आरक्षकों के खाते तक तो राशि ऑनलाइन पहुंचती थी, लेकिन उसके बाद लेन-देन का खेल नकद में होता था। भत्ता शाखा का बाबू आरोपितों से गबन की राशि का 50 प्रतिशत हिस्सा नकद वसूलता था।