राजधानी दिल्ली से सामने आई एक अहम चेतावनी ने पैरेंट्स की चिंता बढ़ा दी है. देश के शीर्ष चिकित्सा संस्थान एम्स के विशेषज्ञों ने साफ कहा है कि बच्चों का ज्यादा स्क्रीन टाइम उनके विकास पर गंभीर असर डाल सकता है. अगर समय रहते सावधानी नहीं बरती गई तो इसके दूरगामी परिणाम सामने आ सकते हैं.जन्म के शुरुआती महीनों में स्क्रीन से दूरी जरूरीपीडियाट्रिक न्यूरोलॉजी डिवीजन के फैकल्टी इंचार्ज प्रोफेसर शैफाली गुलाटी का कहना है कि जन्म से लेकर 18 महीने तक के बच्चों को मोबाइल, टीवी या किसी भी तरह की स्क्रीन से पूरी तरह दूर रखना चाहिए. इस उम्र में बच्चों का दिमाग तेजी से विकसित होता है और स्क्रीन उनके प्राकृतिक विकास में बाधा डाल सकती है.भाषा और व्यवहार पर पड़ता है सीधा असरएक्सपर्ट्स के अनुसार, ज्यादा स्क्रीन देखने वाले बच्चों में भाषा सीखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है. इसके साथ ही उनका सामाजिक व्यवहार भी कमजोर पड़ सकता है. कई बार ऐसे लक्षण सामने आते हैं जो ऑटिज्म जैसे दिखाई देते हैं, हालांकि इसे सीधे तौर पर ऑटिज्म का कारण नहीं माना गया है.छोटे बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम सीमित करना जरूरीडॉक्टरों ने सलाह दी है कि 18 महीने से 6 साल तक के बच्चों का स्क्रीन टाइम बेहद सीमित होना चाहिए. इस उम्र में बच्चों को खेलकूद, बातचीत और रचनात्मक गतिविधियों में ज्यादा शामिल करना जरूरी है ताकि उनका मानसिक और सामाजिक विकास बेहतर हो सके.ऑटिज्म को लेकर जागरूकता बढ़ाने पर जोरअप्रैल महीने को दुनिया भर में ऑटिज्म अवेयरनेस मंथ के रूप में मनाया जाता है. साल 2026 के लिए संयुक्त राष्ट्र ने "Autism & Humanity: Every Life has Value" थीम तय की है. इसी के तहत 30 अप्रैल को एम्स, नई दिल्ली में एक विशेष पब्लिक हेल्थ लेक्चर आयोजित किया जा रहा है, जिसमें ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से जुड़ी जटिलताओं पर विस्तार से चर्चा होगी.कम उम्र में पहचान से बेहतर हो सकते हैं परिणामविशेषज्ञ बताते हैं कि ऑटिज्म के लक्षण 12 से 18 महीने की उम्र में ही पहचाने जा सकते हैं. ऐसे में शुरुआती पहचान और सही समय पर इलाज बेहद जरूरी है. आंकड़ों के मुताबिक, हर 31 में से एक व्यक्ति ऑटिज्म से प्रभावित पाया जा रहा है, जो इसे एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनाता है.ऑटिज्म से जुड़े अन्य स्वास्थ्य जोखिम भी चिंता का कारणएम्स के आंकड़ों के अनुसार, ऑटिज्म से पीड़ित करीब 80 प्रतिशत बच्चों में अन्य समस्याएं भी पाई जाती हैं. इनमें मिर्गी, ध्यान की कमी, व्यवहारिक समस्याएं और नींद से जुड़ी दिक्कतें शामिल हैं. इन समस्याओं के कारण बच्चों और उनके परिवार की जिंदगी की गुणवत्ता पर गहरा असर पड़ता है.परिवार आधारित इलाज और सही जानकारी की अहमियतडॉक्टरों का मानना है कि ऑटिज्म के इलाज में परिवार की भूमिका बेहद अहम होती है. सही जानकारी, समय पर हस्तक्षेप और व्यक्तिगत देखभाल से बच्चों के विकास में काफी सुधार किया जा सकता है. साथ ही बिना वैज्ञानिक आधार वाली वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों से बचने की भी सलाह दी गई है.समावेशी समाज की दिशा में बढ़ते कदमइस पहल का मकसद सिर्फ बीमारी का इलाज नहीं बल्कि समाज में जागरूकता बढ़ाना और ऑटिज्म से प्रभावित लोगों को सम्मानजनक जीवन देना है. एम्स की ओर से हेल्पलाइन, डिजिटल प्लेटफॉर्म और शैक्षणिक सामग्री के जरिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं ताकि हर बच्चे को बेहतर अवसर मिल सके और समाज में किसी के साथ भेदभाव न हो.ये भी पढ़ें: रोज नहीं करते ब्रश तो आपके हार्ट पर लगातार बढ़ रहा खतरा, इस स्टडी में हुआ डराने वाला खुलासा