नेपाल में 60% मतदान, वोटों की गिनती शुरू:रैपर बालेन शाह जीत के सबसे बड़े दावेदार, रेस में 6 पूर्व प्रधानमंत्री भी

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नेपाल में पिछले साल सितंबर में हुए हिंसक प्रदर्शन के बाद गुरुवार को हुए चुनाव में 60% से ज्यादा लोगों ने वोटिंग की। वोटों की गिनती शुरू हो गई है। वोटों की गिनती में 3 से 4 दिन लगने की उम्मीद है। पूरे नतीजे आने में एक सप्ताह लग सकते हैं। चुनाव आयोग ने कहा है कि 9 मार्च तक काउंटिंग पूरी करने की कोशिश की जाएगी। प्रत्यक्ष चुनाव वाली 165 सीटों के नतीजे मतगणना शुरू होने के 24 घंटे के भीतर जारी किए जा सकते हैं। सभी 275 सीटों की गिनती पूरी होने में दो से तीन दिन और लग सकते हैं। चुनाव में रैपर और काठमांडू के मेयर रहे बालेन शाह और गगन थापा को प्रधानमंत्री पद का प्रमुख दावेदार माना जा रहा है। इसके अलावा केपी शर्मा ओली, झाला नाथ खनाल, बाबूराम भट्टाराई, पुष्पा कमल दहल प्रचंड, शेर बहादुर देउबा और माधव कुमार नेपाल समेत 6 पूर्व पीएम भी रेस में हैं। नेपाल में 2 तरीके सांसदों का चुनाव नेपाल में चुनाव की व्यवस्था मिश्रित चुनाव प्रणाली पर आधारित है। यानी यहां दो तरीकों से सांसद चुने जाते हैं- सीधे चुनाव से और पार्टी को मिले कुल वोट के हिसाब से। सीधा चुनाव (फर्स्ट पास्ट द पोस्ट) संसद की 275 में से 165 सीटों पर सीधे चुनाव होता है। हर इलाके (निर्वाचन क्षेत्र) में लोग अपने उम्मीदवार को वोट देते हैं। जिस उम्मीदवार को सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, वही जीतता है। वोट % के आधार पर सीटें (प्रोपोर्शनल रिप्रेजेंटेशन) बाकी बची 110 सीटें पार्टियों को मिले कुल वोट प्रतिशत के आधार पर मिलती हैं। इसमें वोटर किसी उम्मीदवार को नहीं बल्कि किसी पार्टी को वोट देती है। पूरे देश में पार्टी को जितने प्रतिशत वोट मिलते हैं, उसी हिसाब से उन्हें संसद में सीटें मिलती हैं। इस सिस्टम का मकसद यह है कि छोटे दलों और अलग-अलग सामाजिक समूहों को भी संसद में जगह मिल सके और कोई एक पार्टी पूरी तरह हावी न हो। त्रिशंकु संसद की आशंका नेपाल के चुनावों में अक्सर कोई भी पार्टी स्पष्ट बहुमत नहीं ला पाती और गठबंधन सरकार बनती है। इस बार भी ऐसी संभावना जताई जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिलना मुश्किल दिख रहा है, इसलिए चुनाव के बाद फिर से गठबंधन की राजनीति देखने को मिल सकती है। नेपाल की संसद यानी प्रतिनिधि सभा में कुल 275 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए किसी पार्टी या गठबंधन को कम से कम 138 सीटों की जरूरत होती है। इस चुनाव में मुख्य मुकाबला तीन बड़े राजनीतिक खेमों के बीच माना जा रहा है। इनमें नेपाली कांग्रेस, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) और बालेन्द्र शाह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी शामिल हैं। इन तीनों दलों के बीच वोट बंटने की संभावना बताई जा रही है। पिछले कुछ सालों में नेपाल की राजनीति में लगातार अस्थिरता देखी गई है। बार-बार सरकार बदलने और गठबंधन टूटने की वजह से स्थिर सरकार बन पाना मुश्किल रहा है। यही वजह है कि इस बार भी चुनाव के बाद लंबी राजनीतिक बातचीत और गठबंधन बनाने की प्रक्रिया चल सकती है। नेपाल में युवाओं का विदेश जाना बड़ा चुनावी मुद्दा नेपाल में इस बार चुनाव के दौरान युवाओं का बड़े पैमाने पर विदेश जाना एक अहम मुद्दा बनकर उभरा है। देश में रोजगार के सीमित अवसरों के कारण हर साल बड़ी संख्या में युवा काम की तलाश में खाड़ी देशों, मलेशिया और अन्य देशों का रुख करते हैं। इसका असर नेपाल की अर्थव्यवस्था, समाज