गठबंधन नहीं, विलय: क्या सपा और कांग्रेस का मिलन बदल सकता है भारत की राजनीति? - The HinduUpdated - August 12, 2026 10:29 am ISTकांग्रेस नेता राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव | | Photo Credit: ANIराहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस शायद अपना सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक और सामाजिक पुनर्गठन करने का प्रयास कर रही है। वह खुद को ‘बहुजनों‘—यानी अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), उच्च जातियों के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों और अल्पसंख्यकों के व्यापक सामाजिक गठबंधन—के मुख्य राजनीतिक वाहन के रूप में फिर से ढालने की कोशिश कर रही है।ऐसा करके, कांग्रेस अपनी उस पुरानी छवि से सचेत रूप से बाहर निकलने का प्रयास कर रही है, जहाँ उसका नेतृत्व और संस्थागत संस्कृति सवर्णों के वर्चस्व वाली मानी जाती थी; भले ही उसे बाकी वर्गों से भी भारी समर्थन मिलता रहा हो। देशव्यापी जाति जनगणना पर राहुल गांधी का बार-बार जोर देना, उनका नारा “जितनी आबादी, उतना हक“, और राज्य की संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व की उनकी लगातार वकालत, एक बड़े राजनीतिक प्रोजेक्ट को दर्शाती है: कांग्रेस को सामाजिक न्याय और समान प्रतिनिधित्व का स्वाभाविक स्थान बनाना।समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी अपनी पार्टी के लिए इतने ही महत्वाकांक्षी प्रयोग में लगे हुए हैं। सपा पर लंबे समय से मुख्य रूप से ‘यादव-मुस्लिम‘ समीकरण वाली पार्टी होने का ठप्पा लगा रहा है—एक ऐसा समीकरण जिसने चुनावी सफलता तो दी, लेकिन साथ ही स्पष्ट राजनीतिक सीमाएं भी निर्धारित कर दीं। अखिलेश यादव अब उस सामाजिक आधार को विस्तार देना चाहते हैं। उनका PDA यानी ‘पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक‘ का फार्मूला सपा को एक जाति-केंद्रित क्षेत्रीय दल से बढ़ाकर जाति और धर्म की सीमाओं से परे एक व्यापक गठबंधन में बदलने के प्रयास का संकेत है। अब तो उन्होंने यह भी कहना शुरू कर दिया है कि ‘P’ का मतलब ‘पंडित‘ यानी ब्राह्मण भी है।दरअसल, राहुल गांधी और अखिलेश यादव की राजनीति अब लगभग एक ही दिशा में आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। दोनों सामाजिक न्याय, बराबरी का प्रतिनिधित्व और समावेशी लोकतंत्र की बात कर रहे हैं। दोनों की नजर लगभग एक ही सामाजिक समूह पर है।अगर दोनों दल एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं, तो जिस सामाजिक आधार को वे मजबूत करना चाहते हैं, वही बंट सकता है। लेकिन अगर वे एक साथ आ जाते हैं, तो एक-दूसरे की ताकत बढ़ा सकते हैं।फिलहाल दोनों उत्तर प्रदेश में चुनावी गठबंधन की तैयारी कर रहे हैं। हमेशा की तरह सीटों के बंटवारे को लेकर लंबी और कठिन बातचीत होगी और संभव है कि गठबंधन बन भी जाए। लेकिन सवाल यह है कि क्या मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में केवल गठबंधन से बीजेपी के ताकत का मुकाबला किया जा सकता है?पिछले एक दशक में भाजपा की राजनीति का एक बड़ा आधार विपक्षी दलों में बिखराव रहा है। विपक्षी गठबंधनों को कमजोर किया गया, कई दलों में टूट हुई और क्षेत्रीय पार्टियों को एक-दूसरे से मुकाबला करने के लिए प्रेरित किया गया, ताकि वे साझा मंच पर एक साथ न आ सकें।