Antibiotic Resistance: एंटीबायोटिक्स का बेअसर होना जानलेवा! ICMR रिसर्च में बड़ा खुलासा

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Carbapenem Resistant Bacterial Infections India: भारत के अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती मरीजों पर हुए एक बड़े रिसर्च में सामने आया है कि एंटीबायोटिक दवाओं का असर खत्म होने के बाद होने वाले बैक्टीरियल इंफेक्शन ज्यादा जानलेवा हो सकते हैं. ऐसे इंफेक्शनि के इलाज में मरीजों को ज्यादा समय तक इलाज की जरूरत पड़ सकती है और दवाओं पर खर्च भी बढ़ सकता है.ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया ऐसे बैक्टीरिया होते हैं, जो शरीर के कई हिस्सों में इंफेक्शन फैला सकते हैं. ये फेफड़ों, पेशाब की नली, घाव और खून में इंफेक्शन का कारण बन सकते हैं. इनमें ई. कोलाई, क्लेबसिएला न्यूमोनिया, एसिनेटोबैक्टर बाउमानी और स्यूडोमोनास एरुजिनोसा जैसे बैक्टीरिया शामिल हैं. अस्पतालों में इनसे होने वाले इंफेक्शन आम हैं. जब इन बैक्टीरिया पर एंटीबायोटिक दवाओं का असर कम या खत्म हो जाता है, तो मरीज का इलाज मुश्किल हो जाता है.गंभीर बैक्टीरियल इंफेक्शन के इलाज में कार्बापेनेम एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन जब बैक्टीरिया इन दवाओं के खिलाफ भी एंटीसेप्टिक हो जाते हैं, तो डॉक्टरों के पास मरीज के इलाज के लिए दवाओं के विकल्प कम बचते हैं. यही वजह है कि ऐसे इंफेक्शन चिंता का बड़ा कारण बन रहे हैं.20 अस्पतालों में 1.59 लाख मरीजों पर हुआ रिसर्चयह रिसर्च इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च यानी आईसीएमआर के एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस सर्विलांस नेटवर्क से जुड़े रिसर्चर ने किया है. इसमें चार प्रमुख बैक्टीरिया ई. कोलाई, क्लेबसिएला न्यूमोनिया, एसिनेटोबैक्टर बाउमानी और स्यूडोमोनास एरुजिनोसा को शामिल किया गया. रिसर्चर ने अप्रैल 2022 से अप्रैल 2025 के बीच देश के 20 बड़े अस्पतालों में भर्ती 1,59,336 मरीजों के आंकड़ों का अध्ययन किया. इनमें 26,213 मरीजों में ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया से इंफेक्शन की पुष्टि हुई. इनमें से 16,025 यानी 61.1 फीसदी मरीजों में इंफेक्शन कार्बापेनेम एंटीबायोटिक्स के खिलाफ एंटीसेप्टिक पाया गया.दवा का असर नहीं होने पर मौत का खतरा ज्यादाचारों तरह के बैक्टीरिया से संक्रमित मरीजों में दवा-एंटीसेप्टिक इंफेक्शन के मामले में मौत का आंकड़ा ज्यादा रहा. ई. कोलाई इंफेक्शन वाले मरीजों में कार्बापेनेम-रेजिस्टेंट इंफेक्शन के मामले में 24.4 फीसदी मरीजों की मौत हुई. वहीं, जिन मरीजों में इसी बैक्टीरिया पर दवा का असर हो रहा था, उनमें मृत्यु दर 17.3 फीसदी रही.क्लेबसिएला न्यूमोनिया के मामले में दवा-एंटीसेप्टिक इंफेक्शन वाले मरीजों में मृत्यु दर 31.2 फीसदी थी, जबकि दवा का असर होने वाले मरीजों में यह 23.5 फीसदी रही. एसिनेटोबैक्टर बाउमानी के मामले में यह आंकड़ा क्रमशः 37.9 फीसदी और 32.8 फीसदी रहा. वहीं, स्यूडोमोनास एरुजिनोसा इंफेक्शन में दवा-एंटीसेप्टिक समूह में मृत्यु दर 28.9 फीसदी और दूसरे समूह में 20.2 फीसदी रही.