बॉलीवुड एक्टर पंकज त्रिपाठी की सरलता और सौम्यता के पीछे हर कोई कायल है. भले ही वो पर्दे पर कैसे भी रोल कर रहे हों, लेकिन लोग उन्हें हर किरदार में देखना पसंद करते हैं. चाहे वो गाली देते हुए कालीन भैया हों या गुंजन सक्सेना को मोटिवेट करते उनके पिता के रूप में. लेकिन यहां तक पहुंचना इतना सरल नहीं था पंकज ने हाल ही में एबीपी नेटवर्क की समिट के दौरान अपने स्ट्रगल और पहले मौके पर बात की है.डॉक्टर- ट्रैक्टर का खेल क्या है?पंकज त्रिपाठी पहले डॉक्टर बनना चाहते थे लेकिन बन गए एक्टर. इसके बाद वो ट्रैक्टर भी खरीदना चाहते थे. लेकिन वो भी नहीं खरीद पाए. पंकज इसके लिए कहते हैं कि भले ही डॉक्टर नहीं बन पाए ना ट्रैक्टर ले पाए पर एक्टर तो बन गए, यहां तो टर आ ही गया.पहला मौका कैसे मिलापंकज त्रिपाठी ने बताया कि उनहोंने सबसे पहले गांव के नाटक में काम किया था. इसके बाद ही उनकी रुची एक्टिंग में आई. उन्होंने गांव में एक नाटक किया था जिसमें वो एक औरत का किरदार निभा रहे थे. इस किरदार को लेकर उनके गांव में बहुत चर्चा हुई. इसके बाद कुछ समय होटल वगैरह में काम करके उन्होंने गुजारा चलाया. इसके बाद थिएटर जॉइन किया और नाटक करने लगे. इसके बाद ही उन्होंने बॉलीुड में भी कदम रखा.मुंबई में कितना संघर्ष करना पड़ापंकज त्रिपाठी मुंबई में आने के बाद भी अपने स्ट्रगल को स्ट्रगल नहीं मानते. उन्होंने बताया, 'मुझे नहीं पता कि आप प्रतीक्षा करने को स्ट्रगल करना कहते हैं. मुझे कभी इस बात की पेरशानी नहीं हुई कि नहीं होगा तो क्या होगा. पत्नी एक स्कूल में पढ़ाती थीं बॉम्बे में, हमारी जरूरतें बहुत छोटी थीं. ऐसा कभी नहीं हुआ कि हमें खाने में तकलीफ हो, अच्छे से रह रहे थे, छोटा सा घर था, हमारे पास एक बाइक थी. अब मैं उस बाइक का एम्बेसडर हूं. बच्ची को अच्छे से रखते हैं. घुमाते थे'.चुनौतियां थीं पर चिंता नहींपंकज ने अपने स्ट्रगल के बारे में बात करते हुए आगे कहा, 'हां चुनौतियां थीं कि कब मौका मिलेगा, कितनी देर में मिलेगा. मेरे सपने भी छोटे थे. मुझे कुछ लग्जरी नहीं चाहिए थी. मेरे सपने छोटे- छोटे थे, छोटी सी कार, छोटा सा घर मुझे वो मिल गया था बहुत पहले ही. भौतिक सुविधाओं के लिए मैं कभी भी नहीं चाहता था'.आने वाले समय में आप कौन से सपने पूरे करना चाहते हैं?साधारण जीवन बिताने वाले पंकज त्रिपाठी ने अपने सपनों के बारे में बताया कि, 'पता नहीं, मतलब सक्सेसफुल तो हो गए, अब मीनिंगफुल होना है. समाज ने हमें बहुत कुछ दिया है, अब हम क्या दे सकते हैं समाज को इस बारे में सोचना है. हां लेकिन इसके लिए राजनीति में बिलकुल नहीं जाना है. लेकिन कुछ समाज के लिए करना है'.