ऐसी स्थिति में सवाल यह है कि क्या इसका जवाब सिर्फ एक और गठबंधन हो सकता है, या उससे बड़ा कदम उठाने की जरूरत है? अगर उत्तर प्रदेश में भाजपा के दो सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी—कांग्रेस और समाजवादी पार्टी—गठबंधन करने के बजाय एक ही पार्टी बन जाएँ, तो क्या भारतीय राजनीति की तस्वीर बदल सकती है?अगर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का विलय होता है, तो दोनों दलों को राजनीतिक, संगठनात्मक और चुनावी स्तर पर बड़ा फायदा मिल सकता है। इतना ही नहीं, इससे देश की राजनीति में भी नए सिरे से बदलाव की शुरुआत हो सकती है।दोनों पार्टियां अपनी-अपनी पुरानी छवियों से बाहर निकल सकती हैं। कांग्रेस पर लंबे समय से यह आरोप लगता रहा है कि वह सवर्णों और मुसलमानों की पार्टी है, जबकि समाजवादी पार्टी को अब भी मुख्यतः यादवों की पार्टी माना जाता है। दोनों के एक होने से इन सीमित पहचानों को पीछे धकेलकर एक ऐसी नई कांग्रेस सामने आ सकती है, जो हर जाति और हर समुदाय के लोगों के अधिकार और प्रगति का मंच बने।ऐसी स्थिति में समाजवादी पार्टी को अपनी अलग संगठनात्मक पहचान छोड़नी पड़ सकती है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं होगा कि समाजवादी विचारधारा खत्म हो जाएगी। उलटे, वह अपने मूल स्वरूप में लौट सकती है। आज़ादी की लड़ाई के दौरान समाजवादी धारा कांग्रेस के भीतर ही सक्रिय थी। बाद में वैचारिक और राजनीतिक मतभेदों के कारण समाजवादी नेताओं ने कांग्रेस से अलग रास्ता चुन लिया था।आज राहुल गांधी उसी कांग्रेस की राजनीति को बदलने की कोशिश कर रहे हैं। वे सामाजिक न्याय और जातिगत बराबरी को पार्टी की राजनीति के केंद्र में लाना चाहते हैं। एक तरह से वे कांग्रेस की पुरानी राजनीतिक विरासत में बदलाव कर रहे हैं।अखिलेश यादव के सामने भी ऐसा ही अवसर है। वे चाहें तो समाजवादी पार्टी को अलग क्षेत्रीय दल बनाए रखने के बजाय समाजवादी विचारधारा को एक बदली हुई कांग्रेस के भीतर नई ताकत के रूप में स्थापित कर सकते हैं। इस बार समाजवादी धारा कांग्रेस के हाशिए पर नहीं, बल्कि उसकी सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक ताकतों में से एक हो सकती है।अगर ऐसा होता है, तो भारतीय राजनीति में एक बिल्कुल नई संगठनात्मक व्यवस्था सामने आएगी। व्यावहारिक रूप से इसका मतलब होगा कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का नेतृत्व प्रभावी तौर पर अखिलेश यादव के हाथों में होगा।भारतीय राजनीति में अब तक कई बड़े क्षेत्रीय नेता कांग्रेस छोड़कर अपनी अलग पार्टी बना चुके हैं। शरद पवार और ममता बनर्जी इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। लेकिन अगर पहली बार कोई मजबूत क्षेत्रीय नेता अपनी अलग पार्टी को कांग्रेस में मिलाकर राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा बनने का फैसला करे, तो यह भारतीय राजनीति में बिल्कुल नया प्रयोग होगा।चुनावी दृष्टि से भी इसके बड़े नतीजे हो सकते हैं। बहुजन समाज पार्टी के कमजोर पड़ने और उसके समर्थकों में बढ़ती निराशा के कारण बड़ी संख्या में दलित मतदाता नए राजनीतिक विकल्प की तलाश में हैं। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का संयुक्त मंच उनके लिए एक मजबूत विकल्प बन सकता है। यह नहीं कहा जा सकता कि बसपा के सभी वोट अपने-आप इस नए दल को मिल जाएंगे, लेकिन दोनों पार्टियों के अलग-अलग लड़ने की तुलना में एकीकृत पार्टी के लिए उन मतदाताओं का भरोसा जीतना ज्यादा आसान होगा।एक और महत्वपूर्ण पहलू भी है। आज की राजनीति पहले की तुलना में कहीं अधिक राष्ट्रीय और वैश्विक होती जा रही है। ऐसे दौर में केवल क्षेत्रीय और जाति-आधारित दलों के लिए लंबे समय तक अपनी राजनीतिक ताकत बनाए रखना मुश्किल हो सकता है।