इजरायल और ईरान के बीच छिड़ी इस जंग में भारत का स्टैंड क्या है? इस सवाल का जवाब उन दो फोन कॉल्स और दो मुलाकातों में छिपा है, जो हाल के दिनों में हुई हैं.जब इजरायल ने ईरान पर हमला किया और जवाब में ईरान ने खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया, तो भारत सरकार की पहली आधिकारिक प्रतिक्रिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'X' (पहले ट्विटर) अकाउंट से आई. पीएम मोदी ने दो अलग-अलग फोन बातचीत का ब्योरा साझा किया:पहली बातचीत: यूएई (UAE) के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के साथ.दूसरी बातचीत: इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ.दिलचस्प बात यह है कि ये पोस्ट सिर्फ अंग्रेजी में नहीं, बल्कि अरबी और हिब्रू भाषाओं में भी किए गए. प्रधानमंत्री ने ईरान से कोई बात नहीं की, जिससे यह साफ संकेत गया कि भारत ने इस संघर्ष में अपना पक्ष चुन लिया है यानी अमेरिका-इजरायल गठबंधन, जिसमें यूएई भी शामिल है.लेकिन अगर आप इन सोशल मीडिया पोस्ट्स को गहराई से पढ़ें, तो समझ आएगा कि भारत के इस रुख के पीछे की असली वजह इजरायल नहीं, बल्कि यूएई है.दोनों पोस्ट्स के लहजे (Tone) में जमीन-आसमान का फर्क था:पीएम मोदी ने शेख जायद को 'भाई' कहकर संबोधित किया.उन्होंने यूएई पर हुए हमलों की 'कड़ी निंदा' की.पीएम ने यूएई के साथ एकजुटता तो दिखाई, लेकिन खास बात यह रही कि उन्होंने अपने बयान में कहीं भी ईरान का नाम नहीं लिया.वहीं दूसरी ओर, इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू के साथ हुई बातचीत पर पीएम मोदी का पोस्ट काफी नपा-तुला था. इसमें उन्होंने बस इतना कहा कि "हाल के घटनाक्रमों पर भारत अपनी चिंता जताता है" और दोनों पक्षों से "जल्द से जल्द युद्ध रोकने" की अपील की.अब सवाल यह उठता है कि भारत के इन दोनों बयानों के लहजे में इतना अंतर क्यों है? और उन दो मुलाकातों का क्या चक्कर है जिसका जिक्र कहानी की शुरुआत में किया गया था?पीएम मोदी और उनके 'भाई' शेख जायददुनिया भर के नेताओं में यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद शायद वो शख्स हैं, जिनसे पीएम मोदी के सबसे करीबी निजी रिश्ते हैं. शेख जायद इकलौते ऐसे बड़े वैश्विक नेता हैं जिन्हें पीएम मोदी 'भाई' कहकर बुलाते हैं. हालांकि, उन्होंने मॉरीशस के प्रविंद जगन्नाथ और बांग्लादेश की शेख हसीना के लिए भी 'भाई' और 'बहन' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया है, लेकिन शेख जायद के लिए उन्होंने सबसे ज्यादा बार 'भाई' शब्द का इस्तेमाल किया है.बाकी तमाम बड़े नेताओं चाहे वो व्लादिमीर पुतिन हों, डोनाल्ड ट्रंप, बराक ओबामा या फिर नेतन्याहू इन सभी को पीएम मोदी ने हमेशा 'दोस्त' ही कहा है. दिलचस्प बात यह है कि नेतन्याहू ने तो कई बार मोदी को अपना 'भाई' बताया है, लेकिन मोदी ने सार्वजनिक तौर पर उनके लिए कभी इस शब्द का इस्तेमाल नहीं किया.पश्चिमी एशिया (मिडल ईस्ट) के मौजूदा संकट पर भारत के रुख को समझने के लिए यह फर्क बहुत जरूरी है. असल में, भारत का स्टैंड इजरायल के मुकाबले यूएई के ज्यादा करीब नजर आता है.