आप कोई भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ओपन करते हैं और फिर स्क्रॉल करते-करते समय कब बीत जाता है, पता ही नहीं चलता. आपने भले ही कोई एक पोस्ट देखने के लिए फोन उठाया हो, लेकिन आपकी फीड पर एक के बाद एक ऐसा वीडियो आते जाता है कि फोन रखने का मन नहीं करता. आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है? आपकी फीड पर आने वाले सारे वीडियो आपकी पसंद के कैसे होते हैं और प्लेटफॉर्म को कैसे पता लगता है कि कौन-से वीडियो आपको पसंद नहीं है? दरअसल, यह सब सोशल मीडिया एल्गोरिद्म का कमाल है. आज के इस एक्सप्लेनर में हम आपके कई सवालों के जवाब लेकर आए हैं. आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि सोशल मीडिया एल्गोरिद्म क्या होता है और यह कैसे काम करता है.क्या होता है सोशल मीडिया एल्गोरिद्म?किसी सिस्टम को चलाने के लिए कुछ नियमों की जरूरत होती है. इसी तरह सोशल मीडिया पर एल्गोरिद्म की जरूरत होती है, जिससे यूजर को उनकी पसंद का कंटेट दिखाया जा सके. एल्गोरिद्म ही यह समझता है कि किसी यूजर को कैसा कंटेट पसंद है और कैसा कंटेट उसे नहीं दिखाना है. यह लोकेशन, लैंग्वेज और इंटरेस्ट के आधार पर कंटेट को फिल्टर कर यूजर को रिकमंड करता है. कंप्यूटर प्रोग्रामिंग में बात करें तो एल्गोरिद्म कंप्यूटर एलिमेंट सॉर्टिंग, डेटा लोकेट करना और ऑब्जेक्ट को पहचानने जैसे कंप्यूटर के एक्शन को डायरेक्ट करता है. अगर तकनीकी भाषा में समझें तो यह एल्गोरिद्म नियमों का एक मैथमेटिकल सेट होता है, जो यह बताया है कि कोई डेटा कैसे बिहेव करेगा. सोशल मीडिया पर एल्गोरिद्म ऑर्डर मैंटेन करने, सर्च रिजल्ट रैंकिंग और एडवरटाइजमेंट आदि में मदद करता है. उदाहरण के तौर पर फेसबुक का एल्गोरिद्म प्लेटफॉर्म को यह बताता है कि कंटेट को किस ऑर्डर में दिखाना है.क्यों जरूरी है एल्गोरिद्म?दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी सोशल मीडिया पर है. इस तरह देखा जाए तो हर प्लेटफॉर्म पर अलग-अलग पसंद वाले यूजर होते हैं. अगर किसी प्लेटफॉर्म पर एल्गोरिद्म न हो तो यूजर के लिए अपनी पसंद के कंटेट को देखना बहुत मुश्किल हो जाएगा. एल्गोरिद्म की मदद से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स यूजर की पसंद का कंटेट उसे दिखा पाते हैं. इसके बिना क्रिकेट पसंद करने वाले यूजर को रेसिपी के वीडियो नजर आएंगे और एडवेंचर पसंद लोगों को मेडिटेशन वाले वीडियो दिख सकते हैं. कैसे काम करता है एल्गोरिद्म?एल्गोरिद्म का काम काफी जटिल और डेटा से भरा होता है. ऐसे में इसके काम करने का तरीका पूरी तरह समझना बहुत मुश्किल है. फिर भी कुछ पैरामीटर के हिसाब से पता लगाया जा सकता है कि यह कैसे काम करता है. फेसबुक और इंस्टाग्राम समेत सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का एल्गोरिद्म यूजर के बिहेवियर, इंटरेस्ट और एक्शन को मॉनीटर करता है और फिर उसी आधार पर रेलिवेंट कंटेट दिखाता है. अगर आपने क्रिकेट वाले वीडियो को लाइक किया है तो आपके ऐसे ही वीडियो ज्यादा नजर आएंगे. यह एल्गोरिद्म लगातार यूजर बिहेवियर और इंटरेक्शन से सीखता रहता है और उसी तरीके से कंटेट सजेशन को रिफाइन करते जाता है. इसी कारण आप देख पाते हैं कि पहले दिन आपको सारी रील्स आपकी पसंद की नहीं दिख रही थीं, लेकिन कुछ दिनों बाद प्लेटफॉर्म को आपकी सारी च्वाइसेस का पता चल जाता है.इंस्टाग्राम का एल्गोरिद्म कैसे काम करता है?इंस्टाग्राम का एल्गोरिद्म फॉलो किए जाने वाले अकाउंट्स की रिसेंट पोस्ट को सबसे पहले दिखाता है. इसके अलावा यह यूजर की लाइक, शेयर, सेव या कमेंट की गई पोस्ट के आधार पर भी कंटेट रिकमंड करता है. अगर किसी पोस्ट पर बड़ी संख्या में लाइक, शेयर या कमेंट आए हैं तो इन सिग्नल को भी कंसीडर करते हुए पोस्ट को दूसरे यूजर्स को दिखाया जाता है. साथ ही अगर यूजर किसी अकाउंट के साथ इंटरेक्शन करता है तो उसके कंटेट को भी पहले दिखाया जाएगा. इसी तरह मेटा का ही दूसरा प्लेटफॉर्म फेसबुक भी टाइमिंग और कंटेट टाइप आदि को कंसीडर कर उसे रैंक करता है.यूट्यूब पर कैसे रिकमंड किया जाता है कंटेट?एल्गोरिद्म किसी वीडियो पर आए लाइक, शेयर और कमेंट के आधार पर उसकी परफॉर्मेंस को मेजर करता है. अगर किसी वीडियो को ज्यादा लोग और ज्यादा देर तक देख रहे हैं तो इसे क्वालिटी कंटेट मानकर दूसरे यूजर को भी रिकमंड किया जाता है. इसके अलावा यूजर वॉच हिस्ट्री और एक्शन के आधार पर भी वीडियो सजेस्ट किए जाते हैं. इसके अलावा डेमोग्राफी और लोकेशन का भी ध्यान रखा जाता है.लिंक्डइन का एल्गोरिद्म देखता है ये साइनलिंक्डइन का एल्गोरिद्म कंटेट रैंकिंग के लिए कई साइन देखता है. इस पर क्वांटिटी से ज्यादा क्वालिटी पर ध्यान दिया जाता है. इसके साथ रेलिवेंस, एंगेजमेंट प्रोबैबिलिटी, पर्सनल कनेक्शन, कंसिस्टेंसी, क्रेडिबिलिटी और रीसेंसी को प्रायोरिटी दी जाती है.एक्स के एल्गोरिद्म में मायने रखती हैं ये चीजेंएक्स (पूर्व में ट्विटर) को भी दुनियाभर में अरबों लोग यूज करते हैं. एक्स का एल्गोरिद्म लोकेशन और लैंग्वेज के अलावा यूजर इंटरेक्शन, एंगेजमेंट लेवल, रेलिवेंसी, रीसेंसी और प्रोफाइल रेपुटेशन को भी ध्यान में रखता है. इस पर किसी एक्टिव अकाउंट को कभी-कभार पोस्ट करने वाले अकाउंट की तुलना में ज्यादा रीच मिलती है. ये भी पढ़ें-नए साल पर खरीदना है नया फोन? 10,000 से कम दामों में दमदार फीचर्स के साथ मौजूद हैं ये ऑप्शंस