“बस एक और… आखिरी एपिसोड” यह सोचकर टीवी पर लोग बिंज वॉचिंग करते हैं। दिनभर की थकान के बावजूद कब एक एपिसोड कई घंटों में बदल जाता है, पता ही नहीं चलता। इसका नतीजा ये होता है कि नींद पूरी नहीं हो पाती और अगले दिन सुस्ती बनी रहती है। अगर यह रूटीन लंबे समय तक जारी रहे तो शरीर और ब्रेन दोनों को प्रभावित कर सकता है। ‘यूरोपियन साइकिएट्री जर्नल’ में पब्लिश एक स्टडी के मुताबिक, अगर रोजाना टीवी देखने का समय कम किया जाए तो डिप्रेशन का रिस्क काफी हद तक कम हो सकता है। इसलिए आज ‘जरूरत की खबर’ में जानेंगे कि- एक्सपर्ट: डॉ. जया सुकुल, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, नोएडा डॉ. रोहित शर्मा, कंसल्टेंट, इंटरनल मेडिसिन, अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल, जयपुर सवाल- क्या टीवी देखने से तनाव बढ़ता है? जवाब- हां, लंबे समय तक नेगेटिव, हिंसक या हाई-ड्रामा कंटेंट देखने से ब्रेन लगातार अलर्ट मोड में रहता है। इससे स्ट्रेस हॉर्मोन रिलीज होता है, नींद खराब होती है और धीरे-धीरे चिड़चिड़ापन व मानसिक थकान बढ़ने लगती है। सवाल- क्या ज्यादा टीवी देखना डिप्रेशन का कारण बन सकता है? जवाब- नहीं, ज्यादा टीवी देखने से सीधे डिप्रेशन नहीं होता, लेकिन इसके कारण रिस्क जरूर बढ़ सकता है। ये तीनों चीजें डिप्रेशन के जोखिम से जुड़ी हैं। सवाल- हाल ही में हुई स्टडी टीवी देखने की आदत और डिप्रेशन के बारे में क्या कहती है? जवाब- यूनिवर्सिटी ऑफ ग्रोनिंगन के रिसर्चर्स ने एक स्टडी की। इसके मुताबिक, टीवी देखने का समय कम करने से डिप्रेशन का खतरा घटता है। 65 हजार से ज्यादा लोगों पर 4 साल तक हुई रिसर्च में पाया गया कि रोज 1 घंटा टीवी कम देखने से डिप्रेशन का जोखिम करीब 11% कम हो सकता है। 1.5 घंटा कम करने पर यह कमी करीब 26% और 2 घंटे कम करने पर डिप्रेशन का रिस्क लगभग 40% तक घट सकता है। इसका सबसे ज्यादा असर 40 से 65 साल के लोगों में देखा गया। यह स्टडी यूरोपिन साइकाइट्री जर्नल में पब्लिश हुई है। सवाल- क्या ज्यादा टीवी देखने से नींद पर बुरा प्रभाव पड़ता है? अगर हां, तो क्यों? जवाब- हां, टीवी और मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली तेज नीली रोशनी ब्रेन को यह सिग्नल देती है कि अभी दिन है। इससे स्लीप हॉर्मोन मेलाटोनिन कम बनता है। इसके कारण नींद देर से आती है या नहीं आती है। इससे बॉडी क्लॉक (सोने-जागने की टाइमिंग) बिगड़ सकती है। इससे होने वाले सभी हेल्थ रिस्क ग्राफिक में देखिए- सवाल- अधिक टीवी देखने का फिजिकल हेल्थ पर क्या प्रभाव पड़ता है? जवाब- इससे फिजिकल हेल्थ पर गंभीर प्रभाव पड़ते हैं। पॉइंटर्स से समझते हैं- यह आदत धीरे-धीरे कई गंभीर बीमारियों का जोखिम बढ़ा सकती है। ग्राफिक में देखिए- सवाल- ज्यादा टीवी देखने का मेंटल हेल्थ पर क्या असर पड़ता है? जवाब- इसे पॉइंटर्स से समझते हैं- सवाल- क्या टीवी देखते हुए मंचिंग करना भी डिप्रेशन के जोखिम को बढ़ा सकता है? जवाब- मचिंग यानी टीवी या स्क्रीन देखते हुए कुछ खाते रहना। इस दौरान ज्यादातर लोग जंकफूड खाते हैं। सवाल- क्या टेलीविजन की लत एक रियल मेंटल हेल्थ कंसर्न है? जवाब- हां, बहुत ज्यादा और कंट्रोल से बाहर टीवी देखना एक गंभीर मेंटल हेल्थ कंसर्न हो सकता है। सवाल- रोज मैक्सिमम कितने घंटे टीवी देखना सेफ है? जवाब- सामान्य तौर पर वयस्कों के लिए रोज 1-2 घंटे मनोरंजन के लिए स्क्रीन टाइम को संतुलित माना जाता है, बशर्ते यह नींद, एक्सरसाइज और कामकाज को प्रभावित न करे। सवाल- क्या फिजिकल एक्टिविटी डिप्रेशन के जोखिम को कम करती है? जवाब- हां, जब वॉक, रनिंग, योग या किसी भी तरह की फिजिकल एक्टिविटी करते हैं, तो शरीर में एंडॉर्फिन और ‘फील-गुड’ केमिकल्स (जैसे सेरोटोनिन, डोपामिन) बढ़ते हैं। ये मूड बेहतर करते हैं। इससे स्ट्रेस हॉर्मोन (कोर्टिसोल) कंट्रोल में रहता है और नींद की क्वालिटी भी सुधारती है। ये दोनों ही डिप्रेशन से जुड़े अहम फैक्टर्स हैं। सवाल- टीवी देखने के नेगेटिव इफेक्ट को कैसे कम किया जा सकता है? जवाब- इसके लिए सबसे पहले स्क्रीन टाइम सीमित करना जरूरी है। सभी जरूरी सावधानियां ग्राफिक में देखिए- सवाल- टीवी टाइम कम करने से मूड, फोकस और मेंटल एनर्जी में क्या बदलाव आते हैं? जवाब- पॉइंटर्स से समझते हैं- सवाल- अगर ज्यादा टीवी देखने की आदत है तो इसे कम कैसे करें? जवाब- अगर टीवी देखने की आदत कंट्रोल से बाहर लगने लगे, तो उसे अचानक छोड़ने की बजाय प्लान के साथ कम करना बेहतर तरीका है। छोटे-छोटे लेकिन सख्त कदम इस आदत को धीरे-धीरे कमजोर करते हैं। पॉइंटर्स से समझते हैं- …………………………….. ये खबर भी पढ़ें… जरूरत की खबर- बच्चों में एकेडमिक स्ट्रेस:इससे बढ़ती जवानी में डिप्रेशन और बीमारियों का रिस्क, डॉक्टर से जानें कैसे करें बचाव बोर्ड एग्जाम्स शुरू हो गए हैं। ये सीजन आते ही लाखों घरों में सिलेबस, टेस्ट सीरीज, रिवीजन प्लान और रिजल्ट की चिंता का माहौल बन जाता है। पढ़ाई में हल्का-फुल्का तनाव होना सामान्य है, लेकिन जब इसका प्रेशर दिमाग और शरीर, दोनों पर लगातार असर डालने लगे, तो ये गंभीर समस्या बन सकती है। पूरी खबर पढ़ें…