यूएई की तरह भारत भी चाहता है कि ये जंग और न बढ़े. भले ही अरब जगत में यूएई इजरायल का सबसे करीबी सहयोगी है, लेकिन वह इजरायल द्वारा जंग को खींचने के पक्ष में नहीं है खासकर तब, जब ईरान ने उसके बुनियादी ढांचे (Infrastructure) को निशाना बनाया हो.नई दिल्ली के लिए एक असहज स्थिति तब पैदा हो गई थी, जब पीएम मोदी के तेल अवीव दौरे और नेसेट (इजरायली संसद) में उनके भाषण के तुरंत बाद इजरायल ने हमला बोल दिया. इजरायल ने मोदी की मौजूदगी को अपने एक्शन पर 'मंजूरी की मुहर' की तरह पेश किया. उसने इसे दुनिया को ऐसे दिखाया कि भारत, ईरान के 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' और उभरते 'सऊदी-तुर्की-पाकिस्तान सुन्नी ब्लॉक' के खिलाफ इजरायल के साथ खड़ा है.लेकिन हकीकत यह है कि भारत ने कभी भी खुलकर ऐसा कोई स्टैंड नहीं लिया और न ही किसी ऐसे गुट या गठबंधन में शामिल होने की पुष्टि की.दो बैठकेंअब बात उन दो बैठकों की, जिन्होंने भारत और यूएई को एक मंच पर लाने में सबसे अहम भूमिका निभाई . ये मुलाकातें उस वक्त हुईं, जब ईरान पर अमेरिका और इजरायल का हमला बिल्कुल तय माना जा रहा था.19 जनवरी: यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद एक छोटी सी यात्रा पर नई दिल्ली आए और पीएम मोदी से मुलाकात की.19 फरवरी: ठीक एक महीने बाद, नई दिल्ली में आयोजित 'एआई समिट' (AI Summit) के दौरान पीएम मोदी की मुलाकात अबू धाबी के क्राउन प्रिंस से हुई.प्रधानमंत्री मोदी और शेख बिन जायद की मुलाकात 19 जनवरी को हुई थी.भारत का जो आधिकारिक स्टैंड है यानी "जंग को तुरंत रोकना" और इजरायल के हमले का खुलकर समर्थन न करना उसे इसी नजरिए से देखने की जरूरत है.दरअसल, खाड़ी देशों के मन में एक डर और नाराजगी है. ईरान के निशाने पर आए इन देशों को लगता है कि इजरायल की आक्रामकता ने उन्हें भी मुसीबत में डाल दिया है. उन्हें यह भी महसूस हो रहा है कि अमेरिका ने सिर्फ इजरायल को बचाने को तवज्जो दी और उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया.नई दिल्ली को इसी में एक बड़ा मौका दिख रहा है. भारत इस क्षेत्र में अपना दबदबा और प्रभाव बढ़ाना चाहता है. यही वजह है कि कूटनीति के मोर्चे पर भारत काफी एक्टिव है.आज, यानी 3 मार्च को ही पीएम मोदी ने क्षेत्र के अन्य बड़े खिलाड़ियों से भी संपर्क साधा है. उन्होंने:बहरीन के किंग हमाद बिन ईसा अल-खलीफा,सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, औरजॉर्डन के किंग अब्दुल्ला से फोन पर लंबी बात की है.सोशल मीडिया पर 'ट्रोलिंग' और बीजेपी का डैमेज कंट्रोलजब ईरान ने दुबई और अबू धाबी पर हमले किए, तो भारतीय सोशल मीडिया पर एक अजीब ट्रेंड शुरू हो गया. लोग वहां रह रहे एनआरआई (NRIs) को यह कहकर ट्रोल करने लगे कि उन्होंने भारत क्यों छोड़ा. इस बहती गंगा में बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे भी हाथ धोने उतर पड़े. उन्होंने 'X' पर लिखा:जो लोग भारतीय पासपोर्ट छोड़कर दुबई जा रहे हैं, उनके लिए एक सबक: मोदी जी के रहते हम सुरक्षित हैं. सोशल मीडिया पर लंबी-चौड़ी बातें करना आसान है.