आंकड़ों के मुताबिक, कार्बापेनेम-रेजिस्टेंट ई. कोलाई इंफेक्शन वाले मरीजों में मौत का खतरा दवा के असर वाले मरीजों की तुलना में 41 फीसदी ज्यादा था. क्लेबसिएला न्यूमोनिया में यह खतरा 33 फीसदी, एसिनेटोबैक्टर बाउमानी में 16 फीसदी और स्यूडोमोनास एरुजिनोसा में 43 फीसदी ज्यादा पाया गया. हालांकि, रिसर्चर ने साफ किया है कि इन आंकड़ों का यह मतलब नहीं है कि एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस खत्म करने से इतनी ही मौतों को रोका जा सकता है. मरीज की हालत कितनी गंभीर थी, सही दवा कितनी जल्दी शुरू हुई और दूसरे स्वास्थ्य संबंधी कारणों का भी इलाज के नतीजे पर असर पड़ सकता है.खून में इंफेक्श पहुंचने पर खतरा और बढ़ाअगर बैक्टीरिया का इंफेक्शन खून तक पहुंच जाए, तो मरीज के लिए खतरा और बढ़ जाता है. ऐसे मामलों में कार्बापेनेम-रेजिस्टेंट इंफेक्शन वाले मरीजों में मृत्यु दर ई. कोलाई के लिए 39.3 फीसदी से लेकर एसिनेटोबैक्टर बाउमानी के लिए 50.8 फीसदी तक रही. क्लेबसिएला न्यूमोनिया में यह 44.8 फीसदी और स्यूडोमोनास एरुजिनोसा में 46.4 फीसदी थी. इसके मुकाबले जिन मरीजों में बैक्टीरिया पर एंटीबायोटिक का असर हो रहा था, उनमें खून के इंफेक्शन से मृत्यु दर ई. कोलाई के लिए 23.8 फीसदी, क्लेबसिएला न्यूमोनिया के लिए 36 फीसदी, एसिनेटोबैक्टर बाउमानी के लिए 42.6 फीसदी और स्यूडोमोनास एरुजिनोसा के लिए 32.8 फीसदी रही.इन चारों बैक्टीरिया से होने वाले खून के इंफेक्शनों में 85 फीसदी से ज्यादा मामले अस्पताल से जुड़े इंफेक्शन पाए गए. इससे साफ होता है कि अस्पतालों में इंफेक्शन रोकने के लिए साफ-सफाई और जरूरी सावधानियों पर ज्यादा ध्यान देना कितना जरूरी है. इलाज भी महंगाशोध में यह भी सामने आया कि कार्बापेनेम-रेजिस्टेंट इंफेक्शन के इलाज में एंटीबायोटिक दवाओं पर ज्यादा खर्च हुआ. ई. कोलाई के दवा-एंटीसेप्टिक इंफेक्शन में एक मरीज पर औसतन करीब 39,846 रुपये खर्च हुए, जबकि दवा के असर वाले इंफेक्शन में यह खर्च करीब 20,034 रुपये था. क्लेबसिएला न्यूमोनिया के लिए यह खर्च क्रमशः 55,688 रुपये और 47,918 रुपये रहा. एसिनेटोबैक्टर बाउमानी के इलाज में दवा-एंटीसेप्टिक इंफेक्शन के लिए करीब 62,150 रुपये और संवेदनशील इंफेक्शन के लिए 41,372 रुपये खर्च हुए. वहीं, स्यूडोमोनास एरुजिनोसा के इलाज में यह खर्च करीब 66,599 रुपये और 48,392 रुपये रहा.कुल मिलाकर, दवा-एंटीसेप्टिक इंफेक्शन में एंटीबायोटिक का खर्च सामान्य इंफेक्शन की तुलना में करीब 1.1 से दो गुना तक ज्यादा पाया गया. हालांकि, इसमें अस्पताल के कमरे, जांच, डॉक्टर की फीस और मरीज की दूसरी देखभाल का खर्च शामिल नहीं था. खर्च की गणना जनऔषधि योजना के तहत मिलने वाली एंटीबायोटिक दवाओं की दरों के आधार पर की गई थी, जो आम बाजार कीमतों से कम होती हैं. इसलिए मरीज पर पड़ने वाला असली खर्च इससे ज्यादा हो सकता है.इसे भी पढ़ें: स्क्रीनशॉट लेने की आदत से घट रही है आपकी याददाश्त, नई रिसर्च में खुलासाइसको रोकना क्यों जरूरी?रिसर्च में सामने आया कि इन चारों बैक्टीरिया से होने वाले ज्यादातर इंफेक्सन अस्पतालों से जुड़े थे. ई. कोलाई के 85 फीसदी, क्लेबसिएला न्यूमोनिया के 91.6 फीसदी, एसिनेटोबैक्टर बाउमानी के 95.1 फीसदी और स्यूडोमोनास एरुजिनोसा के 91.9 फीसदी इंफेक्शन अस्पताल से जुड़े पाए गए. शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि शरीर में लगे कुछ मेडिकल उपकरणों और हाल में हुई सर्जरी जैसे कारण दवा-एंटीसेप्टिक इंफेक्शन वाले मरीजों में ज्यादा आम थे. इसलिए अस्पतालों में इंफेक्शन रोकने के लिए बेहतर व्यवस्था, समय पर जांच और सही एंटीबायोटिक का जल्द इस्तेमाल जरूरी है.इसे भी पढ़ें: 3 गुनी ज्यादा शुगर वाली फेंटा कितनी खतरनाक, जानें हेल्थ को कितने गुना नुकसान?Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.