सवाल- मेरी उम्र 32 साल है। मेरी प्रॉब्लम है इमोशनल डिपेंडेंसी। मैं बिल्कुल अकेला नहीं रह सकता। मेरी खुशी हमेशा किसी बाहरी चीज पर डिपेंड करती है। मुझे या तो दोस्त चाहिए या फैमिली। अगर कभी ऐसा हो जाए कि मैं घर पर अकेला रह जाऊं और आसपास कोई न हो तो मुझे अजीब सी घबराहट होने लगती है। मैं रात में 12 बजे नोएडा से 40 किलोमीटर ड्राइव करके गुड़गांव जा सकता हूं, लेकिन मैं अकेले नहीं रह सकता। अकेले होते ही मन में अजीब-अजीब से ख्याल आने लगते हैं। एंग्जाइटी होने लगती है। मैं जानता हूं कि ये नॉर्मल नहीं है। मैं इस डिपेंडेंसी से कैसे बाहर निकलूं? एक्सपर्ट- डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर। जवाब- सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। आप जो बता रहे हैं, वह कोई 'कमजोरी' नहीं है। यह एंग्जाइटी, इमोशनल डिपेंडेंसी और सेफ्टी सीकिंग बिहेवियर का एक चक्र है। यह एक पैटर्न है, जो समय के साथ बना है और इसे बदला भी जा सकता है। आपकी बातों से तीन चीजें साफ दिखती हैं- अब इसे थोड़ा व्यवस्थित तरीके से समझते हैं और फिर उससे बाहर निकलने का रास्ता बनाते हैं। आपकी समस्या की गहरी समझ मनोविज्ञान में इसे अक्सर इमोशनल डिपेंडेंसी या एंक्शस अटैचमेंट पैटर्न के रूप में समझा जाता है। जॉन बॉल्बी की अटैचमेंट थ्योरी के मुताबिक, बचपन या पिछले रिश्तों के अनुभव हमारे 'जुड़ाव के तरीके' को तय करते हैं। इस केस में आपके दिमाग ने एक यकीन बना लिया है: इसी वजह से जब भी आप अकेले होते हैं, तो आपका दिमाग खतरे का अलार्म बजा देता है। अच्छी बात यह है कि यह सीखा हुआ पैटर्न है और इसे बदला भी जा सकता है। इमोशनल डिपेंडेंसी क्यों होती है? आइए, इमोशनल डिपेंडेंसी के मनोवैज्ञानिक कारणों को समझने की कोशिश करते हैं। 1. आत्मसम्मान की भूमिका इमोशनल डिपेंडेंसी की जड़ में अक्सर कुछ गहरे विश्वास होते हैं: मनोविज्ञान में इसे ‘लो सेल्फ एफिकेसी’ कहते हैं यानी खुद की क्षमता पर भरोसे की कमी। जैसेकि ये गहरा विश्वास– रिसर्च बताती है कि जिन लोगों का आत्मसम्मान कम होता है, वे तनाव की स्थिति में खुद पर भरोसा करने की बजाय दूसरों पर ज्यादा निर्भर हो जाते हैं। इसका नतीजा ये होता है कि जो अकेलापन बहुत सामान्य हो सकती था, वह एक खतरे की तरह महसूस होने लगता है। 2. अटैचमेंट स्टाइल मनोविज्ञान की अटैचमेंट थ्योरी के मुताबिक बचपन में बने रिश्तों का असर हमारे वयस्क जीवन पर पड़ता है। जैसेकि अगर आपके बचपन में– माता-पिता अनिश्चित स्थिति में रहते थे। कभी बहुत ज्यादा ध्यान देते, कभी उपेक्षा करते तो ऐसे में बच्चे के भीतर एंक्शस अटैचमेंट स्टाइल विकसित हो सकता है। इस अटैचमेंट स्टाइल के सारे संकेत नीचे ग्राफिक में देखें– एंक्शस अटैचमेंट स्टाइल का मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि व्यक्ति ‘बीमार’ है। इसका मतलब ये है कि उसका ब्रेन सुरक्षा को दूसरों से जोड़कर देखना सीख गया है। 3. बाहरी नियंत्रण की सोच जब किसी को ये लगता है कि उसका मूड दूसरों पर निर्भर है, उसकी शांति इस बात पर निर्भर करती है कि उसके साथ कौन है तो मनोविज्ञान की भाषा में इसे एक्सटर्नल लोकस ऑफ कंट्रोल (external locus of control) कहते हैं। इसके विपरीत, जिन लोगों में इंटर्नल लोकस ऑफ कंट्रोल (internal locus of control) होता है, वे मानते हैं कि “मैं अपनी भावनाओं को खुद संभाल सकता हूं।” इमोशनल डिपेंडेंसी होने पर कंट्रोल का यह संतुलन बिगड़ जाता है। 