज जाता है दिमाग

Wait 5 sec.

Japanese Encephalitis Treatment And Diagnosis: मानसून आते ही मौसम सुहाना हो जाता है, लेकिन इसके साथ मच्छरों का खतरा भी तेजी से बढ़ जाता है. ज्यादातर लोग मच्छर से होने वाली  बीमारियों में डेंगू और मलेरिया के बारे में जानते हैं, लेकिन बहुत कम लोग इस बात से वाकिफ हैं कि कुछ मच्छर ऐसे वायरस भी फैलाते हैं, जो सीधे दिमाग को प्रभावित कर सकते हैं. ऐसी ही एक गंभीर बीमारी है जापानी इंसेफेलाइटिस. यह बीमारी भले ही डेंगू जितनी आम न हो, लेकिन गंभीर मामलों में जानलेवा साबित हो सकती है और मरीज को जीवनभर के लिए न्यूरोलॉजिकल समस्याएं भी दे सकती है.यह बीमारी जापानी इंसेफेलाइटिस वायरस से होती है, जो फ्लैविवायरस परिवार का सदस्य है. यही परिवार डेंगू और वेस्ट नाइल वायरस का भी है. यह वायरस इंफेक्टेड क्यूलेक्स मच्छरों के काटने से फैलता है. ये मच्छर आमतौर पर धान के खेतों, तालाबों, दलदली इलाकों और बारिश के बाद जमा पानी में पनपते हैं. डेंगू फैलाने वाले मच्छरों के विपरीत, क्यूलेक्स मच्छर शाम ढलने के बाद से लेकर सुबह तक ज्यादा सक्रिय रहते हैं.इसे भी पढ़ें: मानसून सीजन में जल्दी बीमार पड़ जाते हैं बच्चे, ऐसे रखें उनकी सेहत का ख्याल?कैसे होता है  इंसेफेलाइटिस?फोर्टिस अस्पताल मोहाली के न्यूरोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. ईशांक गोयल के अनुसार, वायरस पहले खून में प्रवेश करता है और फिर ब्लड-ब्रेन बैरियर को पार कर दिमाग तक पहुंच जाता है. इसके बाद दिमाग में सूजन आ जाती है, जिसे मेडिकल भाषा में इंसेफेलाइटिस कहा जाता हैहर साल इसके कितने मामले सामने आते हैं?वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार, हर साल दुनिया में जापानी इंसेफेलाइटिस के करीब 68 हजार मामले सामने आते हैं. दक्षिण-पूर्व एशिया और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. भारत में भी हर साल इसके मामले दर्ज किए जाते हैं और बच्चों में इसका खतरा सबसे अधिक माना जाता है. एक्सपर्ट के मुताबिक, 15 साल से कम उम्र के बच्चों, ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोगों, धान के खेतों में काम करने वाले किसानों और बिना टीकाकरण वाले यात्रियों में संक्रमण का जोखिम ज्यादा होता है.क्या होते हैं इसके शुरुआती लक्षण?इस बीमारी की शुरुआत सामान्य वायरल इंफेक्शन जैसी लग सकती है. शुरुआत में बुखार, सिरदर्द, उल्टी, थकान और कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. लेकिन अगर वायरस दिमाग तक पहुंच जाए, तो मरीज में तेज बुखार, भ्रम की स्थिति, बेहोशी, दौरे पड़ना, गर्दन में अकड़न, चलने में परेशानी और होश खोने जैसे गंभीर लक्षण विकसित हो सकते हैं. ऐसी स्थिति में तुरंत अस्पताल पहुंचना जरूरी होता है. डॉक्टरों का कहना है कि केवल सीटी स्कैन से इस बीमारी का पता हमेशा नहीं चल पाता. जरूरत पड़ने पर एमआरआई और खून या सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड की जांच के जरिए इसकी पुष्टि की जाती है.क्या इसका कोई इलाज है?जापानी इंसेफेलाइटिस का कोई विशेष इलाज उपलब्ध नहीं है. इलाज के दौरान मरीज की स्थिति को स्थिर रखने और दिक्कतों को कंट्रोल करने की कोशिश की जाती है. इसलिए बचाव सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है.इसे भी पढ़ें: Monsoon Health Care Tips: मानसून सीजन में जल्दी बीमार पड़ जाते हैं बच्चे, ऐसे रखें उनकी सेहत का ख्याल?Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.