भारतीय न्यूज़ चैनलों पर यूएई के शहरों में हुए नुकसान की तस्वीरें और सोशल मीडिया पर चल रही इस तरह की बातों ने यूएई के खिलाफ एक माहौल बना दिया.बात बिगड़ती देख बीजेपी 'डैमेज कंट्रोल' मोड में आ गई. पार्टी के विदेश विभाग के प्रभारी विजय चौथाईवाले ने तुरंत इन टिप्पणियों की निंदा की. उन्होंने पोस्ट किया:"जब यूएई पर हमला हो रहा है, तब भारत में कुछ लोगों द्वारा की जा रही ओछी टिप्पणियां निंदनीय हैं. मौजूदा नेतृत्व में भारत और यूएई की साझेदारी भरोसेमंद है. अब समय है कि हम इस दोस्ती को और मजबूत करें."यह कदम इसलिए बड़ा था क्योंकि बीजेपी आमतौर पर अपने समर्थकों द्वारा चलाए जा रहे सोशल मीडिया ट्रेंड्स की आलोचना नहीं करती. इसके तुरंत बाद, बीजेपी समर्थक इन्फ्लुएंसर्स के सुर बदल गए और वे यूएई की तारीफ करने लगे कि कैसे वहां भारतीयों का ख्याल रखा जा रहा है.यह सब जानते हैं कि यूएई में बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी रहते हैं. लेकिन जिस बात पर कम चर्चा होती है, वो है यूएई में भारत के गहरे आर्थिक हित.भारत के 'एलिट' क्लास यानी बड़े बिजनेसमैन, फिल्मी सितारे, खिलाड़ी और यहां तक कि राजनेताओं का भी यूएई में बड़ा निवेश है. इनमें से कई लोगों की वहां संपत्तियां हैं और कई ने तो दुबई को अपना मुख्य घर (Primary Residence) बना लिया है. इनमें से कई लोग बीजेपी के करीबी भी माने जाते हैं.साफ है कि यूएई पर कोई भी हमला भारत के इस रसूखदार तबके की जेब और हितों पर सीधा असर डालता है. और यह कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि यूएई की अपनी सोची-समझी ग्रोथ स्ट्रैटेजी का हिस्सा है.यूएई ने बड़ी चालाकी से दुनिया भर के रसूखदार लोगों (Elites) को अपने यहां निवेश करने के लिए उकसाया है. इसके लिए उसने सुरक्षा, तरक्की और 'जीरो टैक्स' का लालच दिया. दरअसल, यह यूएई की एक तरह की 'इंश्योरेंस पॉलिसी' है. यूएई चाहता है कि दुनिया के ताकतवर लोगों का उसके यहां इतना पैसा और हित लगा हो कि वे खुद यूएई की स्थिरता और शांति की दुआ करें.लेकिन अब ईरान के इन हमलों ने यूएई की इसी 'सुरक्षा कवच' वाली छवि पर खतरा पैदा कर दिया है.मोदी सरकार और यूएई: विचारधारा का 'परफेक्ट मैच'2010 की 'अरब स्प्रिंग' (अरब देशों में सरकारों के खिलाफ जन-आंदोलन) के बाद से, यूएई ने खुद को अरब जगत में 'क्रांति-विरोधी' केंद्र के रूप में स्थापित किया है. यूएई इसे 'कट्टरपंथ (Islamism) के खिलाफ जंग' के तौर पर पेश करता रहा है. अमेरिका के पीछे हटने के बाद (ओबामा और ट्रंप के दौर में) यूएई की यह भूमिका और भी आक्रामक हो गई.यही वह बिंदु है जहां मोदी सरकार और यूएई की विचारधारा आपस में मेल खाती है. दोनों ही सरकारों की नीतियों में 'मुस्लिम समुदाय की सुरक्षा संबंधी निगरानी' (Securitisation) एक अहम हिस्सा रही है.इसका सबसे हालिया उदाहरण गृह मंत्रालय की वह रिपोर्ट है, जिसमें राज्यों से "धार्मिक सभाओं और तकरीरों पर पैनी नजर रखने" को कहा गया है. इसमें खासतौर पर "ईरान समर्थक कट्टरपंथी प्रचारकों" की पहचान करने के निर्देश दिए गए हैं, जो भड़काऊ भाषण दे सकते हैं या भीड़ जुटाने की कोशिश कर सकते हैं.