और परिवारों पर भी पड़ रहा है। इसी वजह से लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दल अपने चुनावी वादों में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठा रहे हैं। दलों का कहना है कि युवाओं को विदेश जाने के लिए मजबूर होने की बजाय देश के भीतर ही रोजगार के बेहतर अवसर मिलना चाहिए। नेपाली कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में कहा है कि विदेश जाने वाले युवाओं के लिए मानसिक स्वास्थ्य सहायता और परामर्श की व्यवस्था की जाएगी, ताकि वे विदेश में काम करते समय आने वाली मानसिक और सामाजिक चुनौतियों से बेहतर तरीके से निपट सकें। वहीं नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएन-यूएमएल) ने वादा किया है कि विदेश में काम करने के लिए जाने वाले लोगों को भारी कर्ज लेने की मजबूरी कम की जाएगी। इसके लिए भर्ती प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और सस्ती बनाने की बात कही गई है। इसके अलावा कुछ राजनीतिक दलों ने यह भी कहा है कि विदेश में नौकरी दिलाने के नाम पर लोगों से अवैध रूप से पैसे वसूलने वाले दलालों और एजेंटों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। उनका कहना है कि इस तरह की धोखाधड़ी को रोकने के लिए सरकार को मजबूत निगरानी व्यवस्था बनानी होगी। चुनाव पर अमेरिका, चीन और भारत की नजर नेपाल में हो रहे संसदीय चुनाव पर सिर्फ देश के भीतर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नजर रखी जा रही है। खासकर अमेरिका, चीन और भारत इस चुनावी प्रक्रिया और इसके नतीजों को ध्यान से देख रहे हैं। इसकी वजह यह है कि दक्षिण एशिया में रणनीतिक और राजनीतिक प्रभाव को लेकर अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है, और इस संदर्भ में नेपाल का महत्व भी काफी बढ़ गया है। अमेरिका की ओर से साफ संकेत दिया गया है कि वह नेपाल में बनने वाली किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के साथ काम करने को तैयार है। अमेरिका के एक वरिष्ठ अधिकारी पॉल कपूर ने हाल ही में कहा था कि वॉशिंगटन नहीं चाहता कि दक्षिण एशिया में किसी एक देश या शक्ति का प्रभुत्व हो। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका नेपाल के साथ अपने सहयोग को जारी रखेगा, चाहे वहां किसी भी पार्टी की सरकार बने। भारत के लिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि नेपाल में चुनाव शांतिपूर्ण और निष्पक्ष तरीके से पूरे हों और वहां स्थिर लोकतांत्रिक सरकार बने। भारत और नेपाल के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध बहुत गहरे हैं। यही वजह है कि भारत चुनाव प्रक्रिया को सुचारु रूप से संपन्न कराने के लिए नेपाल को कई किस्तों में सहायता भी दे चुका है। दूसरी ओर चीन भी नेपाल की राजनीतिक स्थिति पर नजर बनाए हुए है। चीन ने अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की की सरकार के साथ संपर्क बनाए रखा है, हालांकि उसका रुख अपेक्षाकृत सतर्क माना जा रहा है। फरवरी में चीन ने नेपाल को करीब 40 लाख डॉलर की आर्थिक सहायता दी थी, लेकिन इस मदद के इस्तेमाल को लेकर कुछ सख्त शर्तें भी रखी गई थीं। ---------------- यह खबर भी पढ़ें… नेपाल में वोटिंग खत्म, 60% वोटिंग हुई:PM कार्की बोलीं- अब मेरा रोल पूरा हुआ; गगन थापा-बालेन शाह और केपी शर्मा ओली के बीच मुकाबला नेपाल में आम चुनाव के लिए सुबह 7 बजे से शाम 5 बजे तक वोटिंग हुई। रात 12 बजे से काउंटिंग शुरू होगी। चुनाव आयोग के मुताबिक दोपहर 60% वोटिंग हुई। दूरदराज इलाकों में अभी भी वोटिंग हो रही है। अंतिम आंकड़ा जल्द जारी किया जाएगा। पढ़ें पूरी खबर…