विश्व आदिवासी दिवस विशेष: बैगा हैं वनस्पतियों की चलती-फिरती किताब, धरोहर नहीं संजोई तो मिट सकता है सदियों का ज्ञान

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कवर्धा और पंडरिया के वनांचल में बैगा समाज के बुजुर्ग वैद्य बिना किसी लिखित किताब के केवल अनुभव, गंध और छाल के आधार पर अमूल्य वनौषधियों की पहचान करते हैं। हालांकि, आधुनिकता और बदलती जीवनशैली के कारण पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से आगे बढ़ने वाले इस प्राचीन वनौषधि ज्ञान के विलुप्त होने का गंभीर खतरा मंडरा रहा है।