हैरानी की बात यह है कि भारत और यूएई, दोनों ही देशों ने गाजा में हो रहे नरसंहार के खिलाफ प्रदर्शनों पर पाबंदियां लगाई हैं:भारत में: बीजेपी शासित राज्यों में फिलिस्तीन समर्थक प्रदर्शनों पर पुलिसिया कार्रवाई (क्रैकडाउन) देखने को मिली.यूएई में: यहां ऐसे प्रदर्शनों पर लगभग पूरी तरह बैन है. आलम यह है कि वहां 'कफिया' (Keffiyeh - फिलिस्तीनी स्कार्फ) पहनना भी एक राजनीतिक और संदिग्ध कदम माना जाता है.सऊदी से होड़ और यूएई की 'बड़ी गेम'यूएई की कमान अबू धाबी के शाही परिवार के हाथ में है, जो वहां की सुरक्षा और विदेश नीति के असली कर्ता-धर्ता हैं. पिछले दो दशकों में यूएई पश्चिमी एशिया और उत्तरी अफ्रीका में एक बहुत ही आक्रामक खिलाड़ी बनकर उभरा है. उसने खुद को ईरान के 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' और अलग-अलग देशों में चल रहे 'इस्लामी आंदोलनों' के खिलाफ एक मजबूत दीवार की तरह पेश किया है.लेकिन, सिर्फ विचारधारा के चश्मे से यूएई की इस नीति को समझना काफी नहीं होगा.यूएई ने कई युद्ध क्षेत्रों (Conflict Zones) में अपनी दखलअंदाजी बढ़ाई है. अपना प्रभाव बढ़ाने और खतरों को रोकने के लिए उसने अक्सर खास सशस्त्र गुटों, मिलिशिया और अलगाववादी समूहों का साथ दिया है। इसके कुछ बड़े उदाहरण हैं:सूडान: यहां उसने 'रैपिड सपोर्ट फोर्सेज' (RSF) का साथ दिया.यमन: यहां 'साउदर्न ट्रांजिशन काउंसिल' (STC) को समर्थन दिया.लीबिया: यहां खलीफा हफ्तार के नेतृत्व वाले गुट को शह दी.इतना ही नहीं, यूएई पर सोमालिया की केंद्र सरकार के खिलाफ सोमालीलैंड को और सीरिया में द्रूज अलगाववादियों को भी हवा देने के आरोप लगते रहे हैं.यूएई जिस तरह से बागी गुटों खासकर यमन में STC और सूडान में RSF को बढ़ावा दे रहा है, उसने उसे अपने पुराने साथी सऊदी अरब के आमने-सामने खड़ा कर दिया है. सऊदी की नीति हमेशा से इन देशों की आधिकारिक सरकारों का साथ देने की रही है, जबकि यूएई बागियों के पाले में खड़ा दिखा.यमन में यूएई समर्थित STC के बढ़ते दबदबे को सऊदी अरब ने अपनी क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरे के तौर पर देखा. नतीजा यह हुआ कि दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 में सऊदी अरब ने STC के ठिकानों पर हमले किए. मिडिल ईस्ट की राजनीति में यह सऊदी और यूएई के हितों के बीच पहला बड़ा और सीधा टकराव था.अब सऊदी अरब एक नया मोर्चा तैयार कर रहा है. वह तुर्की, पाकिस्तान और कुछ हद तक मिस्र के साथ मिलकर एक धुरी (Axis) बनाने की कोशिश में है. सऊदी का मकसद एक तरफ ईरान के 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' को रोकना है, तो दूसरी तरफ 'यूएई-इजरायल' गठबंधन को चुनौती देना भी है.यहीं से भारत की मुश्किलें शुरू होती हैं:सऊदी से करीबी: भारत के सऊदी अरब के साथ बेहद मजबूत रिश्ते हैं.पाकिस्तान का फैक्टर: अगर 'सऊदी-पाकिस्तान-तुर्की' वाला यह नया गुट मजबूत होता है, तो नई दिल्ली के लिए यह सिरदर्द बन सकता है.यही वह पेचीदा मोड़ है जिसने भारत को मजबूरी में और कूटनीतिक सूझबूझ के साथ यूएई के और भी करीब ला खड़ा किया है.(ट्रांसलेशन: नौशाद मलूक)'चिंकी', 'चाइनीज' और नस्लवाद पर नॉर्थ ईस्ट के लोगों के दर्द की कहानी