समाजवादी पार्टी भी भविष्य में उन्हीं चुनौतियों का सामना कर सकती है, जिनसे बिहार में राष्ट्रीय जनता दल या तमिलनाडु में द्रविड़ पार्टियां जूझ रही हैं। इसलिए अखिलेश यादव के लिए कांग्रेस में विलय केवल अगले चुनाव की रणनीति नहीं होगा, बल्कि भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखकर लिया गया एक दूरदर्शी फैसला भी हो सकता है। इससे उनकी राजनीतिक भूमिका भी बदल सकती है। वे एक क्षेत्र की सीमा से उपर उठकर राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय सीमाओं से परे जाकर, देश की उभरती राजनीति को नई दिशा देने वाले मुख्य चेहरा बन सकते हैं।चाहे गठबंधन हो या दोनों दलों का विलय, यह महज वोटों का जोड़-घटाव नहीं होता। 2019 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन इसका सबसे उपयुक्त उदाहरण है। 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को 22.18 फीसदी और बहुजन समाज पार्टी को 19.62 फीसदी वोट मिले थे। यानी दोनों मिलाकर 41.8 फीसदी वोट था। लेकिन जब दोनों 2019 में राष्ट्रीय लोकदल के साथ मिलकर चुनाव लड़े, तब गठबंधन का वोट शेयर घटकर 39.23 फीसदी रह गया और उसे केवल 15 सीटें ही मिल सकीं।इससे साफ है कि चुनावी राजनीति केवल गणित का खेल नहीं है। वोटों का सीधा जोड़ हमेशा चुनावी सफलता में नहीं बदलता। राजनीतिक समीकरण और मतदाताओं का व्यवहार कहीं अधिक जटिल होता है।इसी तरह, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का विलय भी अपने-आप उन चुनौतियों को खत्म नहीं कर देगा, जिनका सामना दोनों दल आज कर रहे हैं। दोनों पर वंशवादी राजनीति करने और पुराने ढर्रे से बाहर न निकल पाने के आरोप लगते रहे हैं।अगर कांग्रेस को सचमुच नई शुरुआत करनी है, तो उसे पी. वी. नरसिंह राव और सीताराम केसरी के दौर से सीख लेते हुए मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व को और मजबूत करना होगा। नेहरू–गांधी परिवार पार्टी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहे, लेकिन हर समय वही सबसे आगे दिखाई दे, यह ज़रूरी नहीं है। ये सोचना चाहिए कि क्या कारण है कि शरद पवार, ममता बनर्जी और वाई. एस. जगन मोहन रेड्डी जैसे नेता कांग्रेस से अगल हुए?अखिलेश यादव के सामने भी ऐसी ही चुनौती है। उन्हें भी अपनी पार्टी और नेतृत्व को अधिक उदार बनाना होगा, ताकि अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि से आने वाले प्रतिभाशाली लोगों को आगे बढ़ने का मौका मिले। इन जोखिमों के बावजूद राहुल गांधी और अखिलेश यादव का रिश्ता केवल चुनावी मजबूरी या अवसरवादी समझौता नहीं है। दोनों के बीच वैचारिक समानता भी है। अगर वे अलग-अलग रहते हैं तो एक ही सामाजिक आधार के लिए प्रतिस्पर्धा करते रह सकते हैं। दोनों अपनी-अपनी पार्टियों को लगभग एक जैसी सामाजिक सोच के आधार पर नए सिरे से गढ़ना चाहते हैं। दोनों का लक्ष्य ऐसी राजनीतिक ताकत तैयार करना है, जिसमें अलग-अलग धर्मों और जातियों के लोग सामाजिक न्याय के साझा एजेंडे पर एकजुट हों।Published - August 12, 2026 10:24 am ISTSign in to unlock member-only benefits!Access 10 free stories every monthSave stories to read laterAccess to comment on every storySign-up/manage your newsletter subscriptions with a single clickGet notified by email for early access to discounts & offers on our products${ ind + 1 } ${ device }Last active - ${ la }