बस्तर के इन जंगलों के भीतर सक्रिय माओवादी बटालियन सिर्फ एक सैन्य इकाई नहीं, बल्कि एक ऐसी सुनियोजित ‘फैक्ट्री’ थी, जहां इंसान को हिंसक औजार में बदल दिया जाता था।