दुनिया में कुछ मशीनें इतनी बड़ी होती हैं कि उनकी लंबाई फुटबॉल मैदान के बराबर होती है। इनका इस्तेमाल पहाड़ों में सुरंग बनाने के लिए किया जाता है। स्टील से बनी इन मशीनों के आगे बड़े-बड़े ब्लेड लगे होते हैं, जो चट्टानों को काटकर रास्ता बनाते हैं। इन्हें टनल बोरिंग मशीन (TBM) कहते हैं। दुनिया में गिनी-चुनी कंपनियां ही ये मशीनें बनाती हैं। इनमें से ज्यादातर की फैक्ट्रियां चीन में हैं। भारत भी हिमालय में सुरंग बनाने के लिए इनका इस्तेमाल करता है। इनसे सेना को चीन से लगी सीमा तक जल्दी पहुंचने में मदद मिलती है। लेकिन अब भारत के लिए ये मशीनें खरीदना मुश्किल हो सकता है। चीन तय कर सकता है कि उसकी फैक्ट्रियों में बनी मशीनें भारत को बेची जाएंगी या नहीं। दरअसल, चीन अपनी फैक्ट्रियों और प्रयोगशालाओं में तैयार होने वाली चीजों के निर्यात पर नियंत्रण बढ़ा रहा है। पिछले एक महीने में उसने ड्रोन, AI मॉडल और एजेंट, नई दवाएं बनाने की तकनीक और सोलर पैनल बनाने की कुछ प्रक्रियाओं पर निर्यात प्रतिबंध लगाए हैं या उन्हें अपने नियंत्रण में लेने के कदम उठाए हैं। इसका असर भारत के अलावा अमेरिका और दूसरे देशों पर भी पड़ सकता है। चीन के नए नियमों से सोलर उपकरण बनाने वाली फैक्ट्रियां लगाना मुश्किल हो सकता है। साथ ही, दूसरे देशों के लिए चीन के नए और ताकतवर AI मॉडल तक पहुंचना भी कठिन हो सकता है। दुनिया को चीन पर निर्भर रखना चाहते हैं जिनपिंग चीन के इन कदमों के पीछे बड़ी रणनीति है। वह चाहता है कि दूसरे देश उसकी फैक्ट्रियों और तकनीक पर निर्भर रहें। हालांकि, अमेरिका, यूरोप, जापान और भारत अब इस निर्भरता को कम करने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिका अपने यहां दुर्लभ खनिजों की खुदाई और उन्हें इस्तेमाल लायक बनाने का काम दोबारा शुरू करना चाहता है। इन खनिजों का इस्तेमाल आधुनिक तकनीकें और हथियार बनाने में होता है। यूरोप और जापान भी एंटीबायोटिक और दूसरी दवाओं के जरूरी तत्वों के लिए चीन पर निर्भरता घटाना चाहते हैं। भारत में भी सड़क परिवहन मंत्री कंपनियों से देश में ही सुरंग खोदने वाली मशीनें बनाने की अपील कर चुके हैं। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की यह रणनीति कई साल पुरानी है। कोरोना महामारी के दौरान चीन को एहसास हुआ कि वह वेंटिलेटर, मरीजों को जिंदा रखने वाली मशीनों, कच्चे माल और खास पुर्जों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर है। इसके बाद जिनपिंग ने चीन को आत्मनिर्भर बनाने की योजना शुरू की। उन्होंने हाई-स्पीड ट्रेन, रिन्यूएबल एनर्जी और टेलीकम्युनिकेशन जैसे क्षेत्रों में ऐसी तकनीक विकसित करने पर जोर दिया, जिन्हें चीन अपनी ताकत बना सके। उन्होंने इन तकनीकों को 'ट्रम्प कार्ड' यानी तुरुप का पत्ता बताया था। इसका मकसद सिर्फ चीन को आत्मनिर्भर बनाना नहीं था। जिनपिंग चाहते थे कि दूसरे देश भी जरूरी मशीनों और तकनीक के लिए चीन पर निर्भर रहें, ताकि कोई देश उससे