भारतीय फिल्म संगीत की दुनिया में कुछ आवाजें समय के साथ पुरानी नहीं पड़तीं, बल्कि और गहरी होती चली जाती हैं. ऐसी ही दिल को छू लेने वाली आवाज थी तलत महमूद की. उनकी गायकी में दर्द भी था, मिठास भी थी, और शायरी की खूबसूरती भी, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि जिस आवाज ने लाखों लोगों के दिल जीते, कभी उसी आवाज को अपने पहले गाने के लिए सिर्फ छह रुपए मिले थे. बचपन से ही गाने का शौक रखने वाले तलत महमूदतलत महमूद का जन्म 24 फरवरी 1924 को लखनऊ में एक रूढ़िवादी मुस्लिम परिवार में हुआ था. उनके परिवार में संगीत को अच्छा पेशा नहीं माना जाता था, लेकिन बचपन से ही तलत को गाने का शौक था. वे रात-रात भर चलने वाले संगीत कार्यक्रमों में बैठते और बड़े गायकों को ध्यान से सुनते थे. कम उम्र में ही उनकी आवाज में एक अलग तरह की मिठास थी. यही मिठास आगे चलकर उनकी पहचान बनी.सिर्फ 16 साल की उम्र में उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो, लखनऊ से गाना शुरू कर दिया. वे मीर और दाग जैसे शायरों की गजलें गाते थे. साल 1941 में उनका पहला गाना रिकॉर्ड हुआ. यह गाना ग्रामोफोन कंपनी एचएफवी के लिए था और इसके बदले उन्हें महज 6 रुपए मेहनताना मिला था. आज के समय में यह रकम बहुत छोटी लगती है, लेकिन उसी छोटे से भुगतान ने एक बड़े सफर की शुरुआत की. उनकी आवाज इतनी पसंद की गई कि लोग उनसे और गानों की मांग करने लगे.16 साल की उम्र में शुरू हुआ था संगीत सफर1944 में उनका गाना 'तस्वीर तेरी दिल मेरा बहला न सकेगी' काफी लोकप्रिय हुआ. इसके बाद वे कलकत्ता चले गए, जहां उन्होंने कुछ फिल्मों में अभिनय भी किया और गाने भी गाए. उस दौर में वे 'तपन कुमार' नाम से भी गाते थे. 1949 में वे मुंबई आ गए और यहीं से उनका असली सुनहरा दौर शुरू हुआ. 1950 और 1960 के दशक में वे हिंदी फिल्मों के सबसे पसंदीदा गायकों में गिने जाने लगे. उनके गाने 'इतना न मुझसे तू प्यार बढ़ा', 'फिर वही शाम, वही गम', 'ये हवा ये रात', 'मिलते ही आंखें दिल हुआ दिवाना' और 'तस्वीर बनाता हूं' जैसे गाने लोगों के दिलों में उतर गए.उनकी आवाज अभिनेता दिलीप कुमार पर खास तौर पर जंचती थी. उन्होंने दिलीप कुमार के लिए कई गानों में आवाज दी, जिनमें 'हमसे आया न गया', 'ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल', 'हम दर्द के मारों का', 'कोई नहीं मेरा इस दुनिया में', और'सीने में सुलगते हैं अरमां' जैसे गाने शामिल हैं. चार दशकों तक गाया और सैकड़ों गीतों में दी अपनी आवाज़तलत महमूद की खास बात यह थी कि वे गानों के बोल को बहुत ध्यान से पढ़ते थे. अगर उन्हें शब्द अच्छे नहीं लगते तो वे गाना गाने से मना कर देते थे. हालांकि, समय के साथ संगीत का रुख बदला और तेज, ऊंची आवाज वाले गीत ज्यादा पसंद किए जाने लगे. इससे उनका करियर थोड़ा धीमा पड़ गया, लेकिन उनकी पहचान कभी कम नहीं हुई.रेडियो और टीवी पर अब भी गूंजती है तलत महमूद की संगीत धुनउन्हें 1992 में भारत सरकार ने पद्म भूषण से सम्मानित किया. यह सम्मान उनके लंबे और शानदार योगदान की पहचान था. उन्होंने लगभग चार दशकों तक गाया और सैकड़ों गीतों को अपनी आवाज दी.9 मई 1998 को 74 साल की उम्र में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी आवाज आज भी रेडियो, टीवी और संगीत प्रेमियों के दिलों में जिंदा है.