4. दिमाग का ‘फॉल्स अलार्म सिस्टम’ न्यूरोसाइंस के अनुसार, जब हम खतरा महसूस करते हैं तो हमारे मस्तिष्क का एक हिस्सा सक्रिय हो जाता है। उस हिस्से का नाम है– एमिग्डला। लेकिन इमोशनल डिपेंडेंसी की स्थिति में: कोई असली खतरा नहीं होता। 5. इमोशनल डिपेंडेंसी का चक्र आप समझिए कि इमोशनल डिपेंडेंसी का ये साइकल कैसे काम करता है– क्या आप इमोशनली डिपेंडेंट हैं? करें सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। नीचे ग्राफिक्स में कुल 12 सवाल हैं। आपको इन सवालों को 0 से 4 के स्केल पर रेट करना है। जैसेकि पहले सवाल के लिए अगर आपका जवाब 'बिल्कुल नहीं' है तो 0 नंबर दें और अगर आपका जवाब 'बहुत ज्यादा' है तो 3 नंबर दें। अंत में अपने टोटल स्कोर की एनालिसिस करें। आप अकेले होने पर क्या सोचते हैं? सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट 2 यह टेस्ट इस बात से संंबंधित है कि जब आप अकेले होते हैं तो आपके मन में किस तरह के विचार आते हैं। नीचे दिए गए सवालों को ध्यान से पढ़ें और इस स्कोर चार्ट के मुताबिक उसे रेट करें– 4 सप्ताह का CBT आधारित सेल्फ हेल्प प्लान सप्ताह 1 अवेयरनेस क्या और कैसे करें? पहले हफ्ते में आपका फोकस सिर्फ खुद को समझने पर होना चाहिए। कुछ बदलने की जल्दी नहीं, बस अपने अनुभव को साफ-साफ पकड़ना है। जब भी आपको घबराहट, अकेलेपन की बेचैनी या एंग्जाइटी का कोई एपिसोड महसूस हो, उसे उसी समय या बाद में शांत होकर एक जगह लिखें। लिखते समय इन 6 चीजों पर ध्यान दें: सिचुएशन (स्थिति): उस समय आप कहां थे, क्या कर रहे थे। थॉट (विचार): आपके दिमाग में क्या ख्याल आए। इमोशन (भावना): आपने क्या महसूस किया (डर, घबराहट, उदासी आदि)। फिजिकल सिंपटम (शारीरिक लक्षण): जैसे दिल तेज धड़कना, पसीना, बेचैनी। बिहेवियर (आपने क्या किया): आपने उस स्थिति में क्या कदम उठाया (किसी को कॉल किया, बाहर चले गए आदि)। रिजल्ट (परिणाम): उसके बाद आपको कैसा महसूस हुआ। इस प्रक्रिया का मकसद है यह समझना कि आपकी एंग्जाइटी कैसे शुरू होती है और कैसे बढ़ती है। इसके बाद, हर बार खुद को धीरे-धीरे समझाएं और ये वाक्य दोहराएं: CBT में इस पूरे अभ्यास को थॉट रीस्ट्रक्चरिंग कहते हैं, जहां आप ऑटोमैटिक आने वाले अपने नेगेटिव विचारों को पहचानकर उन्हें ज्यादा सच और संतुलित सोच में बदलना शुरू करते हैं। सरल शब्दों में- इस हफ्ते आपको अपने दिमाग के पैटर्न को पकड़ना है, न कि तुरंत उसे बदलने की कोशिश करनी है। सप्ताह 2 एक्सपोजर क्या और कैसे करें? दूसरे हफ्ते में आप धीरे-धीरे अकेले रहने के डर का सामना करना शुरू करेंगे। इसका मतलब है कि आप खुद को एकदम से लंबे समय के लिए अकेला नहीं छोड़ेंगे, बल्कि छोटे-छोटे स्टेप्स में आगे बढ़ेंगे। इसे 'एक्सपोजर की सीढ़ी' बनाना कहते हैं। सबसे पहले एक लिस्ट बनाएं, जिसमें आप धीरे-धीरे बढ़ते समय के साथ अकेले रहने की प्रैक्टिस करेंगे। जैसेकि- 5 मिनट → 10 मिनट → 15 मिनट → 30 मिनट → 1 घंटा आपका लक्ष्य यह नहीं है कि एंग्जाइटी बिल्कुल खत्म हो जाए, बल्कि यह सीखना है कि: “मैं