व्यापार या तकनीक का रिश्ता तोड़े तो उसे भी नुकसान उठाना पड़े। पश्चिम से टकराव के लिए अपनी ताकत बढ़ा रहा चीन शी जिनपिंग मानते हैं कि पश्चिमी देश चीन की बढ़ती ताकत को रोकना चाहते हैं। चीन की राजनीति पर रिसर्च करने वाली कंपनी 'असडल एडवाइजरी' की संस्थापक कर्स्टन असडल के मुताबिक, जिनपिंग और उनकी पार्टी पश्चिमी देशों के साथ टकराव को तय मानते हैं। वे ऐसे मौके का इंतजार कर रहे हैं, जब उनके पास इसका सामना करने की वजह और क्षमता दोनों हों। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने औद्योगिक और तकनीकी ताकत बढ़ाने को देश के अस्तित्व की लड़ाई के तौर पर पेश किया है। इसके लिए वह अपने क्रांतिकारी इतिहास का भी सहारा ले रही है। पिछले कुछ दिनों से पार्टी बार-बार 'लॉन्ग मार्च' का जिक्र कर रही है। यह चीन की रेड आर्मी की करीब 6 हजार मील लंबी रणनीतिक वापसी की यात्रा थी। इसने माओत्से तुंग के नेतृत्व को मजबूत किया था। बाद में पार्टी ने इसे मुश्किल हालात में जीत हासिल करने की मिसाल के तौर पर पेश किया। पार्टी इस इतिहास के जरिए लोगों को भरोसा दिलाना चाहती है कि उसके नेतृत्व में चीन हर मुश्किल से निकल सकता है। देश इस समय धीमी आर्थिक विकास दर, लंबे समय से चल रहे प्रॉपर्टी संकट और दूसरे देशों की नाराजगी का सामना कर रहा है। 'लॉन्ग मार्च' की 90वीं वर्षगांठ पर सरकारी अखबार 'पीपुल्स डेली' ने संपादकीय में चीन से अहम तकनीकों पर पकड़ मजबूत करने और आत्मनिर्भर बनने की अपील की। इसमें अमेरिकी टैरिफ और व्यापार युद्ध का सामना करने का जिक्र करते हुए लोगों से आने वाले समय में एक 'बड़े संघर्ष' के लिए तैयार रहने को भी कहा गया। चीन बोला- देश की रक्षा के लिए प्रतिबंध जरूरी चीन का कहना है कि नए निर्यात प्रतिबंध कारोबार और राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा के लिए जरूरी हैं। पिछले महीने वाणिज्य मंत्रालय ने कहा था कि सुरंग खोदने वाली मशीनों का इस्तेमाल नागरिक और सैन्य, दोनों तरह के कामों में हो सकता है। इसलिए इनके निर्यात पर नियंत्रण जरूरी है। चीन ने सोलर उपकरण बनाने के क्षेत्र में दबदबा कायम करने के लिए कई दशक और अरबों डॉलर खर्च किए हैं। अब वह इस क्षेत्र की अहम मशीनों और तकनीक को दूसरे देशों में भेजने पर रोक लगाना चाहता है, ताकि दूसरे देश उसकी सप्लाई चेन की नकल करके वैसा ही उद्योग खड़ा न कर सकें। बीजिंग की शिंगहुआ यूनिवर्सिटी के अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ सुन चेंगहाओ ने कहा कि चीन अब यह तय कर रहा है कि कौन-सी तकनीक किस देश को बेची जाए और उसका इस्तेमाल किस काम में होगा। उन्होंने कहा कि AI का इस्तेमाल साइबर हमलों में हो सकता है। इसी तरह, सुरंग खोदने और समुद्र या नदी से कीचड़ निकालने वाली मशीनों का इस्तेमाल भी चीन के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में किया जा सकता है। अमेरिका से ही चीन ने सीखे आर्थिक हथियारों के इस्तेमाल के तरीके