सतपुड़ा और विंध्य के मिलन बिंदु पर स्थित यह दुर्ग सिर्फ पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि पौराणिक आस्था, अभेद्य सैन्य कला और शासकों के उत्थान-पतन की एक जीती-जागती महाकाव्यात्मक दास्तान है।