एंग्जाइटी के बावजूद इस स्थिति में रह सकता हूं और मैं सुरक्षित हूं।” शुरू में यह मुश्किल लगेगा, लेकिन जब आप बार-बार ये अभ्यास करेंगे तो आपका दिमाग यह सीख लेगा कि अकेले रहने में कोई खतरा नहीं है। सरल शब्दों में: इस हफ्ते आपको खुद को यह सिखाना है कि अकेलापन खतरा नहीं है। आप इसे धीरे-धीरे संभाल सकते हैं। सप्ताह 3 सेल्फ-रेगुलेशन क्या और कैसे करें? तीसरे हफ्ते में आपका फोकस होगा- खुद अपने मन और शरीर को शांत करना सीखना। इसके लिए आपको एक छोटा-सा डेली रूटीन बनाना है, जिसे आप खासतौर पर तब अपनाएं, जब एंग्जाइटी या अकेलेपन की बेचैनी बढ़े। फिर खुद से कुछ पॉजिटिव बातें कहें, जैसे- ध्यान हटाने के लिए कोई छोटा और आसान काम करें, जैसे- सबसे जरूरी बात: जब भी किसी को कॉल या मैसेज करने का मन हो, तो कम से कम 15 मिनट रुकें और इस बीच ऊपर बताए गए सभी तरीके इस्तेमाल करें। आप पाएंगे कि ऐसा करने से आपकी एंग्जाइटी थोड़ी कम हो जाती है। सरल शब्दों में: इस हफ्ते आपको यह प्रैक्टिस करनी है कि “मुझे शांत होने के लिए हमेशा किसी और की जरूरत नहीं है, मैं खुद भी खुद को संभाल सकता हूं।” सप्ताह 4 पहचान बनाना क्या और कैसे करें चौथे हफ्ते में आपका फोकस होगा अपनी एक स्वतंत्र पहचान बनाना, यानी यह महसूस करना कि आप सिर्फ रिश्तों या दूसरों के सहारे नहीं, बल्कि खुद के दम पर भी ठीक और सक्षम हैं। इसके लिए हर दिन जानबूझकर एक ऐसा छोटा काम चुनें, जो आप पूरी तरह खुद के लिए करें। जिसके लिए किसी दूसरे पर निर्भर न हों। जैसे– दिन के अंत में कुछ मिनट निकालकर लिखें: यह अभ्यास आपकी पहचान और क्षमताओं को मजबूत करता है, जिससे भावनात्मक निर्भरता धीरे-धीरे कम होने लगती है। सरल शब्दों में: इस हफ्ते आपको खुद को यह साबित करना है कि “मैं अपने दम पर भी ठीक हूं, और मेरी पहचान सिर्फ दूसरों पर निर्भर नहीं है।” प्रोफेशनल हेल्प कब जरूरी ऊपर आपने जो दो टेस्ट किए, उसमें अगर आपका स्कोर कम है तो यह सामान्य चिंता का संकेत हो सकता है। लेकिन अगर आपका स्कोर ज्यादा है, जैसे कंट्रोल खोने का डर, खुद को नुकसान पहुंचाने के विचार, असहनीय तकलीफ, आवेग में कुछ कर देने का डर या खुद को बिल्कुल सेफ न फील करना तो यह गंभीर चिंता की बात है। ऐसे में तुरंत प्रोफेशनल हेल्प लें। नीचे ग्राफिक में सारे वॉर्निंग साइन देखें- अंतिम बात जैसाकि ऊपर की पूरी बातचीत से आपने देखा और समझा कि ये सब सीखे हुए पैटर्न हैं। सीखी हुई चीजों की सबसे अच्छी बात ये होती है कि उसे बदला भी जा सकता है। लक्ष्य यह है कि आप “मैं अकेला नहीं रह सकता” से आगे बढ़कर “मुझे अकेले रहना पसंद नहीं है, लेकिन मैं इसे सुरक्षित तरीके से संभाल सकता हूं” तक पहुंचें। मुझे उम्मीद है कि इससे आपको जरूर हेल्प मिलेगी। ………………ये खबर भी पढ़िएमेंटल हेल्थ- सक्सेसफुल लोगों को इंस्टा पर स्टॉक करती हूं: लगता है सब सफल और खुश हैं, मैं ही पीछे रह गई, इस दुख से कैसे निकलूं आप जो महसूस कर रही हैं, वह बहुत रियल और कॉमन है, खासतौर पर आज के सोशल मीडिया दौर में। अच्छी बात यह है कि ये कोई स्थायी समस्या नहीं है। यह एक समझने और बदलने योग्य पैटर्न है। मैं साइकोलॉजी के कुछ टूल्स और फ्रेमवर्क्स की मदद से आपको एक प्रैक्टिकल रोडमैप देने की कोशिश करूंगा। आगे पढ़िए…