चीन के नए निर्यात प्रतिबंध अमेरिका के साथ चल रही तनातनी का जवाब भी हो सकते हैं। ट्रम्प प्रशासन ने हाल ही में चीन की बड़ी जीनोम रिसर्च कंपनी बीजीआई को व्यापार प्रतिबंधों वाली सूची में शामिल किया है। इसका मकसद चीन में जबरन मजदूरी से बने सामानों को अमेरिका में आने से रोकना है। इससे पहले अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने ऐसे नियमों का प्रस्ताव रखा था, जिनके तहत अमेरिकी कंपनियों और निवेशकों को चीन की जैव तकनीक कंपनियों में पैसा लगाने से रोका जा सकेगा। ट्रम्प और जिनपिंग के इस महीने के आखिर में चीन और अगले महीने मियामी में मिलने की उम्मीद है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि चीन ने अमेरिका के प्रतिबंधों से सीखा है कि बड़ी ताकत बनने के लिए सिर्फ विमानवाहक पोत और लंबी दूरी की मिसाइलें काफी नहीं हैं। दूसरे देशों पर आर्थिक दबाव बनाने की ताकत भी जरूरी है। अमेरिका ने पहले चीन की कंपनियों हुआवेई और जेडटीई को अमेरिकी चिप और सॉफ्टवेयर मिलने पर रोक लगाई। बाद में चीन को आधुनिक चिप के निर्यात पर भी बड़े प्रतिबंध लगाए। इनसे चीन की AI तकनीक को आगे बढ़ाने की कोशिशों को नुकसान पहुंचा है। चीन ने दुर्लभ खनिजों का निर्यात रोका था चीन ने भी ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में शुरू हुए व्यापार युद्ध के दौरान अमेरिका को दुर्लभ खनिजों का निर्यात रोक दिया था। इनका इस्तेमाल लड़ाकू विमान, कार और कई आधुनिक तकनीकें बनाने में होता है। इस कदम से अमेरिका पर दबाव बढ़ा और उसे व्यापार तनाव कम करने के लिए सहमति देनी पड़ी। हालांकि, चीन के कुछ विश्लेषकों को लगता है कि इस रणनीति का दूसरा असर भी हुआ। अमेरिका और उसके सहयोगी देश अब दुर्लभ खनिजों के लिए चीन के अलावा दूसरे स्रोत तलाश रहे हैं, ताकि उस पर उनकी निर्भरता कम हो सके। शंघाई की फुदान यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञ झाओ मिंगहाओ के मुताबिक, चीन को चिंता है कि कहीं दुर्लभ खनिजों के जरिए दबाव बनाने का उसका हथियार खत्म न हो जाए। उन्होंने कहा, "चीन के सामने सवाल है कि उसके पास और कौन-से हथियार बचे हैं? वह अमेरिकी प्रतिबंधों और टैरिफ का जवाब कैसे दे सकता है? मेरा मानना है कि बीजिंग इस समय इन सवालों को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दे रहा है।" -------------------------- यह खबर भी पढ़ें… अमेरिका ने जानकारी लीक करने वाले अफसर को हटाया: ईरान-यूक्रेन युद्ध से जुड़े गोपनीय दस्तावेज पत्रकारों को दिए; जांच के दौरान जुर्म कबूला अमेरिकी सेना के लेफ्टिनेंट जनरल ब्रेट सिल्विया को पद से हटाने की वजह सामने आई है। एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक, रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने उन्हें पत्रकारों को गोपनीय जानकारी लीक करने के आरोप में हटाया था। यह मामला रूस-यूक्रेन युद्ध और ईरान युद्ध से जुड़ा है। पूरी खबर पढ़ें…