सन् 1756 में साधुओं की जमात द्वारा स्थापित यह मंदिर न केवल वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है, बल्कि संतों की साधना और वैष्णव परंपरा का जीवंत प्रतीक भी है।